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100 करोड़ की जमीन का घपला 40 साल बाद उजागर, अफसरों में मची खलबली
Fri, 18 Jan 2019 11:55 AM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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Published by: ishwar ashish
Updated Fri, 18 Jan 2019 11:55 AM IST
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- फोटो : डेमो
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जालसाजों ने दस्तावेज में हेराफेरी कर 100 करोड़ रुपये की जमीन को नाते-रिश्तेदारों के स्वामित्व में दर्ज करा दिया। बाद में इसे ऊंची कीमत पर बेच मोटी कमाई भी की। मामला सरोजनीनगर तहसील के बिजनौर परगना के भटगांव का है। इस जमीन का चकबंदी दस्तावेज 1977 में तैयार हुआ था।
चालीस साल से अधिक हुए, अब जाकर यह घपला सामने आया है। इस खेल में तात्कालिक राजस्व कर्मचारी शामिल हैं। एडीएम प्रशासन एसपी गुप्ता के स्तर पर हुई जांच में यह घपला सामने आने के बाद अफसरों में खलबली मची है।
वहीं डीएम ने इसकी जांच प्रभारी अधिकारी राजस्व अभिलेखागार व एसीएम चतुर्थ सलिल कुमार पटेल को सौंपी है। एसडीएम सरोजनीनगर कोर्ट में भी अवैध तौर से हथिया कर बेची गई जमीन पर बेदलखी कार्रवाई कराने को मुकदमा दर्ज कराया गया है।
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चालीस साल से अधिक हुए, अब जाकर यह घपला सामने आया है। इस खेल में तात्कालिक राजस्व कर्मचारी शामिल हैं। एडीएम प्रशासन एसपी गुप्ता के स्तर पर हुई जांच में यह घपला सामने आने के बाद अफसरों में खलबली मची है।
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वहीं डीएम ने इसकी जांच प्रभारी अधिकारी राजस्व अभिलेखागार व एसीएम चतुर्थ सलिल कुमार पटेल को सौंपी है। एसडीएम सरोजनीनगर कोर्ट में भी अवैध तौर से हथिया कर बेची गई जमीन पर बेदलखी कार्रवाई कराने को मुकदमा दर्ज कराया गया है।
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एसीएम चतुर्थ से भी मामले की जांच कर मांगी रिपोर्ट
जांच अधिकारी एडीएम प्रशासन ने बताया कि सरोजनीनगर (पूर्व में सदर) तहसील के बिजनौर परगना के भटगांव की जिस जमीन को हेराफेरी कर हड़पा गया, वह भू-दान यज्ञ कमेटी के नाम दर्ज हुई थी। वादी संजीवन लाल पुत्र प्रीतम बचानखेड़ा मजरा ग्राम भटगांव की ओर से एसडीएम सरोजनीनगर कोर्ट में धारा 144 यूपी राजस्व संहिता 2006 के तहत एक वाद दर्ज किया था।
एसडीएम सरोजनीनगर कोर्ट ने इस वाद को निरस्त कर दिया था। इसके खिलाफ वादी ने हाईकोर्ट की इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ में याचिका दायर की थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने जमीन के संबंध में अपर जिलाधिकारी स्तर के अधिकारी से जांच करा रिपोर्ट तलब की थी। एडीएम प्रशासन ने बताया कि प्रभारी अधिकारी राजस्व अभिलेखागार व एसीएम चतुर्थ से भी मामले की जांच कर 15 दिन में रिपोर्ट मांगी गई है।
एसडीएम सरोजनीनगर कोर्ट ने इस वाद को निरस्त कर दिया था। इसके खिलाफ वादी ने हाईकोर्ट की इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ में याचिका दायर की थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने जमीन के संबंध में अपर जिलाधिकारी स्तर के अधिकारी से जांच करा रिपोर्ट तलब की थी। एडीएम प्रशासन ने बताया कि प्रभारी अधिकारी राजस्व अभिलेखागार व एसीएम चतुर्थ से भी मामले की जांच कर 15 दिन में रिपोर्ट मांगी गई है।
ऐसे सामने आया सच
खसरा-खतौनी में मिले अलग-अलग आदेश और हस्ताक्षर
एडीएम प्रशासन स्तर से हुई इस मामले की जांच में सामने आया कि ग्राम भटगांव में धारा-52 का प्रकाशन 27 नवंबर 1965 को किया गया था। चकबंदी प्रक्रिया के दौरान प्रत्येक ग्राम का बंदोबस्त अभिलेख सीएच-45 दो प्रतियों में तैयार किया जाता है।
इसमें से एक प्रति सीएच 41 (खसरा) तहसील दस्तावेज में क्षेत्रीय लेखपाल के पास और दूसरी सीएच 45 खतौनी एक प्रति में राजस्व अभिलेखागार में सुरक्षित रहती है। तहसील स्तर पर लेखपाल के पास मौजूद दस्तावेजों की जांच में सामने आया कि 1966 से 1977 के बीच भू-दान यज्ञ कमेटी के नाम दर्ज खाते को खारिज कर जमीन को संजीवनलाल, रामपियारी, रामकुमारी व प्रीतम के नाम दर्ज कराया गया था। उक्त आदेशों का लेखपाल के पास उपलब्ध दस्तावेजों से मिलान कराया गया तो नाम परिवर्तन के ये आदेश दर्ज नहीं मिले।
इसी आधार पर इन्हें संदिग्ध व कूटरचित माना गया। इसके अलावा जब खसरा-खतौनी की जांच की गई तो एक जगह पर चकबंदी अधिकारी तो दूसरी जगह परगनाधिकारी के हस्ताक्षर मिले। इससे प्रविष्टि के फर्जी होने का अंदेशा हुआ।
एडीएम प्रशासन स्तर से हुई इस मामले की जांच में सामने आया कि ग्राम भटगांव में धारा-52 का प्रकाशन 27 नवंबर 1965 को किया गया था। चकबंदी प्रक्रिया के दौरान प्रत्येक ग्राम का बंदोबस्त अभिलेख सीएच-45 दो प्रतियों में तैयार किया जाता है।
इसमें से एक प्रति सीएच 41 (खसरा) तहसील दस्तावेज में क्षेत्रीय लेखपाल के पास और दूसरी सीएच 45 खतौनी एक प्रति में राजस्व अभिलेखागार में सुरक्षित रहती है। तहसील स्तर पर लेखपाल के पास मौजूद दस्तावेजों की जांच में सामने आया कि 1966 से 1977 के बीच भू-दान यज्ञ कमेटी के नाम दर्ज खाते को खारिज कर जमीन को संजीवनलाल, रामपियारी, रामकुमारी व प्रीतम के नाम दर्ज कराया गया था। उक्त आदेशों का लेखपाल के पास उपलब्ध दस्तावेजों से मिलान कराया गया तो नाम परिवर्तन के ये आदेश दर्ज नहीं मिले।
इसी आधार पर इन्हें संदिग्ध व कूटरचित माना गया। इसके अलावा जब खसरा-खतौनी की जांच की गई तो एक जगह पर चकबंदी अधिकारी तो दूसरी जगह परगनाधिकारी के हस्ताक्षर मिले। इससे प्रविष्टि के फर्जी होने का अंदेशा हुआ।