सामने आए कश्मीर में पर्यावरण के चौंकाने वाला सच
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जम्मू-कश्मीर राज्य में असंतुलित पर्यावरण से बड़ी आपदा का खतरा है। बाढ़ और भूकंप के मुआयने पर खड़े इस राज्य में पर्यावरण से छेड़छाड़ को रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से काम करने की जरूरत है।
प्राकृतिक जलस्त्रोतों का सूखना चिंता का विषय है। हिमालयन रेंज में संतुलन बनाए रखने के लिए सभी मुद्दों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। जम्मू और कश्मीर में बाढ़ के बाद राहत और पुनर्वास कार्य पर्याप्त नहीं हुए हैं।
वर्ष 1993 के बाद पहली बार लद्दाख, कश्मीर और जम्मू का जमीनी स्तर का दौरा करने पहुंची संसदीय स्टैंडिंग कमेटी विज्ञान व तकनीक, पर्यावरण व वन की बैठक में ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
अगली बाढ़ नहीं झेल पाएगी झेलम नदी
कमेटी के चेयरमैन अश्विनी कुमार ने पत्रकारों को बताया कि कश्मीर में पिछले साल सितंबर माह में भीषण बाढ़ का मुख्य कारण झेलम के आसपास अतिक्रमण रहा। झेलम की अपनी 35000 क्यूसिक क्षमता है।
लेकिन बाढ़ में 115000 क्यूसिक पानी ने भारी तबाही मचा दी। कच्ची जगहों और अन्य स्थलों पर भारी अतिक्रमण के कारण झेलम से क्षमता से अधिक पानी की निकासी नहीं हो पाई थी। रियासत के जंगलों में अवैध कटान जोरों पर है।
पर्यावरण का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। वन माफिया हावी है। पशु भूमि पर भी अतिक्रमण लगातार बढ़ा है। कमेटी ने पर्यावरण के प्रति जागरूकता के लिए स्कूलों में पर्यावरण विषय को लाने पर जोर दिया।
पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने के लिए जनता की भागीदारी को सुनिश्चित बनाया जाए। कमेटी ने श्री माता वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा के दौरान पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने के लिए वेस्ट सामग्री को उचित ढंग से नष्ट करने के प्रबंधों पर जोर दिया। स्टैंडिंग कमेटी अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री और संबंधित मंत्रालय को सौंपेगी।