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फेसबुक-व्हाट्सएप छोड़ कश्मीर में अब नए एप का इस्तेमाल कर रहे हैं आतंकी संगठन

Sun, 24 Jan 2021 09:41 PM IST
प्राची प्रियम अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: प्राची प्रियम Updated Sun, 24 Jan 2021 09:41 PM IST
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Terrorist groups in pakistan using new messaging apps having high security
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग एप द्वारा निजता को लेकर की गई पेशकश के संबंध में हो रही बहस के बीच पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन और उनके आका नए एप्स की ओर मुखातिब हो रहे हैं जिनमें तुर्की की कंपनी द्वारा विकसित एप भी शामिल है। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

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उन्होंने बताया कि आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ के बाद जुटाए गए सबूतों और आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादियों द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों की ओर से कट्टरपंथी बनाए जाने की प्रक्रिया की दी गई जानकारी से तीन नए एप प्रकाश में आए हैं।
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हालांकि, सुरक्षा कारणों से इन मैसेजिंग एप के नाम की जानकारी नहीं दी गई। अधिकारियों ने इतना बताया कि इनमें से एक एप अमेरिकी कंपनी का है जबकि दूसरा एप यूरोप की कंपनी द्वारा संचालित है। उन्होंने बताया कि नवीनतम तीसरे एप्लिकेशन को तुर्की की कंपनी ने विकसित किया है और आतंकवादी संगठनों के आका और कश्मीर घाटी में उनके संभावित सदस्य लगातार इनका इस्तेमाल कर रहे हैं।
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उन्होंने बताया कि नया एप इंटरनेट की गति कम होने पर या टूजी कनेक्शन होने पर भी काम कर सकता है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा वापस लेने के बाद यहां पर इंटरनेट सेवाएं स्थगित कर दी थी और करीब एक साल बाद टूजी सेवा बहाल की गई थी।

सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि इंटरनेट बाधित होने से आतंकवादी समूहों द्वारा व्हाट्सएप और फेसबुक मैसेंजर का इस्तेमाल लगभग बंद हो गया था। बाद में पता चला कि वे नए एप का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो वर्ल्ड वाइड वेब पर मुफ्त में उपलब्ध है।

उन्होंने बताया कि इस एप में कूटलेखन एवं विकोडन सीधे उपकरण में होता है। ऐसे में इसमें तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की संभावना कम होती है और यह एप कूटलेखन अल्गोरिदम आरएसए- 2048 का इस्तेमाल करता है जिसे सबसे सुरक्षित कूटलेखन मंच माना जाता है।

आरएसए अमेरिकी नेटवर्क सुरक्षा एवं प्रमाणीकरण कंपनी है, जिसकी स्थापना वर्ष 1982 में की गई थी। आरएसए का पूरी दुनिया में इस्तेमाल कूट प्रणाली के आधार के तौर पर होता है।

अधिकारियों ने बताया कि आतंकवादियों द्वारा कश्मीर घाटी में युवाओं को कट्टरपंथी बनाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे एक एप में फोन नंबर या ई-मेल पते की भी जरूरत नहीं होती है, जिससे इस्तेमाल करने वाले की पहचान पूरी तरह से गोपनीय रहती है।

उन्होंने बताया कि जम्मू-कश्मीर में ऐसे एप को बाधित करने की कोशिश की जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि यह चुनौती ऐसे समय में आई है जब घाटी में सुरक्षा एजेंसियां वर्चुअल सिम कार्ड के खतरे से लड़ रही हैं। आतंकवादी समूह पाकिस्तान में अपने आकाओं से संपर्क करने के लिए लगातार इनका इस्तेमाल कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि इस तकनीक की पहुंच का पता वर्ष 2019 में तब चला जब पुलवामा हमले को अंजाम देने वाले जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमलावर द्वारा इस्तेमाल किए गए वर्चुअल सिम के सेवा प्रदाता की जानकारी देने का अमेरिका से अनुरोध किया गया। इस हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे।

हालांकि, राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की जांच में संकेत मिला कि 40 वर्चुअल सिम का इस्तेमाल अकेले पुलवामा हमले में किया गया और संभवत: घाटी में और ऐसे सिम का इस्तेमाल हो रहा है।

इस प्रौद्योगिकी में टेलीफोन नंबर कंप्यूटर जेनरेट करता है, जिसके आधार पर यूजर अपने स्मार्टफोन में एप डाउनलोड कर सकता है और उसका इस्तेमाल कर सकता है।
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