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तालिबान के राज से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के और पैर पसारने का खतरा बढ़ा

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terrorism in jammu kashmir
जम्मू। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद जम्मू-कश्मीर में भी इस नए घटनाक्रम को लेकर रक्षा विशेषज्ञों ने मंथन शुरू कर दिया है। इनके अनुसार जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के और पैर पसारने का खतरा बढ़ सकता है। बौखलाया पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में 370 हटने के बाद पसरी शांति में खलल डालने के लिए तालिबानी आतंकियों को झोंक सकता है। इनका मानना है कि तात्कालिक रूप से तो इसके प्रभाव कम देखने को मिलेंगे लेकिन भारत और तालिबान के रिश्तों की बुनियाद का असर ज्यादा होगा।
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रक्षा विशेषज्ञों और राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के तात्कालिक परिणाम सामने नहीं आएंगे। पाकिस्तान के प्रयासों के बाद भी तालिबानी आतंकियों के अफगानिस्तान से बाहर निकलने में वक्त लगेगा। लेकिन भारत को नए घटनाक्रम के अनुसार तैयारी करनी होगी। रणनीतिक के साथ और सामरिक दृष्टि से भी। पाकिस्तान की कोशिश होगी कि वह तालिबानी आतंकियों का इस्तेमाल भारत में आतंकवाद को और हवा देने में करे। 370 हटने के बाद उसके सभी निशाने चूक रहे हैं। अलगाववाद ने दम तोड़ दिया है। अब कोई भी अलगाववादी संगठन बंद का आह्वान नहीं करता है। पत्थरबाजी भी बीते जमाने की बात हो गई। सुरक्षा बलों ने आतंकी गतिविधियों पर नकेल कस दी है। ऐसे में उसे अपना नापाक एजेंडा फेल होता नजर आ रहा है। बदले घटनाक्रम में तालिबानी आतंकियों को वह अपनी जमीन से भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है।
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तालिबानी आतंकियों के इस्तेमाल के मिल चुके हैं इनपुट
पिछले साल अगस्त में खुफिया एजेंसियों को इनपुट मिले थे कि पाकिस्तान आईएसआई और पाकिस्तान आर्मी स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) तालिबानी व अफगानी आतंकियों को प्रशिक्षण देकर घाटी में आतंकवाद को हवा देने के लिए धकेलने की साजिश में है। इन आतंकियों को घाटी में मोबाइल फोन के प्रयोग न करने की हिदायत है। इन्हें महिला ओवर ग्राउंड वर्कर के घरों में रुकने को कहा गया है ताकि किसी प्रकार का शक न हो। इनपुट यह भी थे कि एलओसी पर तालिबानी और अफगानी आतंकियों को तैयार रखा गया है। इसमें 20 से 25 को एलओसी और चार-पांच को नेपाल के रास्ते घुसपैठ करवानी है। एलओसी पर नौशेरा, भिंबर गली, कृष्णा घाटी और केरन सेक्टर को घुसपैठ के लिए मुफीद बताया गया था।
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1990 और अब में बड़ा फर्क
1990 के दशक में जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था तो कई अफगानी आतंकी भी यहां खलल डालने के लिए भेजे गए थे। इनमें से धीरे-धीरे सभी अफगानी आतंकियों का सुरक्षा बलों ने सफाया कर दिया। अब बदली हुई परिस्थितियों में सुरक्षा बलों का मनोबल ऊंचा है। आतंकियों को ढूंढ-ढूंढकर मारा जा रहा है। नई भर्ती में कमी आई है। कड़ी सुरक्षा के चलते घुसपैठ लगभग रुक गई है। ऐसे में पाकिस्तान के पास आतंकवाद को प्रश्रय देने का अब कोई जरिया नजर नहीं आ रहा है।
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कोट
रूस से लड़ने के लिए पाकिस्तान ने तालिबान का गठन किया। इसलिए दोनों के बीच रिश्ते मधुर हैं। पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में दोबारा आग लगाने के लिए तालिबानियों की घुसपैठ करा सकता है। 1990 के दशक में भी पाकिस्तान अफगानी आतंकियों को यहां भेजता था। जम्मू-कश्मीर से इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण कर कंधार ले जाने की घटना पहले भी हो चुकी है। ऐसे में भारत को रणनीतिक रूप से काम करते हुए तालिबान के साथ बातचीत की पहल कर यह भरोसा जगाना चाहिए कि वह तालिबान के खिलाफ नहीं है। इससे उसे विश्वास में लिया जा सकेगा।
-राकेश कुमार शर्मा, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त)
नए घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान अपना ध्यान भारत की ओर अधिक केंद्रित करेगा। जम्मू-कश्मीर पहले से ही आतंकवाद ग्रस्त है। तालिबान का यहां कोई असर नहीं दिखता है। कोई भी आतंकी आए उसकी फिक्र नहीं है क्योंकि हम पूरी तरह से तैयार हैं। वैसे भी तालिबानियों को यहां स्थानीय आतंकियों का समर्थन नहीं मिल सकेगा। बिना स्थानीय समर्थन के उनका जीना मुश्किल हो जाएगा। हमारे लिए सबसे ज्यादा खतरा पाकिस्तान और चीन के गठजोड़ से है। यदि यह दोनों साथ हो गए तो दिक्कत आएगी।

- अनिल गुप्ता, ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त)
फिलहाल उम्मीद नहीं है कि तालिबान अपने आप को अफगानिस्तान से बाहर ले जाएगा। उसकी प्राथमिकता यह होगी कि अमेरिका समेत अन्य देश उसे मान्यता दें। सभी देश उसे अपना लें। 1990 के दौर के आतंकवाद की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं। उस समय बॉर्डर पर तारबंदी नहीं थी। हवाला का जबर्दस्त रैकेट था। अब भारतीय सीमा पर जबर्दस्त सुरक्षा घेरा है। हवाला नेटवर्क ध्वस्त है। ऐसे में तालिबान के बाहर निकलने की कम गुंजाइश है। वैसे भी तालिबान के नए नेतृत्व गुलाम मोहम्मद ब्रदर और अकुल जादा मौलवी का युद्ध में विश्वास नहीं है।
- डॉ. एस जगन्नाथ, सहायक प्रोफेसर, राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय
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