#ऑफिस की बातें और लाइफ: मैंने फेयरवेल का केक काटा और दिल की बात कह डाली लेकिन उसने..!
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ऑफिस में मेरा आखिरी दिन था। अगली सुबह दूसरे शहर उड़ जाना था। पुराने साथियों ने एक छोटी-सी विदाई रखी थी। फटाफट सारी औपचारिकताओं को निपटाकर, हम एक बार में चल दिए। यह वही बार था जिसमें मेरी न जाने कितनी उदास शामें गुजरी थीं। मेरे भीतर का मैं, मुझसे यहीं मिलता था। बात करता था। दोस्तों के आने से पहले ही मैं यहां पहुंच जाया करता- चेहरों में कहानियां खोजता। दूसरों की हंसी में खुद की खुशी। थिरकते और मदमस्त होते लोगों में बचपन। कितने ही किस्से और कहानियां, मेरे भीतर चलती और भीतर ही मर जाती। कविताएं बोलतीं फिर चुप हो जातीं।
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ऑफिस में मेरा आखिरी दिन था। अगली सुबह दूसरे शहर उड़ जाना था। पुराने साथियों ने एक छोटी-सी विदाई रखी थी। फटाफट सारी औपचारिकताओं को निपटाकर, हम एक बार में चल दिए। यह वही बार था जिसमें मेरी न जाने कितनी उदास शामें गुजरी थीं। मेरे भीतर का मैं, मुझसे यहीं मिलता था। बात करता था। दोस्तों के आने से पहले ही मैं यहां पहुंच जाया करता- चेहरों में कहानियां खोजता। दूसरों की हंसी में खुद की खुशी। थिरकते और मदमस्त होते लोगों में बचपन। कितने ही किस्से और कहानियां, मेरे भीतर चलती और भीतर ही मर जाती। कविताएं बोलतीं फिर चुप हो जातीं।
तीन साल से ये ही सिलसिला चल रहा था और चौथे साल का दूसरा महीना था जब मेरी विदाई थी।
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कोमल भी विदाई में शामिल हुई। खुद की मर्जी से या किसी के कहने पर यह बात न मुझे जाननी थी और न ही मैं जानना चाहता था। उसे देखते ही मेरे भीतर की उदासी, खुशी में तब्दील हो गई। गाल खिंच गए और होंठ खुल गए। मैं भीतर से इतना खुश था कि उसका अभिवादन तक नहीं कर सका।
दोस्त सही ही कहते थे- 21वीं सदी में 18वीं का था मैं। खूब बातें हुई, जमकर थिरके और जाम का दौर चला। पीने के बाद अमित, बेंकटेश और आशुतोष ज्यादा ही भावुक हो गए और मैं गहरी उदासी में खो गया। अक्सर ऐसा ही होता है, मैं पीने से पहले जितना शांत रहता हूं, पीने के बाद उससे भी ज्यादा मौन मेरे भीतर बस जाता है।किसी पहाड़- सा सन्नाटे और नदी सी-शांति की तरह।
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तीनों जब खत्म कर चुके अपनी-अपनी बात तो सुरभि और अंकिता का नंबर आया। और फिर कोमल का!
कोमल ने कहा- शी विल मिस मी।
अब मुझे उसे फेसबुक पर रिक्वेस्ट भेज देनी चाहिए और खुद ही अपना नंबर दे देना चाहिए।
मेरी विदाई ही वो दिन था जब कोमल से मेरी जी भर बात हुई। दो साल से हम एक ही ऑफिस में थे। दूरी इतनी थी कि अगर मैं सीट से उचक कर देखता तो उसकी जुल्फें साफ झलकतीं। मीटिंग में हमारी नजरें मिल जाया करतीं। आते, जाते और खाते मुखातिब हो जाते लेकिन न हाई और न हैलो होती।
मैसेज टाइप करने के बाद मैंने फोन बंद कर दिया और जब फोन खोला तो उसने स्माइली का इमोजी भेजा था। आज हम दोनों पति-पत्नी हैं, बस यही हमारी कहानी है। अगर उस दिन वह मेरे फेयरवेल में नहीं आती तो मैं कभी उससे अपने दिल की बात नहीं कह पाता।
(यह एक काल्पनिक कहानी है। इसे लेखक ललित फुलारा द्वारा लिखा गया है। यदि आपके पास भी इस तरह की कहानियां हैं तो blog@auw.co.in पर साझा कर सकते हैं। )