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रायबरेली की सियासत में बदला दिखा भाई-बहन का किरदार
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रजनीकांत तिवारी
रायबरेली। चेहरे वही थे।... दस्तूर भी वही था। कुछ बदला था तो बस रायबरेली की सियासत में भाई-बहन का किरदार। अमेठी से चौथी बार नामांकन दाखिल करने वाले राहुल गांधी इस बार पार्टी मुखिया के तौर पर नए किरदार में दिखे।
चुनाव में हर बार सारथी की भूमिका में उनके साथ नजर आने वाली बहन प्रियंका भी अबकी जुदा किरदार में पार्टी की वफादार सिपाही बनकर डटीं दिखीं।
सियासी समीकरणों को साधते हुए रायबरेली सांसद सोनिया गांधी भी पहुंचीं लेकिन इस बार वह पार्टी अध्यक्ष के नाते नहीं बल्कि बेटे राहुल गांधी को फिर से नई पारी के लिए आशीष देने की मुद्रा में नजर आईं।
2004 में अमेठी सीट से सियासी पारी शुरू करने वाले राहुल गांधी हर बार पार्टी पदाधिकारी के तौर पर नामांकन दाखिल करते आए हैं।
2009 व 2014 के लोकसभा चुनाव में भी नामांकन के लिए पहुंचे राहुल पार्टी के एक वफादार सिपाही के तौर पर डटे थे। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी भूमिका बदली दिखी।
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इस बार वह पार्टी के मुखिया के तौर पर परचा दाखिल करने पहुंचे थे। हर बार नामांकन से लेकर भाई राहुल के पूरे चुनाव का प्रबंधन संभालने वाली उनकी बहन प्रियंका वाड्रा का कद भी बदला दिखा।
अब वह सिर्फ बहन के तौर पर नहीं बल्कि पार्टी महासचिव के ओहदे से चुनाव की कमान संभाल रहीं हैं। जनवरी 2019 में पार्टी संगठन में अपनी जगह बनाने वाली प्रियंका इस बार भाई की जीत के साथ पार्टी की कामयाबी को लेकर भी प्रदेश के कई जिलों को मथ रहीं हैं।
उनके बदले अंदाज ने विरोधियों के माथे पर सियासी बल ला दिया है। सियासी समीकरणों की बात करें रायबरेली सांसद व उनकी मां सोनिया गांधी भी इस बार चुनाव में बदले अंदाज में हैं।
कभी कांग्रेस के अध्यक्ष की भूमिका की तौर पर परचा दाखिल करने वाली सोनिया गांधी इस बार यूपीए अध्यक्ष के तौर पर मैदान में हैं।
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रायबरेली। चेहरे वही थे।... दस्तूर भी वही था। कुछ बदला था तो बस रायबरेली की सियासत में भाई-बहन का किरदार। अमेठी से चौथी बार नामांकन दाखिल करने वाले राहुल गांधी इस बार पार्टी मुखिया के तौर पर नए किरदार में दिखे।
चुनाव में हर बार सारथी की भूमिका में उनके साथ नजर आने वाली बहन प्रियंका भी अबकी जुदा किरदार में पार्टी की वफादार सिपाही बनकर डटीं दिखीं।
सियासी समीकरणों को साधते हुए रायबरेली सांसद सोनिया गांधी भी पहुंचीं लेकिन इस बार वह पार्टी अध्यक्ष के नाते नहीं बल्कि बेटे राहुल गांधी को फिर से नई पारी के लिए आशीष देने की मुद्रा में नजर आईं।
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2004 में अमेठी सीट से सियासी पारी शुरू करने वाले राहुल गांधी हर बार पार्टी पदाधिकारी के तौर पर नामांकन दाखिल करते आए हैं।
2009 व 2014 के लोकसभा चुनाव में भी नामांकन के लिए पहुंचे राहुल पार्टी के एक वफादार सिपाही के तौर पर डटे थे। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी भूमिका बदली दिखी।
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इस बार वह पार्टी के मुखिया के तौर पर परचा दाखिल करने पहुंचे थे। हर बार नामांकन से लेकर भाई राहुल के पूरे चुनाव का प्रबंधन संभालने वाली उनकी बहन प्रियंका वाड्रा का कद भी बदला दिखा।
अब वह सिर्फ बहन के तौर पर नहीं बल्कि पार्टी महासचिव के ओहदे से चुनाव की कमान संभाल रहीं हैं। जनवरी 2019 में पार्टी संगठन में अपनी जगह बनाने वाली प्रियंका इस बार भाई की जीत के साथ पार्टी की कामयाबी को लेकर भी प्रदेश के कई जिलों को मथ रहीं हैं।
उनके बदले अंदाज ने विरोधियों के माथे पर सियासी बल ला दिया है। सियासी समीकरणों की बात करें रायबरेली सांसद व उनकी मां सोनिया गांधी भी इस बार चुनाव में बदले अंदाज में हैं।
कभी कांग्रेस के अध्यक्ष की भूमिका की तौर पर परचा दाखिल करने वाली सोनिया गांधी इस बार यूपीए अध्यक्ष के तौर पर मैदान में हैं।