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Jammu News: मेरी किताबें कहां गईं, कैसे पूरा करूंगा यूपीएससी परीक्षा पास करने का सपना

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Where did my books go, how will I fulfill my dream of passing the UPSC exam
अपनी पीड़ा बताते त्रिबुनि गांव के निवासी।
तंगधार (त्रिबुनि गांव)। मेरा क्या दोष था? मेरे सपने क्यों नष्ट कर दिए गए? मेरी किताबें कहां गईं, मैं अपने पिता के यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा पास करने के सपने को कैसे पूरा करूंगा? ये सवाल हैं 17 वर्षीय जसप्रीत सिंह के, जो अपने क्षतिग्रस्त घर में बैठे अपने उज्ज्वल भविष्य के बिखराव को देख रहा है। उसकी आंखों में आंसू हैं और मन में पीड़ा, जिसे न शब्दों में ढाला जा सकता है, न ही भुलाया जा सकता है।
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कुछ दिन पहले पाकिस्तान की ओर से की गई भारी और बिना उकसावे की गोलाबारी ने उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास बसे इस शांत सिख बहुल गांव त्रिबुनि को तबाह कर दिया। इस हमले ने न सिर्फ घरों को तोड़ा, बल्कि परिवारों के सपनों, शिक्षा, और सुरक्षा की नींव भी हिला दी। यहां बारूद की गंध तो कम हो गई है, मगर गोलाबारी से हुए घाव अब भी ताजा बने हुए हैं।
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अपने टूटे घर में खड़े जसप्रीत बार-बार यही सवाल पूछ रहे हैं- हमने क्या अपराध किया था? अगले महीने मेरी बहन की शादी होनी थी, अब कैसे होगी? क्या मेरा परिवार भागने के बाद कभी वापस आएगा? पाकिस्तान की मिसाइलों, तोपों और ड्रोनों ने सब कुछ छीन लिया - हमारी खुशियां, जीने की वजह। हमारी कौन सुनेगा? त्रिबुनि गांव के हर घर में एक जैसे निशान हैं। उनके चेहरों पर डर, भविष्य पर अनिश्चितता के बादल हैं। एक भयावह सवाल भी बना हुआ है- क्या फिर से गोलाबारी शुरू होगी? क्या हमें रात के अंधेरे में भागना पड़ेगा?
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दो बच्चों की मां त्रिपत कौर भी छह मई की भयावहता से खौफजदा हैं। उन्होंने भी कई सवाल किए और कहा- मैं बस यही सोचती हूं, कि क्या मैं कभी अपने बेटे को डॉक्टर का सफेद कोट पहने देख पाऊंगी? क्या मैं उसकी सफलता का जश्न मना पाऊंगी? वह बताती हैं कि वह शाम किसी और शाम की तरह ही शुरू हुई थी। परिवार के सभी लोग रात के खाने के बाद सोने चले गए थे। अचानक एक जोरदार विस्फोट ने सन्नाटे को तोड़ दिया। पहले तो उन्होंने इसे सीमापार से सामान्य गोलीबारी समझकर टाल दिया, लेकिन कुछ ही मिनटों में पूरा गांव हमले की चपेट में आ गया। गोले, मिसाइल और ड्रोन की बाैछारों के साथ ही चीख-पुकार और अफरातफरी मच गई। त्रिपत कौर कांपते हुए आवाज में कहती हैं, हम रात के अंधेरे में बचने की दुआ करते हुए बंकरों की ओर भागे। डर से आधे-अधूरे, हम किसी तरह सात मई का दिन देखने के लिए जिंदा बचे। हमने पहले भी गोलाबारी का सामना किया है, लेकिन यह अस्तित्व की लड़ाई थी।
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