कारगिल गाथा: ये दिल मांगे मोर कहकर खुद शांत हो गया शेर शाह

ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू Updated Fri, 08 Jul 2016 10:28 AM IST
विक्रम बत्रा
‌व‌िक्रम बत्रा - फोटो : File Photo
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7 जुलाई 1999
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कारगिल युद्ध की सबसे मुश्किल चुनौतियों में शुमार प्वाइंट 4875 का मोर्चा अब भी लोहे के चने चबाने जैसा था। ऊपर चढ़ने की संकरी जगह के ठीक सामने दुश्मन का मोर्चा ऐसी पोजीशन पर, जहां तक पहुंचने का एक ही रास्ता और उस पर दुश्मन की बंदूकें तनी हुईं।

बिजली की गति से दुश्मन के मोर्चे पर धावा बोलकर कैप्टन विक्रम बत्रा ने पहले हैंड टू हैंड फाइट की और उसके बाद प्वाइंट ब्लैक रेंज से पांच दुश्मन ढेर कर दिए। गहरे जख्म होने पर भी बत्रा यहीं नहीं रुके। वे क्रालिंग करते हुए दुश्मन के करीब तक पहुंचे और ग्रेनेड फेंकते हुए पोजीशन को क्लियर कर दिया।


टीम का नेतृत्व कर रहे विक्रम बत्रा ने अपनी टीम में पूरी ताकत के साथ लड़ने का जुनून भर दिया। जब जख्मी विक्रम बत्रा को उनके सूबेदार ने रेस्क्यू करने की कोशिश की तो वे बोले तू बाल बच्चेदार है, हट जा पीछे।

इसके बाद दुश्मन की गोली से विक्रम बत्रा शहीद हो गए। बाद में उनकी टीम ने प्वाइंट 4875 को वापस कब्जाने का लक्ष्य हासिल कर लिया। विक्रम बत्रा के अदम्य साहस और नेतृत्व प्रदर्शन के लिए उन्हें परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया।

देश पर मर मिटा तीन बहनों का इकलौता भाई 

kargil
kargil - फोटो : File Photo
फ्लैशबैक : हिमाचल प्रदेश पालमपुर के घुग्गर गांव के रहने वाले विक्रम बत्रा सोपोर में 13 जैक राइफल्स में लेफ्टिनेंट पद पर कमीशन होकर सोपोर में तैनात हुए। कारगिल युद्ध में डेल्टा कंपनी को 19 जून को प्वाइंट 5140 फतह करने का जिम्मा दिया गया।

कैप्टन विक्रम बत्रा को शेर शाह कोड नाम दिया गया, जिसका जिक्र पाकिस्तानी इंटरसेप्ट में अक्सर आता था। प्वाइंट 5140 को जीत दिलाने के बाद दुश्मन के कई मोर्चे ध्वस्त करने में बत्रा की भूमिका अहम रही। हर मोर्चे की जीत का ये दिल मांगे मोर कहकर संदेश देने वाले विक्रम बत्रा टीवी पर इंटरव्यू चलने से देश में प्रसिद्ध हो गए।

7 जुलाई 1999 
तीन बहनों के इकलौते भाई पर परिवार का प्यार बरसता था। रामगढ़ के परिवार में सबसे छोटे गुरदीप सिंह उर्फ सोनी ने 24 दिसंबर, 1998 को दसवीं पास की और जोश के साथ सेना में भर्ती हो गए। 8 सिख रेजीमेंट को जब कारगिल युद्ध में दुश्मन से लोहा लेने की जिम्मेदारी मिली तो गुरदीप सिंह भी पूरे उत्साह के साथ युद्ध भूमि में जान की बाजी लगाने उतर गए।

गुरदीप के पिता मोहन सिंह और माता मंजीत कौर के अनुसार कारगिल युद्ध में बेटे को खोने का दुख तो हुआ, लेकिन गर्व का अहसास दुख से कहीं ज्यादा है। देश की खातिर कुछ कर गुजरने के आदर्श परिवार में इस कदर हैं कि बुढ़ापे में भी दंपति कहते हैं एक और बेटा होता तो उसे भी जंग के मैदान में उतारने से परहेज नहीं करते। बेटे की याद में परिवार ने गांव में ही स्मारक बनाया है, जहां हर साल श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
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