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इस बार भी कोरोना, लॉकडाउन ने फीकी कर दीं ईद की खुशियां
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जम्मू। मुस्लिम समुदाय के सबसे बड़े त्यौहार ईद की खुशियां कोरोना और लॉकडाउन ने इस बार भी फीकी कर दी हैं। इस पर्व पर बड़े से लेकर छोटे दुकानदारों का व्यापार भी चमक उठता है, लेकिन कोरोना महामारी ने लोगों को घर में कैद कर रख दिया है, जिससे दुकानदारों का कारोबार चौपट हाने के साथ-साथ लोग भी पर्व पर जरूरी सामान की खरीदारी नहीं कर पाए हैं।
ईद की खुशियां रमजान माह से पहले ही शुरू हो जाती हैं। ईद को लेकर मुस्लिम समाज के लोग रमजान माह के शुरू होने से पहले ही घरों को रंग-रोगन के साथ मरम्मत कार्य शुरू कर देते हैं। ईद पर परिवार के हर सदस्य के लिए नए कपड़े, घर के लिए नए बर्तन, सजावटी सामान समेत अनेक वस्तुओं की खरीदारी की जाती है। कई घरों में सोफा, बेड आदि सामान बदला जाता है, लेकिन इस कोरोना और लॉकडाउन के शोर ने सभी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। न तो किसी को कुछ खरीदने का मौका मिल पाया है और न ही दुकानदारों का सामान बिका है। ईद की नमाज अदा करने के लिए मुसलमान नए कपड़े को तरजीह देते हैं, लेकिन लॉकडाउन के दौरान दुकानें खुलने के लिए सुबह छह से 10 बजे तक का समय निर्धारित किया गया है। ऐसे में कोई दुकानदार अपनी दुकान भी ठीक प्रकार से लगा नहीं पाता और दुकान को बंद करने का समय हो जाता है।
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ठप हो गया टेलरिंग का काम
ईद को लेकर मुसलमान नमाज अदा करने के लिए परिवार के हर सदस्य के लिए नए कपड़े खरीदते हैं। इसमें कम से कम दो जोड़ी कपड़ों की व्यवस्था करते हैं। एक सामान्य तरीके से पहनने के लिए और दूसरा ईद की नमाज अदा करने के लिए कुर्ता पायजामा की व्यवस्था करते हैं। कुर्ता पायजामा दर्जी से सिलवाए जाते हैं, लेकिन सुबह छह से 10 बजे तक दुकान खुलने के समय को लेकर टेलर की दुकानें तो खुल ही नहीं पाती हैं।
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कपड़ों की दुकानों पर सन्नाटा
कपड़े की दुकानों पर भी कोरोना की मार पड़ी है। ईद को लेकर नया कपड़ा खरीदने के लिए लोग अगर बाजार पहुंचें भी तो कैसे, क्योंकि दुकानें खुलने का समय ही ऐसा निर्धारित है कि जब तक कोई खरीदार बाजार पहुंचेगा और किसी दुकान पर एक दो कपड़े देखेगा तो दूसरी तरफ ही दुकान बंद करने का समय हो जाएगा। अमूमन कपड़े की खरीदारी में ग्राहक एक ही नजर में खरीदारी नहीं कर लेते हैं, बल्कि कई कपड़े निकलवाने के बाद उसमें पसंद और नापसंद का सवाल खड़ा होता है। जरूरी यह भी नहीं कि एक ही दुकान पर चढ़ते ही कपड़ा पसंद कर लिया जाए।
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खानपान की अच्छी चीजों से रह गए महरूम
रमजान माह में रोजेदार के लिए बाजार में कई प्रकार की अच्छी चीजें मिलती हैं, लेकिन इस बार उससे भी रोजेदार महरूम रह गए हैं। इस माह में फेनी की जबरदस्त बिक्री होती है। रोजेदार सहरी के समय इसे बड़े ही चाव से खाते हैं, जो इस बार बाजार में देखने को ही नहीं मिली है। दूसरे रोजा इफ्तार में खजूर का विशेष महत्व है। इसमें रोजेदार ईरान की खजूर को अधिक पसंद करते हैं, जो इस कोरोना के चलते बाजार में उपलब्ध नहीं हो पाई है। इसी तरह से ईद के लिए सिवंई में भी अलग क्वालिटी है, वह भी बाजार में उपलब्ध नहीं है। रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली सिवंई (150 ग्राम का पैकेट) ही बाजार में उपलब्ध है।
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यह सच है कि ईद की खुशियां बटोरने की तैयारी रमजान माह के पहले से ही शुरू हो जाती है। पिछले वर्ष भी ऐसा ही हुआ, लेकिन बीच में हालात सामान्य हुए, इससे लोगों को लगा था कि इस बार सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन अब हालात बहुत खराब हैं। लेकिन यह किसी के अधिकार में नहीं है। मुसलमानों में ईद और हिंदुओं में दीपावली ऐसे त्योहार हैं, जिसमें फुटपाथ के दुकानदार से लेकर बड़े शोरूम तक के दुकानदार अच्छा व्यवसाय कर लेते हैं। लेकिन कोरोना ने इन पर्व की खुशियों पर पानी फेर दिया है।
-अयान अहमद, समाजसेवी, बाड़ी ब्राह्मणा
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ईद की खुशियां रमजान माह से पहले ही शुरू हो जाती हैं। ईद को लेकर मुस्लिम समाज के लोग रमजान माह के शुरू होने से पहले ही घरों को रंग-रोगन के साथ मरम्मत कार्य शुरू कर देते हैं। ईद पर परिवार के हर सदस्य के लिए नए कपड़े, घर के लिए नए बर्तन, सजावटी सामान समेत अनेक वस्तुओं की खरीदारी की जाती है। कई घरों में सोफा, बेड आदि सामान बदला जाता है, लेकिन इस कोरोना और लॉकडाउन के शोर ने सभी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। न तो किसी को कुछ खरीदने का मौका मिल पाया है और न ही दुकानदारों का सामान बिका है। ईद की नमाज अदा करने के लिए मुसलमान नए कपड़े को तरजीह देते हैं, लेकिन लॉकडाउन के दौरान दुकानें खुलने के लिए सुबह छह से 10 बजे तक का समय निर्धारित किया गया है। ऐसे में कोई दुकानदार अपनी दुकान भी ठीक प्रकार से लगा नहीं पाता और दुकान को बंद करने का समय हो जाता है।
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ठप हो गया टेलरिंग का काम
ईद को लेकर मुसलमान नमाज अदा करने के लिए परिवार के हर सदस्य के लिए नए कपड़े खरीदते हैं। इसमें कम से कम दो जोड़ी कपड़ों की व्यवस्था करते हैं। एक सामान्य तरीके से पहनने के लिए और दूसरा ईद की नमाज अदा करने के लिए कुर्ता पायजामा की व्यवस्था करते हैं। कुर्ता पायजामा दर्जी से सिलवाए जाते हैं, लेकिन सुबह छह से 10 बजे तक दुकान खुलने के समय को लेकर टेलर की दुकानें तो खुल ही नहीं पाती हैं।
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कपड़ों की दुकानों पर सन्नाटा
कपड़े की दुकानों पर भी कोरोना की मार पड़ी है। ईद को लेकर नया कपड़ा खरीदने के लिए लोग अगर बाजार पहुंचें भी तो कैसे, क्योंकि दुकानें खुलने का समय ही ऐसा निर्धारित है कि जब तक कोई खरीदार बाजार पहुंचेगा और किसी दुकान पर एक दो कपड़े देखेगा तो दूसरी तरफ ही दुकान बंद करने का समय हो जाएगा। अमूमन कपड़े की खरीदारी में ग्राहक एक ही नजर में खरीदारी नहीं कर लेते हैं, बल्कि कई कपड़े निकलवाने के बाद उसमें पसंद और नापसंद का सवाल खड़ा होता है। जरूरी यह भी नहीं कि एक ही दुकान पर चढ़ते ही कपड़ा पसंद कर लिया जाए।
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खानपान की अच्छी चीजों से रह गए महरूम
रमजान माह में रोजेदार के लिए बाजार में कई प्रकार की अच्छी चीजें मिलती हैं, लेकिन इस बार उससे भी रोजेदार महरूम रह गए हैं। इस माह में फेनी की जबरदस्त बिक्री होती है। रोजेदार सहरी के समय इसे बड़े ही चाव से खाते हैं, जो इस बार बाजार में देखने को ही नहीं मिली है। दूसरे रोजा इफ्तार में खजूर का विशेष महत्व है। इसमें रोजेदार ईरान की खजूर को अधिक पसंद करते हैं, जो इस कोरोना के चलते बाजार में उपलब्ध नहीं हो पाई है। इसी तरह से ईद के लिए सिवंई में भी अलग क्वालिटी है, वह भी बाजार में उपलब्ध नहीं है। रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली सिवंई (150 ग्राम का पैकेट) ही बाजार में उपलब्ध है।
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यह सच है कि ईद की खुशियां बटोरने की तैयारी रमजान माह के पहले से ही शुरू हो जाती है। पिछले वर्ष भी ऐसा ही हुआ, लेकिन बीच में हालात सामान्य हुए, इससे लोगों को लगा था कि इस बार सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन अब हालात बहुत खराब हैं। लेकिन यह किसी के अधिकार में नहीं है। मुसलमानों में ईद और हिंदुओं में दीपावली ऐसे त्योहार हैं, जिसमें फुटपाथ के दुकानदार से लेकर बड़े शोरूम तक के दुकानदार अच्छा व्यवसाय कर लेते हैं। लेकिन कोरोना ने इन पर्व की खुशियों पर पानी फेर दिया है।
-अयान अहमद, समाजसेवी, बाड़ी ब्राह्मणा