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टूट रहा ध्यानचंद और धोनी बनने का सपना
Updated Mon, 28 Aug 2017 10:15 PM IST
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टूट रहा ध्यानचंद और धोनी बनने का सपना
एकमात्र स्टेडियम में दस खेलों के संचालन की स्वीकृति
महज छह खेलों के खिलाड़ियों को मिल रहा प्रशिक्षण
बहराइच। जिले में खेल गतिविधियां औपचारिकता भर रह गई हैं। कोच के अभाव में नवोदित प्रतिभाएं निखर नहीं पा रहीं। खिलाड़ियों के लिए अत्याधुनिक संसाधनोें का भी टोटा है। नतीजा मेजर ध्यानचंद, धोनी और सचिन जैसा खिलाड़ी बनने का सपना मंडलीय चयन ट्रायल तक पहुंचकर टूट रहा है। शहर स्थित एकमात्र स्टेडियम में शासन से दस खेलों के शिविर संचालन की स्वीकृति है। मगर यहां चार खेलों के तो कोच ही नहीं हैं। प्रशिक्षक के अभाव में खिलाड़ियों की प्रतिभा निखर नहीं पा रही। स्टेडियम पुलिस या आर्मी की भर्ती दौड़ का मैदान बनकर रह गया है।
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की सोमवार को जयंती है। यह दिन राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। खेल विभाग ध्यानचंद के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनका जन्म दिवस तो मनाता है, लेकिन खिलाड़ियों की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देता है। जिले में खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए शहर के सिविल लाइंस क्षेत्र में इंदिरा गांधी स्टेडियम बना है। कुछ खिलाड़ी यहां खेलकर प्रदेश स्तर तक पहुंचने में सफल रहे हैं, लेकिन ग्रामीण अंचलों में स्थित मिनी स्टेडियम बदहाल हैं। वहीं स्कूल-कॉलेजों में तो खेल गतिविधियों के नाम पर सिर्फ फीस ही वसूली जाती है, न सुविधाएं दी जाती हैं औैर न ही समुचित आयोजन होते हैं। जिले के तमाम विद्यालयों के पास अपना खेल मैदान तक नहीं है। नतीजा प्रदेश स्तर पर हो या राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतिभाएं निखर नहीं पाती हैं।
इन खेलों के हैं प्रशिक्षक
इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स स्टेडियम में खेल निदेशालय से बैडमिंटन, हॉकी, क्रिकेट, कुश्ती फुटबॉल, स्विमिंग, हैंडबॉल, ताइक्वांडो, एथलेटिक्स, वालीबॉल खेलों के संचालन की स्वीकृति है। लेकिन वर्तमान में हैंडबाल, एथलेटिक्स, ताइक्वांडों और वालीबॉल के कोच नहीं हैं।
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लाखों का बजट, प्रतियोगिताएं एक भी नहीं
जिला खेल कार्यालय को निदेशालय स्तर से कर्मचारियों के वेतन, मानदेय व रख-रखाव के लिए डेढ़ लाख, अस्थाई खेल सामग्रियों की खरीद-फरोख्त के लिए 25 हजार रुपये और करीब 2 लाख रुपये प्रादेशिक स्तर की प्रतियोगिता के आयोजन के लिए आवंटित किया गया है। लेकिन स्टेडियम राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तरस रहा है।
बहुउद्देश्यीय भवन की हालत नहीं सुधरी
इंदिरा गांधी स्टेडियम में वर्ष 2002 में विधायक निधि से करीब एक करोड़ की लागत से निर्मित बहुउद्देश्यीय भवन देखभाल व उपयोग में न लिए जाने के कारण जर्जर स्थिति में है। वर्ष 2012 के अगस्त माह में तत्कालीन जिलाधिकारी किंजल सिंह ने बहुउद्देश्यीय भवन के जीर्णोद्धार के लिए प्रस्ताव तैयार किया। इसकी मरम्मत व सौंदर्यीकरण पर 54 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया। इस प्रस्ताव को शासन के समक्ष भेजा गया। शासन ने इस प्रस्ताव पर मुहर भी लगाई, लेकिन मरम्मत आज तक नहीं हुई।
बिना कोच भाई-बहन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमके
शहर के मोहल्ला खत्रीपुरा निवासी शूटिंग के राष्ट्रीय चैंपिंयन रहे आलोक श्रीवास्तव की प्राथमिक कक्षा के छात्र अंशी व उसका भाई अंश बीते दो साल से ताइक्वांडो के खेल में स्टार बनकर उभरे हैं। स्टेडियम में कोच न होने के बावजूद निजी कोचिंग कर भाई-बहनों ने राष्ट्रीय स्तर पर आधा दर्जन प्रतियोगिताओं में मेडल हासिल किए। वहीं, नेपाल, भूटान में हुई प्रतियोगिताओं में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
कोच की कमी, संसाधनों की नहीं
जिला क्रीड़ा अधिकारी एआर अंसारी ने कहा कि बहराइच में तैनाती के बाद से वह लगातार खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रयासरत हैं। नतीजा भी दिख रहा है। स्कूल व कॉलेजों में भी ज्यादा से ज्यादा खेल गतिविधियां आयोजित की जाएं, जिसके सहयोग के लिए जिले के सभी प्रधानाचार्यों को पत्र लिखा गया है। कहते हैं कि स्टेडियम में कोच की कमी के कारण प्रशिक्षण प्रभावित होता है, लेकिन संसाधनों की कमी नहीं है। कोच की तैनाती के लिए निदेशालय से पत्राचार किया जा रहा है।
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एकमात्र स्टेडियम में दस खेलों के संचालन की स्वीकृति
महज छह खेलों के खिलाड़ियों को मिल रहा प्रशिक्षण
बहराइच। जिले में खेल गतिविधियां औपचारिकता भर रह गई हैं। कोच के अभाव में नवोदित प्रतिभाएं निखर नहीं पा रहीं। खिलाड़ियों के लिए अत्याधुनिक संसाधनोें का भी टोटा है। नतीजा मेजर ध्यानचंद, धोनी और सचिन जैसा खिलाड़ी बनने का सपना मंडलीय चयन ट्रायल तक पहुंचकर टूट रहा है। शहर स्थित एकमात्र स्टेडियम में शासन से दस खेलों के शिविर संचालन की स्वीकृति है। मगर यहां चार खेलों के तो कोच ही नहीं हैं। प्रशिक्षक के अभाव में खिलाड़ियों की प्रतिभा निखर नहीं पा रही। स्टेडियम पुलिस या आर्मी की भर्ती दौड़ का मैदान बनकर रह गया है।
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की सोमवार को जयंती है। यह दिन राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। खेल विभाग ध्यानचंद के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनका जन्म दिवस तो मनाता है, लेकिन खिलाड़ियों की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देता है। जिले में खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए शहर के सिविल लाइंस क्षेत्र में इंदिरा गांधी स्टेडियम बना है। कुछ खिलाड़ी यहां खेलकर प्रदेश स्तर तक पहुंचने में सफल रहे हैं, लेकिन ग्रामीण अंचलों में स्थित मिनी स्टेडियम बदहाल हैं। वहीं स्कूल-कॉलेजों में तो खेल गतिविधियों के नाम पर सिर्फ फीस ही वसूली जाती है, न सुविधाएं दी जाती हैं औैर न ही समुचित आयोजन होते हैं। जिले के तमाम विद्यालयों के पास अपना खेल मैदान तक नहीं है। नतीजा प्रदेश स्तर पर हो या राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतिभाएं निखर नहीं पाती हैं।
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इन खेलों के हैं प्रशिक्षक
इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स स्टेडियम में खेल निदेशालय से बैडमिंटन, हॉकी, क्रिकेट, कुश्ती फुटबॉल, स्विमिंग, हैंडबॉल, ताइक्वांडो, एथलेटिक्स, वालीबॉल खेलों के संचालन की स्वीकृति है। लेकिन वर्तमान में हैंडबाल, एथलेटिक्स, ताइक्वांडों और वालीबॉल के कोच नहीं हैं।
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लाखों का बजट, प्रतियोगिताएं एक भी नहीं
जिला खेल कार्यालय को निदेशालय स्तर से कर्मचारियों के वेतन, मानदेय व रख-रखाव के लिए डेढ़ लाख, अस्थाई खेल सामग्रियों की खरीद-फरोख्त के लिए 25 हजार रुपये और करीब 2 लाख रुपये प्रादेशिक स्तर की प्रतियोगिता के आयोजन के लिए आवंटित किया गया है। लेकिन स्टेडियम राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तरस रहा है।
बहुउद्देश्यीय भवन की हालत नहीं सुधरी
इंदिरा गांधी स्टेडियम में वर्ष 2002 में विधायक निधि से करीब एक करोड़ की लागत से निर्मित बहुउद्देश्यीय भवन देखभाल व उपयोग में न लिए जाने के कारण जर्जर स्थिति में है। वर्ष 2012 के अगस्त माह में तत्कालीन जिलाधिकारी किंजल सिंह ने बहुउद्देश्यीय भवन के जीर्णोद्धार के लिए प्रस्ताव तैयार किया। इसकी मरम्मत व सौंदर्यीकरण पर 54 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया। इस प्रस्ताव को शासन के समक्ष भेजा गया। शासन ने इस प्रस्ताव पर मुहर भी लगाई, लेकिन मरम्मत आज तक नहीं हुई।
बिना कोच भाई-बहन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमके
शहर के मोहल्ला खत्रीपुरा निवासी शूटिंग के राष्ट्रीय चैंपिंयन रहे आलोक श्रीवास्तव की प्राथमिक कक्षा के छात्र अंशी व उसका भाई अंश बीते दो साल से ताइक्वांडो के खेल में स्टार बनकर उभरे हैं। स्टेडियम में कोच न होने के बावजूद निजी कोचिंग कर भाई-बहनों ने राष्ट्रीय स्तर पर आधा दर्जन प्रतियोगिताओं में मेडल हासिल किए। वहीं, नेपाल, भूटान में हुई प्रतियोगिताओं में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
कोच की कमी, संसाधनों की नहीं
जिला क्रीड़ा अधिकारी एआर अंसारी ने कहा कि बहराइच में तैनाती के बाद से वह लगातार खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रयासरत हैं। नतीजा भी दिख रहा है। स्कूल व कॉलेजों में भी ज्यादा से ज्यादा खेल गतिविधियां आयोजित की जाएं, जिसके सहयोग के लिए जिले के सभी प्रधानाचार्यों को पत्र लिखा गया है। कहते हैं कि स्टेडियम में कोच की कमी के कारण प्रशिक्षण प्रभावित होता है, लेकिन संसाधनों की कमी नहीं है। कोच की तैनाती के लिए निदेशालय से पत्राचार किया जा रहा है।