ऐसे तो किसान आत्महत्या ही करेगा...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गन्ना किसान संकट में हैं। वे चीनी मिलों को गन्ना तो बेच रहे हैं लेकिन भुगतान को तरस रहे हैं।
चालू सीजन में किसानों ने प्रदेश की 119 चीनी मिलों को अब तक 11532.20 करोड़ रुपये मूल्य का गन्ना दिया लेकिन उन्हें भुगतान मिला है सिर्फ 3096.82 करोड़। यानी केवल 26.85 फीसदी।
प्रति क्विंटल बीस रुपये जो बाद में दिए जाने हैं उस हिसाब से भी देखें तो किसानों का 71.84 फीसदी गन्ना मूल्य बकाया है।
प्रदेश की सबसे बड़ी कैश क्रॉप गन्ने के किसान परेशानी से तो पिछले साल से ही हैं। पिछले साल के गन्ना मूल्य का अभी तक पूरा भुगतान नहीं हो पाया है।
चालू सीजन में स्थिति में और विकट होती जा रही है। पहले चीनी मिलें देरी से चलने से कारण गेहूं की बोवाई पिछड़ गई। मिलें चलीं तो भुगतान अटक गया।
करीब डेढ़ माह से चालू पेराई सत्र में गन्ना मूल्य बकाया हर रोज बढ़ता जा रहा है।
दो किस्तों में गन्ना मूल्य अदा करने की सुविधा देते वक्त मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने दावा किया था कि चीनी मिलें 260 रुपये प्रति क्विंटल की दर से तत्काल भुगतान करेंगी।
शेष 20 रुपये क्विंटल का भुगतान पेराई सीजन के अंत में कर दिया जाएगा। उनका दावा सीजन शुरू होने के साथ ही ढेर हो गया।
260 रुपये क्विटंल की दर से देखें तो किसानों ने चीनी मिलों को 10996 करोड़ का गन्ना आपूर्ति किया है। इसके विपरीत उन्हें भुगतान मिला है मात्र 3096 करोड़।
नियमानुसार गन्ना विभाग 14 दिन पहले खरीदे गए गन्ने का मूल्य ही देय मानता है। 14 दिन पहले तक किसान 8683.13 करोड़ रुपये मूल्य का गन्ना चीनी मिलों को दे चुके थे। यह भुगतान 35.66 प्रतिशत बैठता है।
इसमें निजी चीनी क्षेत्र की 95 मिलों ने 32.46 फीसदी, 23 सहकारी मिलों ने 60.31 प्रतिशत और चीनी निगम की एकमात्र मिल ने 74.30 फीसदी गन्ना मूल्य भुगतान किया है।
सरकार किसानों की या पूंजीपतियों की
अदालत में गन्ना मूल्य की लड़ाई लड़ने वाले राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह का कहना है कि गन्ना मूल्य न मिलने पर किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु मांग रहे हैं।
सरकार किसानों के हक में होने वाले कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करा रही। सरकार को खुद चिंतन करना चाहिए कि वह किसानों की है या पूंजीपतियों की।