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जम्मू-कश्मीर के रिहायशी इलाकों में पहुंच रहे जंगली जानवर, आठ साल में 160 को बनाया शिकार
Tue, 23 Feb 2021 11:42 AM IST
करिश्मा चिब
अमित कुमार, जम्मू
अमित कुमार, जम्मू
Published by: करिश्मा चिब
Updated Tue, 23 Feb 2021 11:42 AM IST
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वन क्षेत्र के फ्रंटलाइन इलाकों का दायरा कम होने से जंगली जानवर रिहायशी इलाकों में पहुंच रहे हैं। यहां वह इंसानों का अपना शिकार बना रहे हैं। अधिकतर हमले तेंदुए और भालू ने किए हैं। बीते आठ सालों में 160 लोगों को इन जानवरों ने अपना शिकार बनाया है। साथ ही 18 सौ से अधिक लोग जंगली जानवरों के हमलों से घायल हुए हैं।
प्रदेश के घास चराई और शामलात जोन (इसे बौरोन लाइन फारेस्ट कहते हैं) पर कृषि, बाग गतिविधियों के साथ अतिक्रमण लगातार बढ़ रहा है। ढांचों का तेजी से विस्तार हुआ है। इससे वनी क्षेत्र का दायरा कम हुआ है। इस गलती से बफर जोन तक पहुंचने वाले जानवर निचले क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं, जिससे ऐसे जानवरों और इंसानों के बीच टकराव बढ़ा है। जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्रों में भालू और तेंदुए के हमले बढ़े हैं।
जम्मू संभाग के चिनाब वैली, पुंछ, राजोरी, बनी, डुडू बसंतगढ़ आदि पर्वतीय क्षेत्रों में तेंदुए और भालू पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में ऐसे जानवरों की अनुमानित ही संख्या है। कश्मीर के दाछीगाम में करीब 300 भालू पाए जाते हैं। पिछले कुछ सालों से वनी क्षेत्र के फ्रंटलाइन इलाके का दायरा कम होने के कारण बड़ी संख्या में जंगली जानवर निचले क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं। पिछले आठ सालों में जम्मू कश्मीर के विभिन्न जिलों में 160 से अधिक लोग विशेषतौर पर भालू और तेंदुए का शिकार हो चुके हैं। इन जानवरों के हमले से 1800 से अधिक लोग घायल भी हुए हैं, जिनमें कई अपंग का जीवन जी रहे हैं।
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भालू के हमले ने बदल दी जिंदगी
डोडा के सिंदरा गांव के रहने वाले शिव राम 2018 में एक काली सुबह को आज तक नहीं भूल पाए हैं। वह बताते हैं कि उस रोज वह सुबह पानी लाने के लिए जंगल क्षेत्र गए थे, तभी एक भालू ने उन पर अचानक हमला कर दिया था, जिससे उनका चेहरा बेकार हो गया। फरवरी 2021 में डोडा के रेही गांव की निवासी कमला देवी भी भालू का शिकार हुईं और इस हमले में उसकी एक बाजू बेकार हो गई।
यह भी पढ़ें- जम्मू-कश्मीर के बजट में कृषि को मिलेगी प्राथमिकता, बागवानी में होगा व्यापक बदलाव
कई घायल अपंग का जीवन जी रहे
वर्ष 2012 से मार्च 2020 तक जम्मू-कश्मीर के बीस जिलों में खासतौर पर भालू और तेंदुए के हमले से 161 लोगों की मौत हुई है, जबकि 1792 लोग घायल हुए हैं। इनमें कई गंभीर रूप से घायल होकर अपंग हो गए हैं। हालांकि, पिछले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा बढ़ा होगा। वर्ष 2013-14 में सबसे अधिक 36 मौतें और 401 लोग घायल हुए थे। इनमें 28 मौतें कश्मीर संभाग से हुई थीं और 333 लोग घायल हुए थे। इसी तरह वर्ष 2015-16 में प्रदेश में 26 मौतें हुईं और 285 घायल हुए। इसमें जम्मू संभाग में 16 मौतें हुईं और 60 लोग घायल हुए।
मौत पर पीड़ित परिवार को तीन लाख का मुआवजा
मुख्य वन जीव वार्डन सुरेश कुमार गुप्ता ने कहा कि जंगली जानवरों के हमले में मारे गए लोगों को विभाग की ओर से मुआवजे के तौर पर 3 लाख रुपये और विभिन्न तरह की घायल श्रेणी में छोटी चोट पर 15000, गंभीर चोट पर 1 लाख और स्थायी दिव्यांग होने पर 3 लाख रुपये दिए जाते हैं। विभाग हर साल औसतन डेढ़ करोड़ रुपये की मुआवजा राशि वितरित कर रहा है। घटनास्थल पर कुल राशि से पीड़ित को दस फीसदी का भुगतान करने का प्रावधान है।
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प्रदेश के घास चराई और शामलात जोन (इसे बौरोन लाइन फारेस्ट कहते हैं) पर कृषि, बाग गतिविधियों के साथ अतिक्रमण लगातार बढ़ रहा है। ढांचों का तेजी से विस्तार हुआ है। इससे वनी क्षेत्र का दायरा कम हुआ है। इस गलती से बफर जोन तक पहुंचने वाले जानवर निचले क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं, जिससे ऐसे जानवरों और इंसानों के बीच टकराव बढ़ा है। जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्रों में भालू और तेंदुए के हमले बढ़े हैं।
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जम्मू संभाग के चिनाब वैली, पुंछ, राजोरी, बनी, डुडू बसंतगढ़ आदि पर्वतीय क्षेत्रों में तेंदुए और भालू पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में ऐसे जानवरों की अनुमानित ही संख्या है। कश्मीर के दाछीगाम में करीब 300 भालू पाए जाते हैं। पिछले कुछ सालों से वनी क्षेत्र के फ्रंटलाइन इलाके का दायरा कम होने के कारण बड़ी संख्या में जंगली जानवर निचले क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं। पिछले आठ सालों में जम्मू कश्मीर के विभिन्न जिलों में 160 से अधिक लोग विशेषतौर पर भालू और तेंदुए का शिकार हो चुके हैं। इन जानवरों के हमले से 1800 से अधिक लोग घायल भी हुए हैं, जिनमें कई अपंग का जीवन जी रहे हैं।
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भालू के हमले ने बदल दी जिंदगी
डोडा के सिंदरा गांव के रहने वाले शिव राम 2018 में एक काली सुबह को आज तक नहीं भूल पाए हैं। वह बताते हैं कि उस रोज वह सुबह पानी लाने के लिए जंगल क्षेत्र गए थे, तभी एक भालू ने उन पर अचानक हमला कर दिया था, जिससे उनका चेहरा बेकार हो गया। फरवरी 2021 में डोडा के रेही गांव की निवासी कमला देवी भी भालू का शिकार हुईं और इस हमले में उसकी एक बाजू बेकार हो गई।
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कई घायल अपंग का जीवन जी रहे
वर्ष 2012 से मार्च 2020 तक जम्मू-कश्मीर के बीस जिलों में खासतौर पर भालू और तेंदुए के हमले से 161 लोगों की मौत हुई है, जबकि 1792 लोग घायल हुए हैं। इनमें कई गंभीर रूप से घायल होकर अपंग हो गए हैं। हालांकि, पिछले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा बढ़ा होगा। वर्ष 2013-14 में सबसे अधिक 36 मौतें और 401 लोग घायल हुए थे। इनमें 28 मौतें कश्मीर संभाग से हुई थीं और 333 लोग घायल हुए थे। इसी तरह वर्ष 2015-16 में प्रदेश में 26 मौतें हुईं और 285 घायल हुए। इसमें जम्मू संभाग में 16 मौतें हुईं और 60 लोग घायल हुए।
मौत पर पीड़ित परिवार को तीन लाख का मुआवजा
मुख्य वन जीव वार्डन सुरेश कुमार गुप्ता ने कहा कि जंगली जानवरों के हमले में मारे गए लोगों को विभाग की ओर से मुआवजे के तौर पर 3 लाख रुपये और विभिन्न तरह की घायल श्रेणी में छोटी चोट पर 15000, गंभीर चोट पर 1 लाख और स्थायी दिव्यांग होने पर 3 लाख रुपये दिए जाते हैं। विभाग हर साल औसतन डेढ़ करोड़ रुपये की मुआवजा राशि वितरित कर रहा है। घटनास्थल पर कुल राशि से पीड़ित को दस फीसदी का भुगतान करने का प्रावधान है।