कामनवेल्थ सम्मेलन में बुलावा नहीं मिलने से मुफ्ती आहत
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पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर विधानसभा के वजूद को नकारे जाने के बाद पीडीपी अपनी स्थापित नीतियों पर पुनर्विचार को बाध्य हुई है। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद कश्मीर में शांतिपूर्ण मतदान का श्रेय अलगाववादियों और पाकिस्तान देने वाले मुख्यमंत्री मुफ्ती पाकिस्तान के ताजा रुख से आहत हैं।
पाक ने जम्मू-कश्मीर को विवादास्पद क्षेत्र बताते हुए इसके विधानसभा अध्यक्ष को कामनवेल्थ पार्लियामेंट्री कांफ्रेंस में नहीं बुलाया है। यह परोक्ष रूप में पाक द्वारा मुफ्ती के मुख्यमंत्री पद को भी नकारने जैसा है। लिहाजा, पीडीपी अपने कुछ एजेंडे में बदलाव कर सकती है।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को टेलीफोन पर अपनी भावना से अवगत कराया है। मुफ्ती के करीबी सूत्रों के मुताबिक पीडीपी ने भारत सरकार की आपत्ति पर सहमति जताई है।
इससे पहले पीडीपी कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अलगाववादियों से बातचीत पर जोर देती रही है। पीडीपी के दबाव के कारण इस मुद्दे को भाजपा-पीडीपी के गठबंधन एजेंडे में भी शामिल किया गया था।
जम्मू-कश्मीर की 80 फीसदी जनता का जनादेश प्राप्त
केंद्र सरकार ने पहले ही साफ कर दिया है कि किसी भी समूह से संविधान के दायरे में ही बातचीत की जा सकती है। अब पीडीपी भी अलगाववादियों से बातचीत पर जोर से संबंधित एजेंडे को ठंडे बस्ते में डाल रही है।
स्टैंड में बदलाव के बाद पीडीपी अब मानती है कि वर्तमान सरकार को जम्मू-कश्मीर की 80 फीसदी जनता का जनादेश प्राप्त है। अलगाववादियों का अपना अलग पक्ष हो सकता है। पीडीपी अब तक कहती रही है कि वह कश्मीर के हैं, इसलिए उनकी बात भी सुनी जानी चाहिए।
लेकिन, पाकिस्तान ने ताजा स्टैंड से सिर्फ अलगाववादियों के वजूद को ही स्वीकार किया है। इस मान्यता में चुनी हुई सरकार को खारिज करने की नीति छिपी है। लिहाजा, मुफ्ती अब अलगाववादियों के पक्ष में सीधे खड़े होने से परहेज कर रहे हैं।
भाजपा-पीडीपी सरकार के गठन से पहले पाकिस्तान उच्चायुक्त की अलगाववादियों से मुलाकात के बाद सचिव स्तर की वार्ता रद्द हुई थी। तब मुफ्ती ने उसका विरोध किया था। बदले माहौल में पीडीपी अब केंद्र सरकार के स्टैंड से पूरी तरह सहमत दिख रही है।