{"_id":"87965b90ca9c80904bae386d4af38914","slug":"all-about-a-leader","type":"story","status":"publish","title_hn":"कैसी-कैसी उलझन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कैसी-कैसी उलझन
टीम डिजिटल/लखनऊ
Updated Mon, 11 Nov 2013 08:45 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पावरफुल
विज्ञापन
मंत्री के बागी स्टाफ की मदद को लेकर सचिवालय का एक संगठन अजीब उधेड़बुन
में है।
दरअसल, पिछले काफी दिनों से वह अपनी कुछ मांगों को लेकर बड़े जोर-शोर से आंदोलन चला रहा था। अचानक बागियों का मामला सामने आने से इनकी उलझन बढ़ गई।
उलझन ये कि साथियों की पैरोकारी करें या मांग को लेकर झंडा बुलंद करें। इसी बीच साथियों का मामला सुर्खी बन गया और महीने भर से अखबार में जगह बना रहा मुद्दा ओझल हो गया।
दूसरी चिंता कि ये कि जो तवज्जो इन्हें मिलनी चाहिए वह दूसरे संगठन के नेताओं को मिलने लगी।
कई दिनों की मशक्कत के बाद जब शासन ने कर्मियों को बिना निलंबन के सेंट्रल पूल से संबद्ध किया तो इन लोगों की जान में जान आई। इन्होंने तुरंत यह कहना शुरू कर दिया कि ऐसा उनकी वजह से हुआ, वरना निलंबन तय था।
अब मामला भी रफा-दफा हो जाएगा। इन्होंने सफाई भी दी कि वे लोग तो मामला सुलझाने में लगे थे जबकि दूसरे लोग प्रचार के लिए इसे तूल दे रहे हैं।
मगर जब से बागियों को बुलाकर आरोप पत्र थमाया गया है ये बैकफुट पर नजर आने लगे हैं। अब बस ये यही मना रहे हैं कि बागी कर्मचारी आरोप पत्र का कोई ऐसा जवाब न दे दें जिससे इनके आंदोलन को पलीता लग जाए?
दरअसल, पिछले काफी दिनों से वह अपनी कुछ मांगों को लेकर बड़े जोर-शोर से आंदोलन चला रहा था। अचानक बागियों का मामला सामने आने से इनकी उलझन बढ़ गई।
उलझन ये कि साथियों की पैरोकारी करें या मांग को लेकर झंडा बुलंद करें। इसी बीच साथियों का मामला सुर्खी बन गया और महीने भर से अखबार में जगह बना रहा मुद्दा ओझल हो गया।
दूसरी चिंता कि ये कि जो तवज्जो इन्हें मिलनी चाहिए वह दूसरे संगठन के नेताओं को मिलने लगी।
कई दिनों की मशक्कत के बाद जब शासन ने कर्मियों को बिना निलंबन के सेंट्रल पूल से संबद्ध किया तो इन लोगों की जान में जान आई। इन्होंने तुरंत यह कहना शुरू कर दिया कि ऐसा उनकी वजह से हुआ, वरना निलंबन तय था।
अब मामला भी रफा-दफा हो जाएगा। इन्होंने सफाई भी दी कि वे लोग तो मामला सुलझाने में लगे थे जबकि दूसरे लोग प्रचार के लिए इसे तूल दे रहे हैं।
मगर जब से बागियों को बुलाकर आरोप पत्र थमाया गया है ये बैकफुट पर नजर आने लगे हैं। अब बस ये यही मना रहे हैं कि बागी कर्मचारी आरोप पत्र का कोई ऐसा जवाब न दे दें जिससे इनके आंदोलन को पलीता लग जाए?