फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   story of Terrorist adil ahmed dar who attack on pulwama

एक शांत-शर्मीला नौजवान बना गुस्से का ज्वालामुखी, ये है उसकी आतंकी बनने की कहानी

Thu, 09 May 2019 09:28 PM IST
vivek shukla न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: vivek shukla Updated Thu, 09 May 2019 09:28 PM IST
विज्ञापन
story of Terrorist adil ahmed dar who attack on pulwama
file - फोटो : अमर उजाला

भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा जिले में इस साल फरवरी में हुए एक आत्मघाती हमले में भारत के 40 से अधिक सैनिक मारे गए थे। घाटी में बीते दो दशकों में आतंकी में युवाओं की भूमिका काफी बढ़ गई है।

विज्ञापन


ये 14 फरवरी की बात है जब आदिल अहमद डार नामक नौजवान ने विस्फोटकों से लदे वाहन को पुलवामा में भारी सुरक्षा वाले श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर अर्धसैनिकों बलों को ले जा रही एक बस से टकरा दिया। सुरक्षाबलों पर हुए इस हमले ने पूरे भारत को झकझोर दिया। टीवी न्यूज़ चैनल और अखबार उन खबरों से भर गए जिनमें मारे गए जवानों की कहानियां थीं।
विज्ञापन


कोई हमले से पहले ही अपने घर से लौटा था, तो किसी ने हमले से ठीक पहले अपने परिजनों से बात की थी। कुछ जवान तो धमाके के वक्त अपने घरवालों से ही बात कर रहे थे। आदिल अहमद डार की पहचान इस हमले के कई घंटे बाद तब हुई जब पाकिस्तान स्थित आतंकी समूह जैश-ए-मोहम्मद ने एक वीडियो जारी किया और हमले में अपना हाथ होने का दावा किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


वीडियो में नजर आ रहे डार के चेहरे पर इस बात को लेकर कोई शिकन नहीं थी कि वो आत्मघाती हमला करके इतने लोगों की जान लेने वाला है। वीडियो में डार ने बताया कि वो साल 2018 में जैश-ए-मोहम्मद में शामिल हुआ था और उसके बाद पुलवामा हमले की जिम्मेदारी उसे दी गई थी। डार का ये भी कहना था कि जब ये वीडियो जारी होगा, तब तक तो वो जन्नत पहुंच चुका होगा।

'शांत-शर्मीला नौजवान बना गुस्से का ज्वालामुखी'

बाद में डार के बारे में और जानकारी सामने आई। वो पुलवामा में ही पला-बढ़ा था। पुलवामा, जम्मू-कश्मीर की अनंतनाग लोकसभा सीट का हिस्सा है। अनंतनाग पूरे भारत की एकमात्र ऐसी लोकसभा सीट है जहां सुरक्षा कारणों से तीन चरणों में चुनाव कराया गया है।

डार हाईस्कूल से आगे नहीं पढ़ पाया। पिछले साल मार्च में लापता होने से पहले तक वो छुटपुट काम करके रोजी-रोटी कमा रहा था। 22 साल का ये नौजवान स्वभाव से शांत और शर्मीला था। उसके परिवार का दावा है कि साल 2016 में एक लोकप्रिय आतंकी की मौत होने पर विरोध प्रदर्शन के दौरान डार जख्मी हुआ और उसके बाद भारत के प्रति उसका गुस्सा बढ़ता चला गया।

डार उन हजारों कश्मीरी नौजवानों में से एक था जो बंदूक के साए में पैदा हुए और बाद में बंदूक के साए में ही ज़िंदगी खत्म हुई।  

भारत का आरोप है कि पाकिस्तान इस इलाक़े में आतंकवाद को समर्थन देकर हिंसा को बढ़ावा देता है। पाकिस्तान इससे इनकार करता है। साल 1989 से कश्मीर में हिंसा की घटनाएं लगातार होती रही हैं जिनमें 70 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इनमें वो कश्मीरी हिंदू भी हैं जिन्हें 1990 के दशक की शुरुआत में आतंकियों ने निशाना बनाया।

आलोचकों का कहना है कि भारत की सख्ती की वजह से घाटी के युवक अलग राह पर चल निकले हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2016 से अप्रैल 2018 के बीच भारतीय सुरक्षाबलों ने बहुत अधिक बल प्रयोग किया। इसमें पैलेट गन का इस्तेमाल भी शामिल है।

इसकी वजह से सैकड़ों लोगों को अपनी आंखों की रौशनी गंवानी पड़ी। लेकिन भारत इस रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों को खारिज कर देता है। पुलवामा में रहने वाले 68 वर्षीय अब्दुल अहमद बट कहते हैं, ''1990 के बाद पैदा हुए कश्मीरियों को कभी शांति नसीब नहीं हुई। उनका जन्म कर्फ्यू के दौरान हुआ और कर्फ्यू में ही उन्होंने दम तोड़ा।''

बट कहते हैं कि साल 1989 से पहले का कश्मीर उन्हें याद है जो एक ख्वाब था जिसे मौजूदा पीढ़ी को देखने नहीं दिया गया। साल 2000 आते-आते घाटी में आतंक में कुछ कमी आने लगी थी लेकिन साल 2016 में युवा आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद आतंक में फिर इजाफा होने लगा। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में 150 संदिग्ध आतंकी मारे गए। दो साल बाद 2018 में 230 से अधिक आतंकी मारे गए।

सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय बुरहान वानी को भारत सरकार आतंकी मानती थी, लेकिन कई स्थानीय लोगों ने वानी को नई कश्मीरी पीढ़ी का नुमाइंदा माना। बुरहान के मारे जाने के बाद विरोध प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाबलों की कार्रवाई में आदिल अहमद डार के एक पैर में गोली लगी, जिसकी वजह से डार को 11 महीने तक बिस्तर पर रहना पड़ा।

बुरहान के पिता गुलाम हसन डार कहते हैं, ''उस दिन ने आदिल को अचानक बदल दिया. एक शर्मीला नौजवान ग़ुस्से का ज्वालामुखी बन गया, लेकिन वो इसका खुलकर इजहार नहीं करता था।''

हिंसा का महिमामंडन

पैर में गोली लगने के बाद आदिल ने अपना वक्त इबादत, इंटरनेट और दोस्तों के सहारे काटा. लेकिन कुछ ठीक होने पर मार्च 2018 में आदिल ने आतंकी बनने के लिए घर छोड़ दिया। कुछ लोग कहते हैं कि आदिल कश्मीर के राजनीतिक हालात की वजह से बेहद नाराज था। आदिल के रिश्तेदार अल्ताफ बताते हैं, ''उसे इस बात का दुख था कि चरमपंथी मुर्गों की तरह मारे जा रहे हैं और दूसरी तरफ कोई हताहत नहीं हो रहा है।'' ध्यान देने वाली बात ये है कि मारे गए चरमपंथियों के अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में भीड़ जुटती रही है।

पुलवामा के नागरिक जिब्रान अहमद कहते हैं, ''चरमपंथी हमारे घरों में नहीं बल्कि पुलिस स्टेशन या आर्मी कैंप में बनते हैं। साल 2016 में पुलिस ने जिन युवकों को पकड़ा था, उनमें से अधिकतर चरमपंथ की राह पर चल पड़े। शायद उन्हें लगा कि इस राह पर चल पड़ना, हर दिन बेइज्जती बर्दाश्त करने से बेहतर है।''

थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े सुरक्षा मामलों के जानकार सुशांत सरीन कहते हैं कि समस्या का एक हिस्सा ये भी है कि हिंसा को महिमामंडित किया जाता है।
वो कहते हैं, ''अधिकतर समाजों में होता ये है कि हिंसा में शामिल लोगों को खारिज कर दिया जाता है, लेकिन कश्मीर में ऐसा नहीं होता। लोग जब पथराव करें, हथियार उठा लें, तो क्या सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठी रहे।'' सुशांत सरीन कहते हैं कि कोई सेना निहत्थे नागरिकों पर गोली नहीं चलाना चाहती।

नफरत के बीज

कश्मीर में तैनात एक पुलिसकर्मी ने अपना नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा कि भारत के तरीके कारगर साबित नहीं हुए। वो कहते हैं, ''जब आप एक चरमपंथी को मारते हैं, दो और चरमपंथी बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। राजनीतिक समाधान की जगह हाल के वर्षों में चरमपंथियों को मारने पर ध्यान लगाया गया है।''

चरमपंथ निरोधक मामलों के जानकार और लेखक अजय साहनी का कहना है कि भारत में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने घाटी को बर्बाद कर दिया और ''पूरे भारत के लिए एक शत्रु पैदा कर दिया, जो एक सफल चुनावी रणनीति तो हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के हिसाब से बहुत बड़ी चूक है।''

पुलवामा में आत्मघाती हमले के बाद भारत के अलग-अलग शहरों में कश्मीरी नागरिकों के साथ हिंसा और प्रताड़ना के कुछ मामले सामने आए। तारिक हमीद के बेटे को ऐसी ही घटना की वजह से देहरादून से अपने घर कश्मीर लौटना पड़ा। वो कहते हैं, ''मेरा डर ये है कि अब आगे क्या होगा। मेरे बेटे को भारत और भारतीयों से नफरत होने लगी है। वो पहले ऐसा नहीं था।''

 

गुलाम हसन डार कहते हैं कि वो नहीं चाहते कि अब कोई बच्चा उनके बेटे की राह पर चल पड़े। वो कहते हैं, ''मैं तो हमेशा यही जानता था कि वो मेरा आज्ञाकारी बेटा है। काश मैं ये समझा सकूं कि एक जिंदा बम कैसे बन गया।''
 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed