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इससे बुरी बैसाखी कभी नहीं देखी

Tue, 14 Apr 2015 02:18 AM IST
Updated Tue, 14 Apr 2015 02:18 AM IST
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the worst baisakhi ever says farmers

जट्टा आई बैसाखी, खेतां दी मुक्क गई राखी। यह बात बैसाखी पर हर किसान की जुबान पर होती है, लेकिन इस बार किसानों की जुबान पर एक ही बात है कि बैसाखी तों पैलां ही मुक्क गई राखी। बैसाखी किसानों के लिए अहम त्योहार होता है। फसलों की कटाई शुरू करने पर बैसाखी मनाई जाती है, लेकिन इस बार बैसाखी किसानों के लिए कोई मायने नहीं रखती।

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फसल काटने का काम शुरू कर नई फसल की तैयारी करना बैसाखी पर शुभ माना जाता है, लेकिन बैसाखी पर किसानों के पास काटने के लिए न फसल है और न ही नई फसल की तैयारियों के लिए पैसे। अमर उजाला ने बैसाखी को लेकर किसान संगठनों से बात की। सभी संगठनों ने सरकार की बेरुखी पर कड़ा एतराज जताया है।
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राज्य किसान संघ के प्रधान तेजिंदर सिंह का कहना है कि पिछले सात महीने में किसानों की दो फसलें नष्ट हो गई हैं। किसान की हालत किसी से छुपी नहीं है। दो फसलों के तबाह होने के बाद किसानों में तीसरी फसल की तैयारी के लिए हिम्मत नहीं। किसानों के पास न तो बीज हैं और न ही फसल की बुआई के लिए पैसे।
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संघ के चेयरमैन राजेश शर्मा कहते हैं कि अब तक सरकार की तरफ से किसानों के लिए कुछ नहीं किया गया। सरकार की तरफ से किसानों को कैश मुआवजा दिया जाता तो अगली फसल की तैयारी कर सकते थे। किसान नेता कुलभूषण खजुरिया का कहना है कि बैसाखी पर किसानों के घर तरह तरह के पकवान बनते हैं।

फसलों की कटाई पर किसान खुशी मनाते हैं, लेकिन पकवान तो दूर, किसानों के घर दो वक्त की रोटी तक का बंदोबस्त नहीं है।

मवेशियों के लिए चारा बन गई फसल

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कठुआ। बैसाखी पर्व पर अमूमन किसानों के चेहरों पर खुशी झलकती है, लेकिन इस बार अन्नदाता की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा है। बेमौसम बारिश ने रबी सीजन के लिए की गई उनकी मेहनत को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। हालत यह है कि जो थोड़ी-बहुत फसल बची है, उसे समेटने के बाद बाकी बर्बाद फसल मवेशियों के लिए चारा बन गई है।

इस फसल को काटने वाले किसानों की आंखों से आंसुओं की झड़ी रुकने का नाम नहीं ले रही है। सोमवार को जब अमर उजाला टीम किसानों के खेतों पर पहुंची, तो हर किसान की आंखों में यही दर्द देखने को मिला। देश के अन्य हिस्सों की तरह ही कठुआ जिले के पर्वतीय और मैदानी इलाकों में भी मौसम ने कहर ढाया है।

रबी सीजन की कटाई के समय खेत-खलिहान किसानों की हंसी-ठहाकों से गूंजते रहते थे। बैसाखी का पर्व किसानों की इस खुशी का चरमोत्कर्ष होता था, लेकिन इस बार खेत में फसल काट रहे किसानों के चेहरे मायूस हैं, जबकि खलिहानों में सन्नाटा पसरा हुआ है।

शहर से सटे कृषि इलाके में जब अमर उजाला ने दौरा किया तो कोई किसान खेत की फसल को देखकर दुखी था तो कोई बर्बाद फसल को मवेशियों के चारे के लिए काट रहा था। पूछने भर की देरी थी कि किसानों का दर्द जुबां पर आ गया। फसल काट रहे किसान रमेश लाल ने बताया कि मौसम ने इस बार पूरा रबी सीजन ही चौपट कर दिया है।

'साल भर कैसे चलेगा गुजारा'

the worst baisakhi ever says farmers

फसल के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की थी। शुरुआत में अच्छी फसल की उम्मीद भी बंधी, लेकिन फरवरी अंत से शुरू हुआ बारिश का दौर अप्रैल तक कहर ढाता रहा। खेतों में अत्यधिक पानी जमा हो गया, जिसने फसलों के लिए जहर जैसा काम किया। उन्होंने कहा कि समझ में नहीं आ रहा है बची-खुची फसल से सालभर तक अपने परिवार का कैसे पेट भरेंगे, क्योंकि ज्यादातर उपज तो मवेशियों के लिए चारा बन गई है।

पास के एक अन्य खेत में गेहूं की कटाई कर रहे अन्य किसान ने कहा कि फसल अभी पूरी तरह पकी नहीं है। लेकिन, अनाज की पैदावार चूंकि नहीं के बराबर है, इसलिए वे अधपकी फसल की मवेशियों को खिलाने के लिए काट रहे हैं। शहर से सटे निचले मैदानी इलाकों में ज्यादातर किसानों के सामने भी ऐसी ही स्थिति है।

पूरी तरह से बर्बाद फसल को किसान पहले से ही काट कर मवेशियों के चारे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। कटाई का सीजन आने पर यह क्रम तेज हो गया है। कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कठुआ जिले की 62 हजार हेक्टेयर भूमि पर रबी की फसलें उगाई गई थीं, जो बड़े पैमाने पर बर्बाद हो चुकी हैं।

कई इलाकों में किसानों के सामने अनाज की पैदावार की संकट है, इसलिए वे फसल को मवेशियों के चारे के लिए काटने को मजबूर हैं।

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