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#ऑफिस की बातें और लाइफ: मैंने फेयरवेल का केक काटा और दिल की बात कह डाली लेकिन उसने..!

Sat, 13 Jul 2019 02:57 PM IST
Lalit fulara ललित फुलारा
Updated Sat, 13 Jul 2019 02:57 PM IST
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it was my last day in office she proposed me
Love and relationship - फोटो : Love and relationship

ऑफिस में मेरा आखिरी दिन था। अगली सुबह दूसरे शहर उड़ जाना था। पुराने साथियों ने एक छोटी-सी विदाई रखी थी। फटाफट सारी औपचारिकताओं को निपटाकर, हम एक बार में चल दिए। यह वही बार था जिसमें मेरी न जाने कितनी उदास शामें गुजरी थीं। मेरे भीतर का मैं, मुझसे यहीं मिलता था। बात करता था। दोस्तों के आने से पहले ही मैं यहां पहुंच जाया करता- चेहरों में कहानियां खोजता। दूसरों की हंसी में खुद की खुशी। थिरकते और मदमस्त होते लोगों में बचपन। कितने ही किस्से और कहानियां, मेरे भीतर चलती और भीतर ही मर जाती। कविताएं बोलतीं फिर चुप हो जातीं।


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ऑफिस में मेरा आखिरी दिन था। अगली सुबह दूसरे शहर उड़ जाना था। पुराने साथियों ने एक छोटी-सी विदाई रखी थी। फटाफट सारी औपचारिकताओं को निपटाकर, हम एक बार में चल दिए। यह वही बार था जिसमें मेरी न जाने कितनी उदास शामें गुजरी थीं। मेरे भीतर का मैं, मुझसे यहीं मिलता था। बात करता था। दोस्तों के आने से पहले ही मैं यहां पहुंच जाया करता- चेहरों में कहानियां खोजता। दूसरों की हंसी में खुद की खुशी। थिरकते और मदमस्त होते लोगों में बचपन। कितने ही किस्से और कहानियां, मेरे भीतर चलती और भीतर ही मर जाती। कविताएं बोलतीं फिर चुप हो जातीं।

तीन साल से ये ही सिलसिला चल रहा था और चौथे साल का दूसरा महीना था जब मेरी विदाई थी।

इसे भी पढ़ें- #किराये के कमरे और मैं: फिर अचानक मुझे आधी रात को फ्लैट छोड़ना पड़ा

कोमल भी विदाई में शामिल हुई। खुद की मर्जी से या किसी के कहने पर यह बात न मुझे जाननी थी और न ही मैं जानना चाहता था। उसे देखते ही मेरे भीतर की उदासी, खुशी में तब्दील हो गई। गाल खिंच गए और होंठ खुल गए। मैं भीतर से इतना खुश था कि उसका अभिवादन तक नहीं कर सका।

दोस्त सही ही कहते थे- 21वीं सदी में 18वीं का था मैं। खूब बातें हुई, जमकर थिरके और जाम का दौर चला। पीने के बाद अमित, बेंकटेश और आशुतोष ज्यादा ही भावुक हो गए और मैं गहरी उदासी में खो गया। अक्सर ऐसा ही होता है, मैं पीने से पहले जितना शांत रहता हूं, पीने के बाद उससे भी ज्यादा मौन मेरे भीतर बस जाता है।किसी पहाड़- सा सन्नाटे और नदी सी-शांति की तरह।

ऑफिस के आखिरी दिन प्यार
ऑफिस के आखिरी दिन प्यार - फोटो : pixabay
खैर, खूब मौज-मस्ती के बाद एक औपचारिक केक भी आया। केक पर कुछ नहीं लिखा था, लेकिन बगल में एक चिट थी जिसे कोई भी इंसान दूर से ही पढ़ सकता था। 18वीं सदी की प्यार भरी विदाई। मैं भीतर से भावुक था। शहर छूटने के साथ ही वो तमाम रिश्ते भी छूट रहे थे जो तीन सालों में मैंने कमाये थे। ये पुणे ही था जिसने मुझे पहली नौकरी दी थी। जो मुझे अपना घर-सा लगता था। अब मुझे दिल्ली को अपनाना था- जिसके बारे में मैंने सिर्फ अखबारों में चीखते शब्दों और टेलीविजन पर गूंजती आवाजों से ही जाना था।

 

प्याप
प्याप - फोटो : pixabay
सबने कुछ न कुछ कहा। मुझे किसी की कोई बात याद नहीं। सच कहूं तो मैंने गौर भी नहीं किया। मैं तो इंतजार कर रहा था कब छठवां नंबर आया और कोमल कुछ बोले। अमित, बेंकटेश और आशुतोष जितना वक्त ले रहे थे बोलने में, मुझे अंदर से उतनी ही खींज हो रही थी और आंखों से मैं कहना चाहता था- बस करो भाई। आगे बढ़ने दो, कहीं नशा ज्यादा हो गया तो याद भी नहीं रहेगा कोमल क्या बोली! 

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तीनों जब खत्म कर चुके अपनी-अपनी बात तो सुरभि और अंकिता का नंबर आया। और फिर कोमल का!

प्यार
प्यार - फोटो : pixabay
आपको जानना है न, कोमल ने क्या कहा?

कोमल ने कहा- शी विल मिस मी।

अब मुझे उसे फेसबुक पर रिक्वेस्ट भेज देनी चाहिए और खुद ही अपना नंबर दे देना चाहिए।

मेरी विदाई ही वो दिन था जब कोमल से मेरी जी भर बात हुई। दो साल से हम एक ही ऑफिस में थे। दूरी इतनी थी कि अगर मैं सीट से उचक कर देखता तो उसकी जुल्फें साफ झलकतीं। मीटिंग में हमारी नजरें मिल जाया करतीं। आते, जाते और खाते मुखातिब हो जाते लेकिन न हाई और न हैलो होती। 
 

प्यार में धोखे की कहानी
प्यार में धोखे की कहानी - फोटो : pixabay
12 जून 2012 ही वो तारीख है जब कोमल और मैंने जी भर बातें की। उसे अपना नंबर दिया और उससे उसका नंबर लिया जो कि पहले से ही मेरे मोबाइल में था लेकिन मैंने फिर से सेव किया। इसके बाद पुणे छूट गया और मैं दिल्ली आ गया। आने से पहले कोमल को एक लंबा मैसेज लिखकर मैंने अपनी दिल की सारी बात कह डाली। यहां तक बता दिया कि ऑफिस में उसे किस दिन से मैं दिल ही दिल पसंद करने लगा था। यह भी लिखा कि उसे देखकर मुझे हमेशा लगता था कि वह भी मुझे पसंद करती है। 

मैसेज टाइप करने के बाद मैंने फोन बंद कर दिया और जब फोन खोला तो उसने स्माइली का इमोजी भेजा था। आज हम दोनों पति-पत्नी हैं, बस यही हमारी कहानी है। अगर उस दिन वह मेरे फेयरवेल में नहीं आती तो मैं कभी उससे अपने दिल की बात नहीं कह पाता।

(यह एक काल्पनिक कहानी है। इसे लेखक ललित फुलारा द्वारा लिखा गया है। यदि आपके पास भी इस तरह की कहानियां हैं तो blog@auw.co.in  पर साझा कर सकते हैं। )
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