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रियासत की सियासत में अस्तित्व ढूंढती महिलाएं

Fri, 07 Nov 2014 12:29 AM IST
Updated Fri, 07 Nov 2014 12:29 AM IST
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women candidates still fighting for their Existence

भले ही रियासत की महिलाएं पढ़ाई के मामलों में पुरुषों को पीछे छोड़ रही हैं, लेकिन रियासत की सियासत में आज भी वह अपने अस्तित्व को ढूंढ रही हैं। ऐसा नहीं है कि चुनावी अखाड़े में उतरने वाले उम्मीदवारों में उनकी संख्या कम हो रही है, लेकिन उन्हें अभी तक रियासत की अवाम ने राजनीतिक गलियारों में पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है।

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इतना ही नहीं, रियासत के बड़े राजनीतिक दल भी अभी तक महिलाओं को उनके 33 फीसदी आरक्षण अधिकार को नहीं दे पाए हैं। आंकड़ों की दृष्टि से देखे तो 2008 में हुए विधानसभा चुनाव की 87 सीटों पर कुल 66 महिलाएं मैदान में उतरीं, लेकिन उनमें से 56 की जमानत जब्त हो गई।
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इनमें से तीन महिलाएं जीत दर्ज करने में कामयाब हुईं, लेकिन उनके ऊपर राजनीतिक आकाओं का हाथ था। भले वह पीडीपी की महबूबा मुफ्ती हों या फिर नेशनल कांफ्रेंस की सकीना इट्टू या शमीमा फिरदौस।

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एक की भी जमानत नहीं बच पाई

women candidates still fighting for their Existence

खासबात यह है कि तीनों विजयी महिला उम्मीदवार कश्मीर घाटी की हैं। कुल 21 महिलाएं स्वतंत्र उम्मीदवार थीं, जबकि बाकी 45 अलग-अलग पार्टियों से मैदान में उतरीं थीं। खासबात यह है कि कश्मीर संभाग में आतंकवाद का उस समय ज्यादा प्रभाव होने के बावजूद जम्मू से ज्यादा महिलाएं चुनाव में उतरीं।

कुल 66 महिलाओं में से 37 कश्मीर घाटी की और 29 जम्मू की थीं। महिला उम्मीदवारों द्वारा हासिल मतों पर नजर दौड़ाई जाए तो 17 उम्मीदवारों को छोड़ अन्य एक हजार का आंकड़ा तक नहीं छू पाईं। दस महिला उम्मीदवार तो सौ का आंकड़ा पार नहीं कर पाईं। नेकां की सकीना ने सर्वाधिक 16,240 मत हासिल किए थे।

जम्मू वेस्ट, बिश्नाह और अमीरकदल ऐसे विधानसभा क्षेत्र रहे, जहां चार-चार महिला उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमाने के लिए मैदान में उतरीं। लेकिन इनमें से एक की भी जमानत नहीं बच पाई। यही कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव में अब तक विभिन्न पार्टियों द्वारा जारी उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं को ज्यादा तरजीह नहीं मिली है।

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