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50 साल में गायब हो गईं 320 भाषाएं
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 20 Jul 2013 11:03 AM IST
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देश की भाषाई विविधता पर खतरा बरकरार है। भाषाओं को संरक्षण नहीं मिलना, उनके विलुप्त होने की वजह बन रहा है।
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एक निजी प्रकाशक के भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण (पीएलएसआई) में इसके प्रमाण मिले हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक 50 साल में करीब 320 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं। यह सर्वे पहाड़ों, उत्तर-पूर्वी इलाकों से लेकर समुद्री इलाकों तक में करीब दो साल के दरम्यान किया गया।
पीएलएसआई के अध्यक्ष डॉ. जीएन देवी ने शुक्रवार को यहां प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 1961 की जनगणना में 1652 बोलियों की मौजूदगी के प्रमाण हैं।
इनमें से करीब 1100 को भाषा का दर्जा मिला हुआ है। कुछ भाषाओं के अलग-अलग नाम होने की वजह से यह आंकड़ा बढ़ गया। नए सर्वेक्षण में अब हमें 780 भाषाएं ही मिली हैं।
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ऐसे में भारत में अब तक 29 प्रतिशत यानी 320 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं। संसद से मिले आंकड़ों पर डॉ. देवी ने कहा कि भाषाओं को बचाने के लिए नीति-निर्माताओं की तरफ से भी कोई कोशिश नहीं हो रही।
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निजी प्रकाशक ऑरिएंट ब्लैक स्वान के इस सर्वेक्षण को दिल्ली में पांच सितंबर को जारी किया जाएगा।
50 साल में अंग्रेजी को पछाड़ देगी हिंदी
डॉ. जीएन देवी ने कहा, सर्वेक्षण के मुताबिक अंग्रेजी पर हिंदी भारी पड़ रही है। 2011 के आंकड़ों के अनुसार देश में 38 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं।
2001 की जनगणना में यह आंकड़ा केवल 26 करोड़ था। अगर इसी तेजी से हिंदी बोलने और जानने वाले लोगों की संख्या बढ़ी, तो 2060 में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा लोग हिंदी बोलने वाले होंगे।
चीन और अर्जेंटीना ऐसे देश हैं जहां भाषा की विविधता खत्म हो चुकी है। इसकी वजह वहां सरकारी स्तर पर एक ही भाषा का चुनाव रहा। यूनेस्को की रिपोर्ट खुद इस खतरे की तरफ इशारा करती है।
यूनेस्को का कहना है कि 21वीं सदी के अंत तक 6,000 में से केवल 300 भाषाएं ही दुनिया में बचेंगी। आने वाले समय में विविधता के चलते भारत बड़ी भाषाई पूंजी का मालिक होगा। -
यह है भारत में भाषाओं का इतिहास
1961 में 1652 बोलियां पाई गईं, इनमें से 1100 को भाषा का दर्जा
ताजा सर्वेक्षण में अब केवल 780 भाषाओं के मिलने के प्रमाण
लाहोलीः हिमाचल के लाहौल स्पीति जनपद के गांवों में बोली जाती थी।
अंडमानीः अंडमान निकोबार में 26 जनवरी 2010 को यह बोली जानने वाली अंतिम महिला की मौत हो गई।
नटः राजस्थान-गुजरात की सीमा पर मूल रूप से रहने वाले लोगों की बोली।
सिदीः इसको अफ्रीका से आकर महाराष्ट्र में बसे लोग बोलते थे।
केलदारः कर्नाटक में चंद लोग इस बोली को समझने वाले बचे हैं।
पारदीः यूपी में घुमंतू लोगों की बोली ।
सबरः यूपी की एक बोली, 1992 तक इसके होने के प्रमाण मिले हैं।