अखिलेश यादव बोले, योगी गाने नहीं सुनते इसलिए नदी किनारे घूमने नहीं जाते
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कैराना और नूरपुर के उपचुनाव में मिली जीत से उत्साहित सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रविवार को कला के मंच का भी खूब राजनीतिक इस्तेमाल किया और प्रदेश सरकार पर जमकर बोले। अलीगंज स्थित ललित कला अकादमी में कला प्रदर्शनी के उद्घाटन के मौके पर उन्होंने कहा कि मेरी कला तो 2022 में देखने को मिलेगी लेकिन यह तय है कि अगर हमारी सरकार आई तो कला और कलाकारों को फिर संरक्षण मिलेगा।
अखिलेश ने कहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार सम्मान तो नहीं दे रही है लेकिन हमने यशभारती की जो पेंशन शुरू की थी, उसे भी बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी सम्मान के साथ पेंशन नहीं देता है। हमने पेंशन इसलिए शुरू की कि कलाकारों को संसाधन उपलब्ध हो सकें। उन्होंने कहा कि ये जरूरी नहीं कि कला में जो बहुत ऊंचाई पर पहुंचे, उसके पास संसाधन हों। मेंहदी हसन जैसे प्रसिद्ध गजल गायक, मोहम्मद रफी जैसे प्रसिद्ध पार्श्व गायक बहुत सामान्य परिवार से आए थे।
गायिका जरीना बेगम को याद करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि बेगम अख्तर अवार्ड की पुरस्कार राशि उन्हें मिली तो उन्होंने उस पैसे से अपने बिजली बिल दिए, उधार चुकता किए, घर के काम किए। उन्होंने कहा कि जिसकी आवाज सभी ने सुनी थी, उसके पास आखिरी वक्त में भी पैसे नहीं थे। उन्होंने कहा कि सपा ने कला को बचाने का, आगे बढ़ाने का काम किया है और अगर सरकार आई तो फिर करेंगे। उन्होंने कहा कि राज्य ललित कला अकादमी में किसी राजनीतिज्ञ को नहीं कला से जुड़े लोगों को ही पद दिए जाएंगे।
वे गाने नहीं सुनते इसलिए नदी किनारे नहीं घूमते
अखिलेश ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी निशाना साधा और कहा कि लगता है वो गाने नहीं सुनते इसलिए नदी के किनारे नहीं घूमते। हमने रिवर फ्रंट के जरिए लोगों को घूमने की जगह दी लेकिन प्रदेश की वर्तमान सरकार ने रोमियो स्क्वायड बना दिया।
अखिलेश ने कहा कि हमने देश का सबसे सुंदर रिवर फ्रंट लखनऊ में बनाया लेकिन इस सरकार ने उसे बर्बाद कर दिया।
लोग गमले साथ ले जाते हैं, हमने क्या गलत किया?
अखिलेश यादव ने कहा कि लोग घर बदलते हैं तो अपने साथ गमले ले जाते हैं। अगर सरकारी आवास में खुद लगाए गए पेड़ हम अपने साथ ले गए तो इसमें गलत क्या है? उन्होंने कहा कि जो पेड़ हम ले गए वे हमारे पेड़ हैं, सरकारी पेड़ नहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हम लखनऊ के नहीं हैं। हमारा गांव तो सैफई है लेकिन जब से लखनऊ आए हैं, हमें यह शहर अपना लगता है।