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पाक मीडियाः चर्चा में कश्मीर, दलीलें जुदा

Sun, 07 Dec 2014 12:45 PM IST
Updated Sun, 07 Dec 2014 12:45 PM IST
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pakistani press review on indian terror attack
पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में कश्मीर मुद्दा छाया हुआ है, बेशक इस पर उसका नज़रिया भारतीय रुख से अलग है। दैनिक दुनिया ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहील शरीफ के इस बयान को अपने संपादकीय का विषय बनाया है जिसमें उन्होंने फलस्तीनी विवाद के साथ-साथ कश्मीर समस्या को विश्व शांति के लिए खतरा बताया है।
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अखबार लिखता है कि पाकिस्तान हमेशा से संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक कश्मीरियों की मर्जी से इस समस्या को हल करने के हक में रहा है लेकिन विश्व समुदाय अपने स्वार्थों की खातिर भारत पर इस बात के लिए दबाव ही नहीं डालता।
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इसी तरह फलस्तीनी विवाद का ज़िक्र करते हुए अखबार लिखता है कि जब तक इन दोनों विवादों को वास्तविकता के धरातल पर आकर हल नहीं किया जाता, तब तक विश्व शांति को सुनिश्चित करना नामुमकिन है।
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भारत का दुष्प्रचार

pakistani press review on indian terror attack

उम्मत अखबार के मुताबिक संयोग की बात है कि भारत और इसराइल, इन दोनों देशों की सबसे ज्यादा हिमायत अमरीका कर रहा है जबकि अन्य पश्चिमी देश भी इस्लाम से दुश्मनी के कारण इन दोनों देशों के साथ हैं।

वहीं नवा-ए-वक्त लिखता है कि भारत कश्मीर में पाकिस्तानी हस्तक्षेप के बारे में दुष्प्रचार करके विश्व समुदाय को गुमराह करता है। अखबार की राय है कि शांति के लिए तिजारत नहीं बल्कि कश्मीर मुद्दे का हल जरूरी है।

कम हुआ भ्रष्टाचार

pakistani press review on indian terror attack

एक्सप्रेस ने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की सालाना रिपोर्ट पर संपादकीय लिखा है जिसके मुताबिक़ पाकिस्तान में भ्रष्टाचार कम हुआ है। अखबार लिखता है कि भ्रष्टाचार पाकिस्तान की तरक्की में सबसे बड़ी रुकावट है क्योंकि इससे एक आदमी तो अमीर हो सकता है लेकिन इसकी कीमत देश को चुकानी पड़ती हैं।

वहीं रोजनामा खबरें ने लिखा है कि थैलीसीमिया से पीड़ित 15 बच्चों में एड्स का पता चलना वाकई चिंताजनक है। बच्चों को संक्रमित खून चढ़ाने पर अख़बार लिखता है कि ये हमारी नैतिक गिरावट का सबूत है क्योंकि पाकिस्तान तो वह देश है जो अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस पर नेत्रहीनों पर डंडे बरसाने से भी नहीं हिचकिचाता।

इसके अलावा पाकिस्तान में नए चुनाव आयुक्त के रूप में रिटायर्ड जस्टिस सरकार मोहम्मद रज़ा खान की नियुक्ति और महीनों से सरकार विरोधी आंदोलन चलाने वाली पाकिस्तान तहरीके इंसाफ को सरकार की तरफ से बातचीत की पेशकश पाकिस्तानी मीडिया की सुर्ख‌ियों में रही।

पाक के अखबारों में बाबरी मस्जिद भी

pakistani press review on indian terror attack

बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव पहले ही करीब आ चुके हैं। रुख भारत का करें तो हमारा समाज ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने को 22 साल पूरे होने पर संपादकीय लिखा है- असंवेदनशीलता के 22 साल।

अखबार लिखता है कि आज तक न तो उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया जिन्होंने बाबरी मस्जिद को तबाह कर डाला और न ही उन मास्टरमाइंडों को जिन्होंने उग्र माहौल तैयार किया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पैरों तले रौंदने वाले अराजक तत्वों की पीठ थपथपाई।

वहीं पूर्व जनता दल परिवार की पार्टियों के साथ आने पर राष्ट्रीय सहारा लिखता है कि पहले भी जिस तरह तीसरा मोर्चा बार-बार बना और बिखरा है, उसे देखते हुए ताज़ा कोशिश पर कुछ न कहना ही मुनासिब है।

लेकिन अखबार की राय है कि इस समय देश के सामने जिस तरह की मुश्किल चुनौतियां हैं, उन्हें देखते हुए सेक्युलर वोटों का बंटवारा रोकना बहुत जरूरी है।

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