पुष्टाहार पर अफसरों का बड़ा खेल, बिना टेंडर बांटी 700 करोड़ की पंजीरी
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यूपी में बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पंजीरी बांटने में करोड़ों रुपये का घपला हुआ है। साल भर विभाग के अफसर बिना टेंडर पंजीरी बंटवाने का खेल करते रहे और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले टेंडर प्रक्रिया पूरी करने का नाटक शुरू कर दिया। चुनाव आयोग तक को अंधेरे में रखकर इजाजत ले ली।
हालांकि, चुनाव नतीजे आने के एक दिन पहले यानी 10 मार्च को जब फाइनल अनुमति के लिए इसकी फाइल तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास पहुंची तो उन्होंने इस पर दस्तखत करने से इन्कार कर दिया। नतीजतन, वर्क ऑर्डर जारी नहीं हो पाने के चलते चयनित फर्में जिलों में पंजीरी आपूर्ति का काम शुरू नहीं कर पाईं।
सूबे में अभी पौने दो लाख आंगनबाड़ी केंद्र चलाए जा रहे हैं। बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग इन केंद्रों के माध्यम से हर महीने छह वर्ष तक के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पंजीरी बंटवाता है। इस पर प्रति माह 58 करोड़ रुपये का खर्च आता है। यानी पूरे साल 696 करोड़ रुपये पंजीरी बांटने पर खर्च होता है।
14 अप्रैल 2016 को पंजीरी वितरण का टेंडर खत्म हो चुका था। इसके बाद वित्तीय वर्ष 2016-17 में अफसर और राजनेता चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए बिना टेंडर निकाले ही पंजीरी बंटवाते रहे।
टेंडर प्रक्रिया में भी खेल
टेंडर प्रक्रिया में खेल करते हुए नियम-शर्तें इस तरह रखी गईं कि छोटी और मझोली फर्में दौड़ से बाहर हो गईं। इसी बीच आचार संहिता लग गई। इस पर अफसरों ने पंजीरी बांटने को महत्वपूर्ण कल्याणकारी कार्यक्रम बताते हुए चुनाव आयोग से टेंडर प्रक्रिया पूरी करने की इजाजत मांगी।
आयोग ने इस शर्त पर अनुमति दी कि आचार संहिता के दौरान प्रदेश सरकार या विभाग इस योजना का बिल्कुल भी प्रचार-प्रसार नहीं करेंगी। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली गई।
10 में से आठ फर्में एक ही ग्रुप की
नियम तो कहता है कि टेंडर प्रक्रिया अपनाकर सबसे कम रेट देने वाले ठेकेदार या फर्म को ही पंजीरी आपूर्ति का जिम्मा सौंपा जाना चाहिए था। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, पूरे वित्तीय वर्ष में 10 अलग-अलग फर्मों से पंजीरी खरीदी गई, जिसमें से शराब व्यवसाय से जुड़े एक ही ग्रुप की 8 फर्में हैं।
इन्हें पंजीरी देने का है नियम
राज्य सरकार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से छह वर्ष तक के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पंजीरी बंटवाती है, ताकि वे कुपोषण का शिकार न हों।
7 माह से 3 वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रतिदिन 120 ग्राम, 3-6 वर्ष तक के बच्चों के लिए 50 ग्राम प्रतिदिन और गर्भवती महिलाओं को 140 ग्राम प्रतिदिन के हिसाब से पंजीरी देने का नियम है।
सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर हर महीने की 5, 15 और 25 तारीख को पंजीरी बांटने के निर्देश हैं। इन तारीखों पर छुट्टी पड़ने पर उसके अगले दिन पंजीरी वितरित किए जाने का प्रावधान है।
नई टेंडर प्रक्रिया एक नजर में
22 नवंबर : टेंडर का विज्ञापन निकाला गया। 26 दिसंबर को टेंडर खोले गए जबकि चुनाव आयोग से 28 फरवरी को अनुमति ली गई। इसके बाद तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव के पास 10 मार्च को फाइल पहुंची तो उन्होंने दस्तखत करने से इनकार कर दिया।
प्रमुख सचिव, बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग डिंपल वर्मा से पांच सवाल
जवाब : यह टेंडर 14 अप्रैल 2016 को समाप्त हो गया था।
सवाल : नए टेंडर के लिए प्रक्रिया क्यों समय से पूरी नहीं की गई?
जवाब : नियमों में काफी बदलाव प्रस्तावित थे। मसलन, ई-टेंडरिंग का निर्णय लिया गया। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के नियमों की रोशनी में टेंडर मांगे जाने थे। इसलिए फाइल कैबिनेट, न्याय और वित्त विभाग के बीच रही। नतीजतन समय से टेंडर आमंत्रित नहीं किए जा सके।
सवाल : क्या यह सही है कि अप्रैल 2016 से मार्च 2017 के बीच पंजीरी की आपूर्ति करने वाली 10 में से 8 फर्में एक ही शराब व्यवसायी की हैं?
जवाब : इस बारे में फाइल देखकर ही कुछ कह पाऊंगी।
सवाल : चालू वित्त वर्ष में किसके आदेश से पंजीरी खरीद के लिए बार-बार कैबिनेट नोट बनता रहा?
जवाब : इस मामले में कैबिनेट ने सीएम को अधिकृत कर दिया था। अगर कैबिनेट यह फैसला नहीं लेती तो योजना बीच में ही रुक जाती और बच्चों व गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक खाद्य सामग्री नहीं मिल पाती।
सवाल : क्या आपको नहीं लगता कि पंजीरी वितरण में नियमों का पालन नहीं किया गया?
जवाब : टेंडर प्रक्रिया से संबंधित फाइल हमारे दफ्तर में रुकी नहीं । ज्यादातर समय ये पंचम तल (सीएम दफ्तर), न्याय और वित्त विभाग में रही । 10 मार्च को जब प्रक्रिया ‘ओके’ हुई तो हमने नई सरकार के गठन तक इसे आगे बढ़ाने से इन्कार कर दिया।