दंगे-दुश्वारियों के दो साल, अब टीपू का असली इम्तेहान
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अखिलेश सरकार ने विपक्ष के तीखे हमलों के बीच दूसरे साल में प्रवेश किया तो उसके सामने लोकसभा चुनाव की चुनौती सबसे बड़ी थी। अब जबकि सरकार तीसरे साल में कदम रखने वाली है, परीक्षा की वह घड़ी सामने है।
मुजफ्फरनगर दंगों की आंच में तप चुकी सरकार के लिए यह इम्तिहान बेहद कठिन इसलिए है क्योंकि उसने सियासत और शासन के स्तर पर अब तक जो कुछ किया है, उसका नतीजा दूर नहीं, और इस नतीजे से जुड़े सारे सवाल उससे सीधे मुखातिब हैं।
अपने चुनावी वादों को सबसे बड़ी चुनौती मानने और उसे पूरा करने का दावा करने वाली सरकार के सामने बेहद तीखा सवाल ये है कि क्या वह अपने प्रशासनिक कौशल से प्रदेश में जमीनी स्तर पर कोई अहम बदलाव दिखा पाई है?
क्या उसके मंत्री सरकार के कार्यक्रमों के साथ कदमताल करते दिख रहे थे? क्या उसके अफसर सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने को लेकर गंभीर थे?
जब अदालत में झेलनी पड़ी जलालत
इस सबके बीच सरकार को अपने अफसरों से शिकायत भी थी तो कुछ ऐसे अफसरों पर मेहरबानी भी दिखी जिन्हें बचाने को लेकर वह अदालत का दरवाजा खटखटाने से भी नहीं चूकी।
मनरेगा जांच से बचने के लिए तो सरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। यह बात और है कि इन्हीं अफसरों की वजह से इस साल कई बार सरकार को अदालत में जलालत भी झेलनी पड़ी।
इन दो सालों के दरम्यान सरकार ने काफी उतार-चढ़ाव देखे। पार्टी के नेता ही नहीं, विधायक-मंत्री भी जब तब परेशानियां खड़ी करते रहे। दंगों के अलावा भी कानून-व्यवस्था बड़ी चुनौती बनी रही।
दामन में नाकामियों के कांटे भी
मुलायम-अखिलेश किसानों को दिल खोलकर मदद का दावा करते दिखे, तो बदहाली के कगार पर पहुंच चुके गन्ना किसान उन्हें आईना दिखाते नजर आए।
सरकार के दामन में उपलब्धियों के फूल भी हैं तो नाकामियों के कांटे भी। पर दोनों में किसका पलड़ा भारी है, इसका असल इम्तिहान तो अब जनता की अदालत यानी लोकसभा चुनाव में ही होगा।
देखना यह भी होगा कि जिस अखिलेश सरकार की उपलब्धियों के बल पर मुलायमसिंह यादव दिल्ली दरबार पर कब्जा करने का सपना संजो रहे हैं, वह जनता की कसौटी पर कितना खरा उतरती है।
नौकरशाही के सामने रहे बेबस
नौकरशाही के सहयोग के बिना किसी भी सरकार को कामयाबी हासिल कर पाना आसान नहीं होता। इस पैमाने पर अखिलेश सरकार अब तक बेबस और कमजोर ही नजर आई है।
दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के मामले में सरकार की मिसहैंडलिंग के साथ-साथ नजर यह आया कि सरकार नौकरशाही को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करना चाहती है।
इस मामले में सरकार की किरकिरी भी खूब हुई। नौकरशाही का सहयोग न मिल पाने के कारण मुख्यमंत्री अखिलेश को एक समारोह में यह कहने को मजबूर होना पड़ा कि पढ़े-लिखे आईएसएस अफसरों से काम लेना बेहद मुश्किल है।
अफसरों के असहयोग के कारण सपा के सीनियर लीडर रामगोपाल यादव को कहना पड़ा था कि वे बगैर आईएएस के सरकार चला लेंगे। पिछली बसपा सरकार के चर्चित अफसरों को मिलने वाला महत्व भी नौकरशाही के बड़े हिस्से को हतोत्साहित कर रहा है।
कानून-व्यवस्था में फेल
किसी भी सरकार के इकबाल का असर कानून-व्यवस्था की स्थिति से होता है। इस पैमाने पर सरकार फिलहाल लड़खड़ाती नजर आ रही है, क्योंकि पिछले साल अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ा है।
न केवल हत्या व अपहरण बल्कि महिलाओं पर हिंसा के मामलों में क्रमश: .30 फीसदी, 4.45 व 5.12 फीसदी का इजाफा हुआ है।
मुख्यमंत्री और सरकार में बैठे कई लोग यह मानते हैं कि पुलिस ही सरकार की छवि बनाती-बिगाड़ती है, इसके बावजूद अपराधों को रोकने के लिए पुलिस को चाक चौबंद करने का कोई फॉर्मूला नहीं निकाला गया।
हालांकि कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति को लेकर सरकार चितिंत भी नजर आती है। एक अवसर पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को गुस्से में कहना पड़ा कि अगर वह मुख्यमंत्री होते तो 15 दिन में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधार लेते।
दंगे बड़ा दाग, कैसे छुटा पाएंगे आप?
यूं तो इस सरकार के कार्यकाल के दौरान 100 से अधिक और 27 बड़े दंगे हुए, पर अखिलेश सरकार के सबसे बड़े फैल्योर आकलन किया जाए तो वह मुजफ्फरनगर दंगा ही होगा। दंगों ने सरकार और सियासत को हिला कर रख दिया। इस दौरान अखिलेश सरकार की मिसहैंडलिंग भी उजागर हुई। मुजफ्फरनगर दंगे में 55 से अधिक बेगुनाह मारे गए।
छींटें सरकार में बैठे महत्वपूर्ण लोगों के दामन पर भी आए। दंगों के बाद भी सरकार ने इस मामले से निपटने की रणनीति जिस तरह से बनाई, वह भी सवालों के घेरे में आई।
तभी तो पहले एक साल तक सरकार का साथ निभा रहे बरेली के मौलाना तौकीर रजा ने कहा था कि सरकार जिस तरह से दंगों को हैंडिल कर रही है, उससे न मुसलमानों का कुछ भला हो रहा है और न ही समाज का।
मुख्यमंत्री ने भी इस दंगे की तासीर महसूस की। तभी तो उन्होंने विधानसभा में कहना पड़ा कि मुजफ्फरनगर दंगे मेरे राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दाग हैं जो कभी मिट नहीं सकते।
अधूरे छूटते रहे जो वादे...
गरीबों को साड़ी-कंबल
गरीबी रेखा के नीचे वाले 65 वर्ष के बुजुर्गों को कंबल और 18 वर्ष से ऊपर की महिलाओं को दो-दो साड़ी देने की योजना बजट में 800 करोड़ रुपये की व्यवस्था करने के बाद भी लटकी है।
भूमि अधिग्रहण नीति
किसानों को उनकी जमीन का छह गुना मुआवजा देने के लिए नई भूमि अधिग्रहण नीति लाने का वाता किया था। केंद्र सरकार ने तो दो से चार गुना मुआवजा वाली नीति तो लागू कर दी लेकिन सपा सरकार चुप्पी साधे बैठी है।
टैबलेट ख्वाबों में
इंटर पास 15 लाख छात्रों को लैपटॉप तो बांट दिए लेकिन हाईस्कूल पास छात्रों को टैबलेट बांटने की शुरुआत इन दो सालों में भी नहीं हो पाई।