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#इलाज में लापरवाही की कहानियां: एक गलत इंजेक्शन और हमेशा के लिए बंद हो गई आंख

Mon, 15 Jul 2019 03:47 PM IST
Lalit fulara ललित फुलारा
Updated Mon, 15 Jul 2019 03:47 PM IST
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Stories of doctors negligence: A wrong injection taken patient life
मैं अपनी मौसी का चेहरा आज भी नहीं भूल पातीं। - फोटो : pixabay

मैं अपनी मौसी का चेहरा आज भी नहीं भूल पातीं। वह घर में सबसे छोटी थीं। मौसी के साथ बचपन की मेरी बहुत-सी यादें जुड़ी हैं। अब मौसी नहीं रहीं। चार साल पहले डॉक्टरों की एक लापरवाही ने मौसी की जिंदगी छीन ली। मैं उस वक्त दिल्ली में अपने ऑफिस में थी, देहरादून में मौसी मर चुकी थीं। खबर मिली तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ। बार-बार मौसी का चेहरा आंखों के आगे घूमने लगा। कानों में मौसी के आखिरी शब्द गूंजने लगे। फटाफट ऑफिस से घर आई और देहरादून के लिए रवाना हो गई।

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रास्ते में मैंने, मम्मी को कई बार फोन किया। हर बार ये ही पूछा- क्या यह सच है, मौसी नहीं रहीं। मम्मी उतनी बार जोर-जोर से रो दीं। एक दिन पहले ही मौसी से मेरी बात हुई थी और वह कह रही थीं- 'क्या करेगी आकर? मैं ठीक हूं। बाद में आना तू। ऑफिस के काम पर ध्यान दे।' और एक दिन बाद ही मम्मी का फोन आया, दो-तीन बार घंटी बजी लेकिन काम में व्यस्त होने की वजह से मैं फोन उठा नहीं पाई। मम्मी का फोन हर दिन आता है और जब मुझे वक्त मिलता है, बैक कॉल करती हूं। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। मुझे किसी अनहोनी की कोई आशंका नहीं थी। मैं तो खबरों की दुनिया में रमी हुई थी और मौसी के ऑपरेशन को भी भूल गई थी।
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Stories of doctors negligence: A wrong injection taken patient life
मुझे यह तक पता नहीं था कि मौसी की मौत हुई कैसे? - फोटो : pixabay
मुझे यह तक पता नहीं था कि मौसी की मौत हुई कैसे? बेहद मामूली-सा तो ऑपरेशन था। पथरी ही तो हुई थी और डॉक्टरों ने कहा था ऑपरेशन के बाद ठीक हो जाएंगी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि मेरी मौसी की आंखें कभी नहीं खुली। रास्ते भर मौसी को याद करती। कभी रो लेती और कभी आंसुओं को छिपाती मैं देहरादून पहुंचीं। तब जाकर पता चला कि मौसी को ऑपरेशन के बाद लगने वाला आखिरी इंजेक्शन गलत दे दिया गया था।

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Stories of doctors negligence: A wrong injection taken patient life
मौसी ऑपरेशन के बाद हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने वाली थीं। - फोटो : pixabay
मौसी ऑपरेशन के बाद हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने वाली थीं। हॉस्पिटल भी देहरादून का नामी गिरामी हॉस्पिटल था। मौसी को घर ले जाने के लिए परिवार एकजुट हुआ था। डिस्चार्ज से पहले नर्स ने उन्हें एक इंजेक्शन दिया और मौसी की तबियत बिगड़ गई। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये। मौसी को दूसरे हॉस्पिटल ले जाने के लिए कहा गया। आनन-फानन में मौसा जी और परिवार के दूसरे लोग, मौसी को लेकर दूसरे अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि मौसी मर चुकी हैं।

पथरी के बेहद मामूली से ऑपरेशन में मौत!

 

किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। ऐसी स्थिति में परिवार वालों का हाल ऐसा ही होता है। मौसा जी तो एकदम से टूट गए थे। नानी का रो-रोकर बुरा हाल था। मौसी का लड़का उस वक्त 12 साल का था और वह पौड़ी में था, हम सब देहरादून से मौसी के शव को पौड़ी ले जा रहे थे।

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मौसी पौड़ी में पढ़ाती थीं। मौसाजी भी शिक्षक ही हैं। बहुत दिनों से मौसी को रह-रहकर पेट में जोरों का दर्द उठ रहा था। अच्छे इलाज के लिए पौड़ी से देहरादून लाया गया था लेकिन मौसी का शव घर पहुंचा। नानी को बहुत समझाया लेकिन वह पोस्टमॉर्टम के लिए नहीं मानी और अस्पताल की बहुत बड़ी लापरवाही ऐसे ही दब गई। मौसी की उम्र 35 साल थी। हंसमुख और मिलनसार मौसी का चेहरा मैं आज तक नहीं भूल पाती। नानी से भी शिकायत है। अगर वह जिद नहीं करती तो मौसी के इलाज में लापरवाही बरतने वाले अस्पताल और डॉक्टरों को इसकी सजा जरूर मिलती।

(यह कहानी कल्पना (बदला हुआ नाम) से बातचीत पर आधारित है। कल्पना पेशे से पत्रकार हैं। ) 

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