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Jammu News: सब के दुख हरती हैं मां कालका
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रियासी में कालका माता जी की प्राकृतिक पिंडी। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
रियासी। नगर के बीचोबीच वार्ड तीन की ऊंची पहाड़ी पर स्थित मां कालका माता के मंदिर के प्रति लोगों में काफी ज्यादा आस्था है। मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से माता के मंदिर में आकर वहां पर बनी प्राकृतिक और पवित्र पिंडी की पूजा सच्चे दिल से करता है, उस पर मां की अपार कृपा होती है। मां कालका उसके दुख-दर्द दूर करती है।
मां कालका के मंदिर में नगर के ही नहीं बल्कि आसपास के गांवाें के लोग भी माथा टेकने के लिए आते हैं। हर मंगलवार को मंदिर में भीड़ उमड़ती है। नवरात्र में लोग रोजाना ही सुबह शाम मंदिर में पूजा करने पहुंचते हैं। मंदिर का इतिहास लगभग तीन सौ वर्ष पुराना है। उत्तर प्रदेश से आए एक बाबा ने यहां के लोगों को अपने सपने के बारे में बताया। उन्होंने पहाड़ी पर माता की पिंडी होने की बात बताई। पहाड़ी चारों तरफ से जंगल से भरी हुई थी। ढोल बजाते हुए और जंगली जानवरों को दूर भगाते हुए स्थानीय लोग वहां पर पहुंचे तो वहां एक पिंडी के आगे दो शेर बैठे हुए दिखे लोगों के माथा टेकने के बाद शेर वहां से चले गए।
मंदिर की पहाड़ी के पास वाली जगह को आज भी शेरों वाला बाग कहा जाता है। मां कालका जी की पूजा आज भी बाबा के वंशज कर रहे हैं। मां कालका बड़ू बिरादरी की कुलदेवी के रूप में भी जानी जाती है। बिरादरी के लोग समय समय पर जहां पर आ कर प्रसाद चढ़ाते हैं और पूजा करते हैं। माता मंदिर रियासी से कटड़ा, पौनी,सलाल,अरनास की तरफ जाने वाले चारों तरफ के सड़क मार्ग से दिखता है। नवरात्र को लेकर मंदिर में रंग-रोगन किया जा रहा है।
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रियासी। नगर के बीचोबीच वार्ड तीन की ऊंची पहाड़ी पर स्थित मां कालका माता के मंदिर के प्रति लोगों में काफी ज्यादा आस्था है। मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से माता के मंदिर में आकर वहां पर बनी प्राकृतिक और पवित्र पिंडी की पूजा सच्चे दिल से करता है, उस पर मां की अपार कृपा होती है। मां कालका उसके दुख-दर्द दूर करती है।
मां कालका के मंदिर में नगर के ही नहीं बल्कि आसपास के गांवाें के लोग भी माथा टेकने के लिए आते हैं। हर मंगलवार को मंदिर में भीड़ उमड़ती है। नवरात्र में लोग रोजाना ही सुबह शाम मंदिर में पूजा करने पहुंचते हैं। मंदिर का इतिहास लगभग तीन सौ वर्ष पुराना है। उत्तर प्रदेश से आए एक बाबा ने यहां के लोगों को अपने सपने के बारे में बताया। उन्होंने पहाड़ी पर माता की पिंडी होने की बात बताई। पहाड़ी चारों तरफ से जंगल से भरी हुई थी। ढोल बजाते हुए और जंगली जानवरों को दूर भगाते हुए स्थानीय लोग वहां पर पहुंचे तो वहां एक पिंडी के आगे दो शेर बैठे हुए दिखे लोगों के माथा टेकने के बाद शेर वहां से चले गए।
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मंदिर की पहाड़ी के पास वाली जगह को आज भी शेरों वाला बाग कहा जाता है। मां कालका जी की पूजा आज भी बाबा के वंशज कर रहे हैं। मां कालका बड़ू बिरादरी की कुलदेवी के रूप में भी जानी जाती है। बिरादरी के लोग समय समय पर जहां पर आ कर प्रसाद चढ़ाते हैं और पूजा करते हैं। माता मंदिर रियासी से कटड़ा, पौनी,सलाल,अरनास की तरफ जाने वाले चारों तरफ के सड़क मार्ग से दिखता है। नवरात्र को लेकर मंदिर में रंग-रोगन किया जा रहा है।
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