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Jammu News: तीन माह बाद खुले मचैल मंदिर के कपाट, मां चंडी के दर्शन के लिए उमड़े भक्त
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- गांव में बने छोटे मंदिर से माता की मूर्ति को मुख्य मंदिर में किया विराजमान
- मां के आशीर्वाद के लिए दिन भर रहीं भक्तों की कतारें, स्थानीय लोगों ने लगाया लंगर
संवाद न्यूज एजेंसी
किश्तवाड़। जिले के पाडर उपमंडल की तहसील मचैल में शनिवार को बैसाखी पर्व पर माता चंडी के दरबार के कपाट खोल दिए गए। भारी बर्फबारी के बाद तीन महीने पहले माता के मुख्य मंदिर के कपाट बंद किए गए थे। मकर संक्रांति के दिन मुख्य मंदिर से मां चंडी गांव के निवासी पहलवान के घर की छत बने छोटे मंदिर में विराजमान हुईं थीं।
शनिवार को ढोल-नगाड़ों के साथ मुख्य पुजारी ने माता चंडी की मूर्ति को मुख्य मंदिर में विराजमान किया। इसके साथ ही मां के दर्शन के लिए मंदिर के कपाट खोल दिए गए। इस अवसर पर मंदिर को भव्य तरीके से सजाया गया। पहले दिन बड़ी संख्या में भक्तों ने माथा टेककर माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त किया। मां के दर्शन के लिए दिनभर भक्तों की कतारें लगी रहीं। पूरा गांव माता के जयकारों से गूंज रहा था। स्थानीय लोगों की ओर से श्रद्धालुओं के लिए लंगर की व्यवस्था भी की। अब मंदिर अगली मकर संक्राति तक खुला रहेगा, हालांकि इसे बीच में 10 दिनों के लिए बंद किया जाता है। यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है।
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25 जुलाई से शुरू होगी मचैल यात्रा
25 जुलाई से मचैल यात्रा शुरू होगी और यह पांच सितंबर तक चलेगी। 1981 में मचैल यात्रा शुरू की गई थी। पहले यह यात्रा छोटे से समूह तक ही सीमित थी, लेकिन किश्तवाड़ व गुलाबगढ़ का मार्ग खुलने के बाद भक्तों की संख्या में बढ़ोतरी हुई। यात्रा में धीरे-धीरे पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश से भी श्रद्धालु आने लगे। मचैल गांव किश्तवाड़ से 95 किलोमीटर और गुलाबगढ़ से तीस किलोमीटर दूर भूर्ज व भोट नाले के बीच बसा है। दुर्गम पहाड़ियों के बीच प्रकृति की गोद में बसे इस गांव के मध्य भाग में प्रसिद्ध मचैल माता का मंदिर बना है। इस मंदिर के मुख्य भाग में समुद्र मंथन का आकर्षक और कलात्मक दृश्य अंकित है। मंदिर के बाहरी भाग में पौराणिक देवी-देवताओं की मूर्तियां लकड़ी की पट्टिकाओं पर बनी हैैं। मंदिर के भीतर मां चंडी एक पिंडी के रूप में विराजमान हैं।
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- मां के आशीर्वाद के लिए दिन भर रहीं भक्तों की कतारें, स्थानीय लोगों ने लगाया लंगर
संवाद न्यूज एजेंसी
किश्तवाड़। जिले के पाडर उपमंडल की तहसील मचैल में शनिवार को बैसाखी पर्व पर माता चंडी के दरबार के कपाट खोल दिए गए। भारी बर्फबारी के बाद तीन महीने पहले माता के मुख्य मंदिर के कपाट बंद किए गए थे। मकर संक्रांति के दिन मुख्य मंदिर से मां चंडी गांव के निवासी पहलवान के घर की छत बने छोटे मंदिर में विराजमान हुईं थीं।
शनिवार को ढोल-नगाड़ों के साथ मुख्य पुजारी ने माता चंडी की मूर्ति को मुख्य मंदिर में विराजमान किया। इसके साथ ही मां के दर्शन के लिए मंदिर के कपाट खोल दिए गए। इस अवसर पर मंदिर को भव्य तरीके से सजाया गया। पहले दिन बड़ी संख्या में भक्तों ने माथा टेककर माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त किया। मां के दर्शन के लिए दिनभर भक्तों की कतारें लगी रहीं। पूरा गांव माता के जयकारों से गूंज रहा था। स्थानीय लोगों की ओर से श्रद्धालुओं के लिए लंगर की व्यवस्था भी की। अब मंदिर अगली मकर संक्राति तक खुला रहेगा, हालांकि इसे बीच में 10 दिनों के लिए बंद किया जाता है। यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है।
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25 जुलाई से शुरू होगी मचैल यात्रा
25 जुलाई से मचैल यात्रा शुरू होगी और यह पांच सितंबर तक चलेगी। 1981 में मचैल यात्रा शुरू की गई थी। पहले यह यात्रा छोटे से समूह तक ही सीमित थी, लेकिन किश्तवाड़ व गुलाबगढ़ का मार्ग खुलने के बाद भक्तों की संख्या में बढ़ोतरी हुई। यात्रा में धीरे-धीरे पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश से भी श्रद्धालु आने लगे। मचैल गांव किश्तवाड़ से 95 किलोमीटर और गुलाबगढ़ से तीस किलोमीटर दूर भूर्ज व भोट नाले के बीच बसा है। दुर्गम पहाड़ियों के बीच प्रकृति की गोद में बसे इस गांव के मध्य भाग में प्रसिद्ध मचैल माता का मंदिर बना है। इस मंदिर के मुख्य भाग में समुद्र मंथन का आकर्षक और कलात्मक दृश्य अंकित है। मंदिर के बाहरी भाग में पौराणिक देवी-देवताओं की मूर्तियां लकड़ी की पट्टिकाओं पर बनी हैैं। मंदिर के भीतर मां चंडी एक पिंडी के रूप में विराजमान हैं।
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