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कतर्नियाघाट में सूख रहे वन्य जीवों के हलक
Updated Tue, 08 May 2018 10:32 PM IST
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बहराइच/बिछिया। वन्य जीवों की सुरक्षा को लेकर सरकार भले ही बड़े दावे कर रही हो लेकिन कतर्निया में वन्य जीवों के लिए पानी का संकट खड़ा हो गया है। पानी के लिए वन्य जीवों को कोसों भटकना पड़ रहा है। जंगल में जो तालाब थे, वे सब सूख गए हैं। गेरुआ नदी पहले से ही सूखी है।
भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई है। वन विभाग पानी की कमी को देखते हुए भी चुप्पी मारे बैठा है। ऐसे में दुर्लभ वन्य जीवों बाघ और तेंदुओं के साथ हिरनों की जिंदगी पर खतरा उत्पन्न हो गया है। आए दिन वन्य जीव मैदानी इलाके का रुख कर रहे हैं।
प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने वाले कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में नदी व तालाबों का पानी सूख गया है। विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने वाले इस वन क्षेत्र में जीवों की जिंदगी पर संकट मंडराता दिख रहा है। 551 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले कतर्नियाघाट में लगभग 36 बाघ व 70 तेंदुए हैं।
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हिरनों के विभिन्न प्रजातियों की संख्या लगभग साढ़े चार हजार है। इनमें बारहसिंहा, काकर, पाढ़ा समेत अन्य वन्य जीव भी कतर्निया की शोभा हमेशा से बढ़ाते आए हैं। लेकिन इस समय वन्य जीवों के सामने पानी की विकराल समस्या उत्पन्न हो गई है। जंगल में पानी नाम मात्र ही बचा है।
मुर्तिहा व ककरहा रेंज में 12 वाटर पोल वन विभाग की ओर से अरसा पहले बनवाए गए थे। दर्जन भर तालाब व नाले भी हैं। लेकिन क्षेत्र में पड़ रही भीषण गर्मी से ये स्रोत सूखने की कगार पर हैं। पानी का संकट हो गया है। नेपाल से बहने वाली गेरुआ नदी पहले ही सूख चुकी है।
कौड़ियाला के साथ सरयू नहर बैराज में ही थोड़ा पानी बचा है। उसी के सहारे आसपास के वन्य जीव अपनी प्यास बुझा रहे हैं। इतने बड़े क्षेत्रफल में फैले जंगल के अन्य वन्य जीव अपना हलक कैसे तर करेंगे, ये एक बड़ा सवाल है। इस बात को वन विभाग भी बखूबी जानता है। लेकिन किस तरह इस समस्या से निपटा जाए, इसका अंदाजा वन विभाग नहीं लगा पा रहा है।
आबादी की ओर बढ़े कदम
प्यास बुझाने के लिए जंगल में स्थित गांवों की ओर वन्य जीवों ने कदम बढ़ा दिए हैं। अप्रैल से अब तक 13 हमले हो चुके हैं। दो दिन पूर्व कतर्नियाघाट रेंज में तेंदुए ने दो घरों में घुसकर मवेशियों को निवाला बनाया था।
परिवारीजन मकान के अंदर थे, जिससे बच गए। लेकिन वन विभाग सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं कर सका है। विभागीय अधिकारी भी इस मामले में कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।
मुर्तिहा व धर्मापुर रेंज में अधिक दिक्कत
वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि मुर्तिहा व धर्मापुर में एक भी प्राकृतिक जलस्रोत नहीं है। जल विभाग की ओर से कुछ वाटर पोल बनवाए गए थे, उसका पानी गर्मी में सूखने की कगार पर है। उन्होंने कहा कि इन रेंजों के वन्य जीवों को पानी की तलाश में 60 से 70 किलोमीटर भटकना पड़ता है।
जंगल में वन्य जीवों के पानी की व्यवस्था के लिए ट्यूबवेल उपलब्ध नहीं है, जिससे जल स्रोतों को भराया जा सके। सिर्फ कुदरती व्यवस्था है। फिर भी अभी कुछ क्षेत्र में पानी है। कतर्निया घाट व निशानगाड़ा रेंज के नदी व नालों से ही वन्य जीवों की प्यास बुझती है।
-जीपी सिंह, डीएफओ
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भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई है। वन विभाग पानी की कमी को देखते हुए भी चुप्पी मारे बैठा है। ऐसे में दुर्लभ वन्य जीवों बाघ और तेंदुओं के साथ हिरनों की जिंदगी पर खतरा उत्पन्न हो गया है। आए दिन वन्य जीव मैदानी इलाके का रुख कर रहे हैं।
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प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने वाले कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में नदी व तालाबों का पानी सूख गया है। विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने वाले इस वन क्षेत्र में जीवों की जिंदगी पर संकट मंडराता दिख रहा है। 551 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले कतर्नियाघाट में लगभग 36 बाघ व 70 तेंदुए हैं।
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हिरनों के विभिन्न प्रजातियों की संख्या लगभग साढ़े चार हजार है। इनमें बारहसिंहा, काकर, पाढ़ा समेत अन्य वन्य जीव भी कतर्निया की शोभा हमेशा से बढ़ाते आए हैं। लेकिन इस समय वन्य जीवों के सामने पानी की विकराल समस्या उत्पन्न हो गई है। जंगल में पानी नाम मात्र ही बचा है।
मुर्तिहा व ककरहा रेंज में 12 वाटर पोल वन विभाग की ओर से अरसा पहले बनवाए गए थे। दर्जन भर तालाब व नाले भी हैं। लेकिन क्षेत्र में पड़ रही भीषण गर्मी से ये स्रोत सूखने की कगार पर हैं। पानी का संकट हो गया है। नेपाल से बहने वाली गेरुआ नदी पहले ही सूख चुकी है।
कौड़ियाला के साथ सरयू नहर बैराज में ही थोड़ा पानी बचा है। उसी के सहारे आसपास के वन्य जीव अपनी प्यास बुझा रहे हैं। इतने बड़े क्षेत्रफल में फैले जंगल के अन्य वन्य जीव अपना हलक कैसे तर करेंगे, ये एक बड़ा सवाल है। इस बात को वन विभाग भी बखूबी जानता है। लेकिन किस तरह इस समस्या से निपटा जाए, इसका अंदाजा वन विभाग नहीं लगा पा रहा है।
आबादी की ओर बढ़े कदम
प्यास बुझाने के लिए जंगल में स्थित गांवों की ओर वन्य जीवों ने कदम बढ़ा दिए हैं। अप्रैल से अब तक 13 हमले हो चुके हैं। दो दिन पूर्व कतर्नियाघाट रेंज में तेंदुए ने दो घरों में घुसकर मवेशियों को निवाला बनाया था।
परिवारीजन मकान के अंदर थे, जिससे बच गए। लेकिन वन विभाग सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं कर सका है। विभागीय अधिकारी भी इस मामले में कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।
मुर्तिहा व धर्मापुर रेंज में अधिक दिक्कत
वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि मुर्तिहा व धर्मापुर में एक भी प्राकृतिक जलस्रोत नहीं है। जल विभाग की ओर से कुछ वाटर पोल बनवाए गए थे, उसका पानी गर्मी में सूखने की कगार पर है। उन्होंने कहा कि इन रेंजों के वन्य जीवों को पानी की तलाश में 60 से 70 किलोमीटर भटकना पड़ता है।
जंगल में वन्य जीवों के पानी की व्यवस्था के लिए ट्यूबवेल उपलब्ध नहीं है, जिससे जल स्रोतों को भराया जा सके। सिर्फ कुदरती व्यवस्था है। फिर भी अभी कुछ क्षेत्र में पानी है। कतर्निया घाट व निशानगाड़ा रेंज के नदी व नालों से ही वन्य जीवों की प्यास बुझती है।
-जीपी सिंह, डीएफओ