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तो कश्मीर में इसलिए की गई सरपंचों की हत्या...?

Thu, 18 Dec 2014 11:56 PM IST
Updated Thu, 18 Dec 2014 11:56 PM IST
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special story on sarpanch killings in kashmir

उत्तर कश्मीर के सोपोर में हाल में हुए विधानसभा चुनाव के तीन दिन बाद पांच अज्ञात बंदूकधारियों ने गांव के हेगाम इलाके के एक गांव के सरपंच को अगवा कर लिया। अगली सुबह कश्मीर पुलिस को एक बाग से सरपंच की गोलियों से छलनी लाश मिली।

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बीबीसी ने ऐसे कुछ परिवारों से बात की जिनके सदस्य सरपंच रहे हैं और अज्ञात बंदूकधारियों ने उनकी हत्या कर दी। आठ अप्रैल 2013 की शाम गुलाम मोहम्मद लोन दक्षिणी कश्मीर के कुलपोरा पुलवामा में अपने आधे बने घर में बेटे के साथ ईंटों पर पानी दे रहे थे।
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अंधेरे में अचानक एक आदमी सामने आया और उसने सवाल किया, 'क्या तुम सरपंच गुलाम मोहम्मद लोन हो?' सरपंच के हां में जवाब देते ही उसने उनका सिर पकड़ा और माथे में गोली मार दी। मौके पर ही उनकी मौत हो गई और वह शख्स अंधेरे में गायब हो गया। लोने के बेटे एजाज़ अहमद उस पूरी घटना के अकेले चश्मदीद हैं।
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'हम अब और मुसीबत नहीं बुलाना चाहते'

special story on sarpanch killings in kashmir

ये घटनाएं बड़ी रहस्यमय हैं जिनमें मुख्य रूप से सरपंच, पंच और उनके परिवारों को ही निशाना बनाया जाता है। जम्मू कश्मीर के 22 ज‌िलों में कुल 4128 पंचायत हैं और इनमें 33,000 पंचायत सदस्य हैं। पंचायतों में 29000 पंच और 4145 सरपंच हैं। पिछला चुनाव अप्रैल 2011 में हुआ था।

राज्य में 1989 में हथियारबंद विरोध शुरू होने के बाद यह पहला पंचायत चुनाव था। इन चुनावों को लोकतंत्र के लिए एक नए युग की शुरुआत माना गया क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। पंचायत सदस्य स्थानीय मुद्दों और जमीनी स्तर पर लोगों की सेवा के लिए चुने गए।

हालांकि एक साल बाद ही पंचों और सरपंचों की अज्ञात बंदूकधारियों के हाथों सुनियोजित तरीके से हत्या का सिलसिला शुरू हो गया। इन बंदूकधारियों की पहचान के साथ ही इनके मकसद का भी पता नहीं।

गुलाम मोहम्मद लोन की मौत के बाद इलाके के थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई। रिपोर्ट में पुलिस ने 'अज्ञात बंदूकधारी' के ख‌िलाफ मामला दर्ज किया जिसकी पहचान अब तक नहीं पता चली है। लोन की बीवी हाजरा बानो का कहना है कि पुलिस ने मामला दर्ज करने का बाद आगे कार्रवाई नहीं की। घटना के बाद एक साल बीत चुके हैं लेकिन पुलिस के पास हत्यारे का कोई सुराग नहीं है।

उधर, लोन परिवार भी मामले को आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। हाजरा कहती हैं, 'हम अब और मुसीबत नहीं बुलाना चाहते। मामले का आगे बढ़ना हत्यारों को भड़का सकता है और वे मेरे बेटे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। मैं नहीं चाहती कि ऐसा हो।'

'बड़ी साज‌िश' और 'गैरइस्लामी'

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सरपंच की हत्या के लिए पुलिस चरमपंथियों और अलगवावादियों को ज‌िम्मेदार ठहराती है जबकि अलगाववादी भी इसे 'बड़ी साज‌िश' और 'गैरइस्लामी' करार देकर इसकी निंदा करते हैं। पंचायत के चुनावों को पार्टी से ऊपर उठ कर लड़ा जाना था लेकिन ज्यादातर सदस्य खुद किसी न किसी पार्टी से जुड़े हैं। इनमें नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी या कांग्रेस जैसी कश्मीर की मुख्य राजनीतिक पार्टियां शामिल हैं।

कई बार राजनीतिक दल एक दूसरे पर भी इन हत्याओं के आरोप लगाते हैं। इन हत्याओं को कई बार चरमपंथियों की लोगों को डरा कर चुनाव से दूर करने के लिए की गई हरकत के रूप में भी देखा जाता है। इसी साल आठ मार्च को मोहम्मद शाबान डार देर शाम की नमाज़ इशा के लिए अपने गांव डोगरीपुरा पुलवामा में पास की मस्जिद गए।

उनके बेटे गुलाम मोहम्मद डार भी कुछ ही मिनटों के बाद मस्जिद जाते थे। उस शाम जब गुलाम मोहम्मद मस्जिद गए तो उनके पिता कहीं नहीं दिखे। काफी देर ढूंढने के मस्जिद के परिसर में उनका शव मिला। उनके सिर में भी किसी अज्ञात बंदूकधारी ने गोली मार दी थी।

50 साल के गुलाम मोहम्मद डार कहते हैं, 'मैं तब सरपंच था। मैंने सोचा कि मेरे पद के कारण ही मेरे पिता की हत्या हुई।' घटना के तुरंत बाद डार ने स्थानीय अखबारों में अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया। वह खुद को और अपने परिवार को किसी भी राजनीतिक दल से अलग रखना चाहते हैं।

'अब हर चीज गुप्त और रहस्यमय है'

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हालांकि इस्तीफे से भी उनका फायदा नहीं हुआ। मामला और ज्यादा संदिग्ध हो गया जब डार के भाई गुलाम मोहिउद्दीन को भी उसी गांव के उनके घर में चार अज्ञात बंदूकधारियों ने मार डाला। मोहिउद्दीन बढ़ई थे। डार इन परिवार में हुई दो हत्याओं के बाद घबरा गए। उन्होंने कहा, 'शुरुआती दिनों में पता होता था कि किसने किसे मारा है और क्यों लेकिन अब हर चीज गुप्त और रहस्यमय है।'

2011 में चुने जाने के बाद कम से कम 11 सरपंचों और पंचों की हत्या हो चुकी है। इन अज्ञात बंदूकधारियों के हमलों में 100 से ज़्यादा लोग घायल भी हुए हैं। जम्मू कश्मीर पंचायत कांफ्रेंस के चेयरमैन शफीक मीर कहते हैं कि जब से सरपंचों पर हमले शुरू हुए हैं तब से पूरी पंचायत संस्था ही बेकार हो गई है। 1000 से ज्यादा पंचायत सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देकर लोगों से माफी मांगी है।

सरपंच के हत्यारों की पहचान के बारे में जम्मू कश्मीर पुलिस के कश्मीर डिवीजन के आईजी अब्दुल गनी मीर को जानकारी नहीं है लेकिन वो पुलिस तंत्र के बेखबर होने के दावों को खारिज कर देते हैं। वो कहते हैं कि पुलिस हर एक मामले की छानबीन कर रही है। दक्षिण कश्मीर के डीआईजी आलोक कुमार ने इस बारे में बात करने से साफ इनकार कर दिया।

तीन सालों में सरकार इन हत्याओं में एक भी मामले को नहीं सुलझा सकी है। अज्ञात बंदूकधारी अब भी पकड़ से बाहर हैं और पंचायत सदस्यों की ज़िंदगी के लिए खतरा बने हुए हैं। क्या ये अज्ञात बंदूकधारी कभी पहचाने जाएंगे? रहस्य अभी भी नहीं सुलझा है।

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