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Jammu News: एसटी बिल से पहाड़ी खुश, गुज्जर-बक्करवाल लंबी लड़ाई के मूड में
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर में पहाड़ियों को एसटी का दर्जा दिए जाने संबंधी बिल संसद में पेश होने से पहाड़ी समुदाय खुश है। वह जश्न मनाने की तैयारी में है, लेकिन गुज्जर बक्करवाल आशंकित हैं। उन्हें अपना कोटा घटने की आशंका है। उन्होंने बिल के खिलाफ सड़क से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई की रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
पहाड़ियों का मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों राजोरी, पुंछ, करनाह, केरन, उड़ी के लगभग 15 लाख पहाड़ी समुदाय के लोगों के आर्थिक-सामाजिक जीवन में आरक्षण से बदलाव आएगा। साथ ही राजनीतिक रूप से भी सशक्त होंगे। इनका मानना है कि एसटी आरक्षण की बदौलत ही गुज्जर बक्करवाल समुदाय के तीन डीडीसी चेयरमैन हैं, जबकि सैकड़ों की संख्या में डीडीसी सदस्य, पंच व सरपंच हैं। इससे पहाड़ी समुदाय वंचित है। वहीं, रोजी-रोजगार के लिए पहाड़ियों के विस्थापन पर रोक लगेगी। वहीं, गुज्जर बक्करवालों का मानना है कि पहाड़ियों को एसटी आरक्षण से उनका हक छिनेगा। यह नियम विरुद्ध है तथा सांविधानिक रूप से गलत है।
गृह मंत्री ने आश्वस्त किया है कि गुज्जर बक्करवालों के हक को नहीं छेड़ा जाएगा। इस समुदाय को विश्वास करना चाहिए। भाजपा ने ही अंतर जनपदीय आरक्षण पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाया है। पहली बार उन्हें वन अधिकार दिया गया है। आरक्षण से पहाड़ी समुदाय आर्थिक-सामाजिक रूप से सशक्त होगा और उसे भी समाज में पूरे सम्मान के साथ रहने का हक हासिल होगा। युवा पीढ़ी को देशभर में पढ़ाई के साथ ही रोजगार में लाभ मिलेगा।
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- विबोध गुप्ता, महासचिव भाजपा व पहाड़ी प्रतिनिधि
बिल का स्वागत है। मातृभूमि की सेवा में लगे बॉर्डर इलाके के लोगों को सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक रूप से सशक्त होने का मौका मिल सकेगा। 1989 से लड़ी जा रही लड़ाई का अब जाकर फल मिला है। सीमावर्ती क्षेत्रों के 15-16 विधानसभा सीटों पर पहाड़ियों की आबादी 40 से 60 फीसदी तक है। ऐसे में उन्हें एसटी का दर्जा मिलने से यह समुदाय पहली बार से राजनीतिक रूप से सशक्त होगा। साथ ही अन्य आरक्षित समुदायों की तरह इसे भी लाभ मिल सकेगा।
- डॉ. नितन शर्मा, एडवोकेट-पहाड़ी प्रतिनिधि
जो योग्य नहीं हैं उन्हें आरक्षण देना गलत है। इसके लिए जो आयोग बना था उसमें भी गुज्जर बक्करवालों की नुमाइंदगी नहीं थी। पहाड़ी कौन है आखिर यह कैसे परिभाषित होगा। भाषा के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं किया जा सकता है। पहाड़ी बोलने वालों में ऊंची जाति के लोग भी हैं। इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाएंगे। देशभर के 22-25 करोड़ गुज्जर-बक्करवाल कश्मीर से कन्याकुमारी तक सड़कों पर उतरकर विरोध करेंगे।
- एडवोकेट मोहम्मद अनवर चौधरी, संयोजक-ऑल जेएंडके गुज्जर बक्करवाल कोआर्डिनेशन कमेटी
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर में पहाड़ियों को एसटी का दर्जा दिए जाने संबंधी बिल संसद में पेश होने से पहाड़ी समुदाय खुश है। वह जश्न मनाने की तैयारी में है, लेकिन गुज्जर बक्करवाल आशंकित हैं। उन्हें अपना कोटा घटने की आशंका है। उन्होंने बिल के खिलाफ सड़क से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई की रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
पहाड़ियों का मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों राजोरी, पुंछ, करनाह, केरन, उड़ी के लगभग 15 लाख पहाड़ी समुदाय के लोगों के आर्थिक-सामाजिक जीवन में आरक्षण से बदलाव आएगा। साथ ही राजनीतिक रूप से भी सशक्त होंगे। इनका मानना है कि एसटी आरक्षण की बदौलत ही गुज्जर बक्करवाल समुदाय के तीन डीडीसी चेयरमैन हैं, जबकि सैकड़ों की संख्या में डीडीसी सदस्य, पंच व सरपंच हैं। इससे पहाड़ी समुदाय वंचित है। वहीं, रोजी-रोजगार के लिए पहाड़ियों के विस्थापन पर रोक लगेगी। वहीं, गुज्जर बक्करवालों का मानना है कि पहाड़ियों को एसटी आरक्षण से उनका हक छिनेगा। यह नियम विरुद्ध है तथा सांविधानिक रूप से गलत है।
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गृह मंत्री ने आश्वस्त किया है कि गुज्जर बक्करवालों के हक को नहीं छेड़ा जाएगा। इस समुदाय को विश्वास करना चाहिए। भाजपा ने ही अंतर जनपदीय आरक्षण पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाया है। पहली बार उन्हें वन अधिकार दिया गया है। आरक्षण से पहाड़ी समुदाय आर्थिक-सामाजिक रूप से सशक्त होगा और उसे भी समाज में पूरे सम्मान के साथ रहने का हक हासिल होगा। युवा पीढ़ी को देशभर में पढ़ाई के साथ ही रोजगार में लाभ मिलेगा।
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- विबोध गुप्ता, महासचिव भाजपा व पहाड़ी प्रतिनिधि
बिल का स्वागत है। मातृभूमि की सेवा में लगे बॉर्डर इलाके के लोगों को सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक रूप से सशक्त होने का मौका मिल सकेगा। 1989 से लड़ी जा रही लड़ाई का अब जाकर फल मिला है। सीमावर्ती क्षेत्रों के 15-16 विधानसभा सीटों पर पहाड़ियों की आबादी 40 से 60 फीसदी तक है। ऐसे में उन्हें एसटी का दर्जा मिलने से यह समुदाय पहली बार से राजनीतिक रूप से सशक्त होगा। साथ ही अन्य आरक्षित समुदायों की तरह इसे भी लाभ मिल सकेगा।
- डॉ. नितन शर्मा, एडवोकेट-पहाड़ी प्रतिनिधि
जो योग्य नहीं हैं उन्हें आरक्षण देना गलत है। इसके लिए जो आयोग बना था उसमें भी गुज्जर बक्करवालों की नुमाइंदगी नहीं थी। पहाड़ी कौन है आखिर यह कैसे परिभाषित होगा। भाषा के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं किया जा सकता है। पहाड़ी बोलने वालों में ऊंची जाति के लोग भी हैं। इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाएंगे। देशभर के 22-25 करोड़ गुज्जर-बक्करवाल कश्मीर से कन्याकुमारी तक सड़कों पर उतरकर विरोध करेंगे।
- एडवोकेट मोहम्मद अनवर चौधरी, संयोजक-ऑल जेएंडके गुज्जर बक्करवाल कोआर्डिनेशन कमेटी