कश्मीर: मोदी नहीं चुनाव है निशाना
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुचर्चित श्रीनगर यात्रा के दो दिन पहले चरमपंथियों ने उत्तरी, मध्य और दक्षिणी कश्मीर के तीन इलाकों में हमला किया, जिसमें कई लोगों की जान गई।
ये हमले विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण के लिए होने वाले मतदान के महज चार दिन पहले हुए। जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के दो चरण के मतदान 25 नवंबर और दो दिसंबर को शांतिपूर्वक हुए और कश्मीर घाटी में अभूतपूर्व रूप से रिकॉर्ड मतदान हुआ था।
यहां यह बता देना मुनासिब है कि पाकिस्तान से संचालित यूनाइटेड जिहाद काउंसिल (सभी चरमपंथी संगठनों का संयुक्त मोर्चा) समेत लगभग सभी अलगाववादी गुटों ने चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया था।
भय का माहौल
उरी के सैन्य शिविर के बाहर मारे गए चरमपंथियों के पास सेना के जवान। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग घर के बाहर आए और मतदान किया। यद्यपि, कुछ सुरक्षा विशेषज्ञ गुरुवार के हमलों को प्रधानमंत्री की प्रस्तावित श्रीनगर यात्रा से जोड़ रहे हैं। इस दौरान मोदी पार्टी उम्मीदवारों के समर्थन में रैली करने वाले हैं।
मगर लगता है कि हमलों का संबंध उनकी यात्रा से अधिक चुनाव से जुड़ा है। चरमपंथी नेतृत्व इतना मासूम नहीं कि वो ये सोचें कि इन हमलों से प्रधानमंत्री की यात्रा विफल की जा सकती है। पर हां, इन हमलों से उन लोगों में डर पैदा करने की पूरी संभावना है, जो मतदान केंद्र जाने से पहले दो बार सोच सकते हैं।
अलगाववादी अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए करवा रहे हैं हमले
हमलों के खास निशाने पर चुनाव है। इसका संकेत इससे भी मिलता है कि तीनों हमले उन इलाकों में किए गए, जहां मतदान होना है। उत्तरी कश्मीर के उरी में चरमपंथियों ने सेना के शिविर पर हमला किया। यहां नौ दिसंबर को मतदान होना है जबकि मध्य कश्मीर के श्रीनगर और दक्षिणी कश्मीर के शोपियां में 14 दिसंबर को चौथे चरण का मतदान होगा।
ये हमले उन इलाकों में किए गए हैं, जहां चुनाव प्रक्रिया अपने अंतिम दौर में है और इसके संकेत हैं कि इनका मक़सद मतदाताओं को डराना है ताकि मतदान प्रतिशत पर असर पड़े।
इन हमलों का निशाना जम्मू कश्मीर में तीसरे चरण का मतदान है। मतदान में बड़ी तादाद में भागीदारी देखते हुए अलगाववादी गुटों को डर सता रहा है, क्योंकि लोगों ने उनकी प्रासंगिकता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
कश्मीर के घटनाक्रम पर नज़र रखने वाले कुछ लोगों को लगता है कि अलगाववादी अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए ये तरीक़े अपना रहे हैं। यदि ये हमले वाकई में लोगों को डराते हैं और इस तरह मतदान प्रतिशत में कमी लाने में मदद करते हैं तो अलगाववादियों के लिए, कम से कम, यह राहत मिलने जैसा होगा।