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जब उधमपुर में ट्रेन देखी तो आई जान में जान

Sun, 14 Sep 2014 12:02 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, उधमपुर
ब्यूरो/अमर उजाला, उधमपुर Updated Sun, 14 Sep 2014 12:02 AM IST
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those eight days were worst of time life

हर पल मौत से जूझते हुए श्रमिकों के आठ दिन गुजरे। मौत का सामना करने के बाद किसी तरह हिम्मत जुटाकर हजारों श्रमिकों ने जब उधमपुर पहुंचकर ट्रेन देखी तो उन्हें राहत मिली। स्टेशन पर गोरखपुर निवासी मोहम्मद अल्ताफ से जब घाटी में गुजारे आठ दिनों की बात पूछी। तो मुंह से आह निकली। बताया कि वह मुसीबत के समय में अल्लाह, भगवान, वाहे गुरु सभी को याद कर रहा था ताकि वह बच जाए। हर पल किसी न किसी को याद किया।

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उनके साथ उनका बेटा और बहु भी थी। तीन साल का मासूम शोएब। कई सालों से वह श्रीनगर में मार्बल का काम करते हैं। कभी ऐसी भयावह मंजर नहीं देखा। छपरा के रमेश कुमार के अनुसार कई बार लगा कि बस अब जिंदगी खत्म हो गई। परदेस में काम करने आए थे। कई दिनों से काम कर रहे थे। पैसे भी नहीं ले पाए थे। किसी तरह जान बचाकर भाग खड़े हुए।
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कमाई भी डूब गई
स्टेशन पहुंचे श्रमिकों के अनुसार उनकी जमा पूंजी भी पानी में डूब गई। जिस जगह पर काम कर रहे थे। उनसे भी दिहाड़ी नहीं मिलेगी। अब देश के अन्य भागों में जाकर दिहाड़ी लगाएंगे और फिर से रुपया जोड़कर घर भेजेंगे।
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छतों पर भी नहीं चढ़ने दिया
इन श्रमिकों का आरोप है कि उन्हें छतों पर भी नहीं चढ़ने दिया गया। स्थानीय लोगों ने उन्हें सहारा नहीं दिया। सभी श्रमिक एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे। किसी तरह वहां से निकलने में सफल हुए।


रेलवे ट्रैक के रास्ते पहुंचे
उधमपुर। किसी को भी श्रीनगर से जम्मू तक रास्ता नहीं पता था। गाड़ियों में जाकर वह घाटी पहुंचते थे। किसी तरह वे रेलवे ट्रैक पर पहुंचे। ट्रैक ही उनके मार्गदर्शक बने। जिसके रास्ते वह पैदल ही बनिहाल तक पहुंच पाए।

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