बाबरी विध्वंस के बाद मुझे हुआ मुस्लिम होने का एहसास: शबाना
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असहिष्णुता और असुरक्षा की बहस में शाहरुख खान और आमिर खान सहित कई दूसरे कलाकारों के बाद प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी भी कूद पड़ी हैं।
लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल में शनिवार को उन्होंने कहा कि कुछ लोग आपकी सारी दूसरी पहचान को भुलाकर आपको हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई की पहचान देना चाहते हैं।
आज आपकी धार्मिक पहचान को ही महत्वपूर्ण बना दिया गया है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान को बचाने का अर्थ है देश की गंगा-जमुनी तहजीब और साझी संस्कृति को बचाना।
इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में चल रहे कार्निवाल में सर्वाधिक उपस्थिति शबाना के ही कार्यक्रम में दिखी। इस दौरान शबाना से संवाद-पटकथा लेखक अतुल तिवारी ने बातचीत की। शबाना ने अपने स्वभाव के अनुकूल अलग-अलग मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी।
उन्होंने कहा कि 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद मुझे पहली बार मुस्लिम होने का एहसास कराया गया। तब यह शब्द या तो मेरे लिए गाली की तरह प्रयोग किया जाता या फिर इतने प्यार से जैसे मैं कोई गुड़िया हूं।
'मैं हिंदुस्तानी हूं और मुसलमान भी'
उन्होंने कहा कि मैं एक औरत हूं, हिंदुस्तानी हूं, बीबी हूं, बेटी हूं, कलाकार हूं, सामाजिक कार्यकर्ता हूं और मुसलमान भी हूं। मेरा मुसलमान होना एक पक्ष है लेकिन आज दूसरी सारी पहचान को भुलाकर केवल आपके एक पक्ष को प्रमुखता दी गई है कि आप हिंदू हैं, मुसलमान हैं, सिख हैं या ईसाई हैं या कुछ और हैं।
उन्होंने कहा कि एक कश्मीरी हिंदू और कश्मीरी मुसलमान की संस्कृति में समानता हो सकती है जबकि एक कश्मीरी मुसलमान और एक तमिल मुसलमान की संस्कृति में काफी फर्क हो सकता है लेकिन धर्म के नाम पर उनमें समानता और विभिन्नता तलाशी जाती है।
शबाना ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है। इसे बचाकर ही लोकतंत्र को जीवित रखा जा सकता है। हम इतनी भाषाओं, इतने धर्मों के लोग हैं, इतनी संस्कृतियों के हैं कि किसी से असहमत हो जाना स्वाभाविक है। असहिष्णुता तो हमेशा से रही है, लेकिन अगर इसकी वजह से कानून-व्यवस्था का कोई संकट उत्पन्न होता है तो फिर उससे किस प्रकार व्यवहार हो, यह सरकार को विचार करना है।
मेरे पिता ने लौटा दिया था पद्मश्री
जब एक दर्शक ने सवाल किया कि उन्होंने अपने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए, तो शबाना ने कहा कि यह काम मेरे वालिद बहुत साल पहले कर चुके हैं। जब उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने की मांग हो रही थी, प्रदेश के एक मंत्री ने कहा था कि जो लोग ऐसी मांग कर रहे हैं उनका मुंह काला कर गदहे पर उल्टा बैठा देना चाहिए। मेरे पिता ने इस बयान के विरोध में पद्मश्री सम्मान लौटा दिया था।
जावेद के अलावा कोई और होता तो हो जाता तलाक
शबाना ने कहा कि जिस प्रकार मेरे शायर पिता और रंगकर्मी माता ने मेरी परवरिश की थी, जावेद अख्तर के अलावा किसी और से मेरा विवाह होता तो मेरा जल्द ही तलाक हो गया होता।
फॉर्मूला से अलग है समानांतर सिनेमा
शबाना ने कहा कि यह कहना गलत होगा कि समानांतर सिनेमा मर चुका है। यह आज एक नए अवतार में हमारे सामने है। समानांतर सिनेमा का मतलब सिर्फ यह नहीं कि केवल गांव के बारे में बात हो।
जो फिल्में फॉर्मूले को तोड़कर बनती है, फॉर्मूले से अलग बन रही हैं वह समानांतर सिनेमा है। ‘मसान’, ‘तलवार’ जैसी कई फिल्में हैं जो फॉर्मूले से अलग हैं। नए फिल्मकार नए विषयों को लेकर फिल्में बना रहे हैं। उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए।
स्मिता आजमी या शबाना पाटिल
स्मिता पाटिल से रिश्ते को लेकर शबाना ने कहा कि चूंकि एक ही फिल्मकार ने हम दोनों अभिनेत्रियों को फिल्मों में प्रस्तुत किया था तो लोगों के जेहन में यह बहुत आसानी से आ सकता था कि मैं शबाना पाटिल हो सकती थी या वह स्मिता आजमी हो सकती थीं। लोग हम दोनों को हमेशा साथ जोड़कर देखते हैं। वह बहुत कम उम्र में दुनिया से रुखसत हो गईं, लेकिन उनके काम की बदौलत ही उनके मरने के 30 साल बाद भी उनको याद किया जा रहा है।
‘अर्थ’ ने समझाया रील और रियल लाइफ में फर्क
अपनी पहली ही फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली शबाना ने बताया कि उनका बचपन बेहद सादगी से बीता। छोटे से घर में परवरिश हुई, लेकिन कभी चीजों का अभाव महसूस नहीं हुआ।
वालिद को पार्टी से 40 रुपये मिलते थे। मम्मी के रेडियो में नौकरी करने बाद स्थिति कुछ सुधरी। ‘अर्थ’ फिल्म प्रदर्शित होने के बाद उन्हें रील और रियल लाइफ में फर्क महसूस हुआ।
बेनेगल ने दूर कोने में बैठा दिया था
शबाना ने बताया कि ‘अंकुर’ फिल्म के दौरान ग्रामीण पृष्ठभूमि से ताल्लुक न होने के कारण काफी परेशानी हुई। फिल्म की शूटिंग के दौरान निर्देशक श्याम बेनेगल मुझसे नाराज थे। वे यूनिट के सभी लोगों के साथ खाना खा रहे थे, लेकिन मुझे ग्रामीण वेशभूषा में दूर कोने में बैठने को कहा।
इसी दौरान कुछ स्कूली बच्चे फिल्म की हीरोइन से मिलने वहां पहुंच गए। मुझसे बातचीत के दौरान उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं ही फिल्म की हीरोइन हूं। यह देखकर बेनेगल बेहद खुश हुए और उन्होंने मुझे साथ में बैठकर खाना खाने के लिए आमंत्रित किया।
खैराबादी ने लिखा ‘न किसी की आंख का नूर हूं’
शबाना ने बताया कि मेरे पति जावेद अख्तर ने अपने दादा मुश्तर खैराबादी की संपूर्ण रचनाओं को पांच खंडों में संगृहीत किया है। इस कार्य के दौरान पता चला कि ‘न किसी की आंख का नूर हूं’ बहादुर शाह जफर की नहीं, बल्कि मुश्तर खैराबादी की ही रचना है।
कैफी आजमी अकादमी के लिए मार्च तक का दिया है भरोसा
कैफी आजमी अकादमी के बारे में शबाना आजमी ने कहा कि जब मैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलने गई थी तो उन्होंने देरी पर अफसोस जताते हुए मार्च तक इसकी चाबी देने का भरोसा दिलाया। इस अकादमी को बनने में बहुत समय लग गया लेकिन मैं मार्च तक इंतजार करना चाहती हूं।
दर्शकों की मांग पर सुनाई नज्म ‘औरत’
शबाना ने दर्शकों की मांग पर कैफी आजमी की लिखी ‘औरत’ नज्म- ‘उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है’ तुझे सुनाया। यह 70 साल पहले लिखी गई थी।
कार्निवाल में गूंजी कव्वाली
कार्निवाल में शनिवार को कव्वाली भी गूंजी। साबरी ब्रदर्स ने ‘दमादम मस्त कलंदर’, ‘छाप तिलक सब छीनी’ सहित कई लोकप्रिय कव्वाली सुनाईं। वहीं, हिमांशु वाजपेयी ने अदबी लतीफे सुनाए। इस अवसर पर लघु फिल्म ‘खलील खान के फाख्ते’ भी दिखाई गई।
‘आसफी परिंदे’ कैलेंडर का लोकार्पण
शबाना ने समारोह में नगर के छायाकार आजेश जायसवाल के छायाचित्रों पर आधारित ‘आसफी परिंदे’ कैलेंडर का लोकार्पण भी किया। उनकी हाल की प्रदर्शनी के चयनित छायाचित्रों से वर्ष 2016 का यह कैलेंडर तैयार किया गया है।