पाक मीडियाः चर्चा में कश्मीर, दलीलें जुदा
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अखबार लिखता है कि पाकिस्तान हमेशा से संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक कश्मीरियों की मर्जी से इस समस्या को हल करने के हक में रहा है लेकिन विश्व समुदाय अपने स्वार्थों की खातिर भारत पर इस बात के लिए दबाव ही नहीं डालता।
इसी तरह फलस्तीनी विवाद का ज़िक्र करते हुए अखबार लिखता है कि जब तक इन दोनों विवादों को वास्तविकता के धरातल पर आकर हल नहीं किया जाता, तब तक विश्व शांति को सुनिश्चित करना नामुमकिन है।
भारत का दुष्प्रचार
उम्मत अखबार के मुताबिक संयोग की बात है कि भारत और इसराइल, इन दोनों देशों की सबसे ज्यादा हिमायत अमरीका कर रहा है जबकि अन्य पश्चिमी देश भी इस्लाम से दुश्मनी के कारण इन दोनों देशों के साथ हैं।
वहीं नवा-ए-वक्त लिखता है कि भारत कश्मीर में पाकिस्तानी हस्तक्षेप के बारे में दुष्प्रचार करके विश्व समुदाय को गुमराह करता है। अखबार की राय है कि शांति के लिए तिजारत नहीं बल्कि कश्मीर मुद्दे का हल जरूरी है।
कम हुआ भ्रष्टाचार
एक्सप्रेस ने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की सालाना रिपोर्ट पर संपादकीय लिखा है जिसके मुताबिक़ पाकिस्तान में भ्रष्टाचार कम हुआ है। अखबार लिखता है कि भ्रष्टाचार पाकिस्तान की तरक्की में सबसे बड़ी रुकावट है क्योंकि इससे एक आदमी तो अमीर हो सकता है लेकिन इसकी कीमत देश को चुकानी पड़ती हैं।
वहीं रोजनामा खबरें ने लिखा है कि थैलीसीमिया से पीड़ित 15 बच्चों में एड्स का पता चलना वाकई चिंताजनक है। बच्चों को संक्रमित खून चढ़ाने पर अख़बार लिखता है कि ये हमारी नैतिक गिरावट का सबूत है क्योंकि पाकिस्तान तो वह देश है जो अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस पर नेत्रहीनों पर डंडे बरसाने से भी नहीं हिचकिचाता।
इसके अलावा पाकिस्तान में नए चुनाव आयुक्त के रूप में रिटायर्ड जस्टिस सरकार मोहम्मद रज़ा खान की नियुक्ति और महीनों से सरकार विरोधी आंदोलन चलाने वाली पाकिस्तान तहरीके इंसाफ को सरकार की तरफ से बातचीत की पेशकश पाकिस्तानी मीडिया की सुर्खियों में रही।
पाक के अखबारों में बाबरी मस्जिद भी
बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव पहले ही करीब आ चुके हैं। रुख भारत का करें तो हमारा समाज ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने को 22 साल पूरे होने पर संपादकीय लिखा है- असंवेदनशीलता के 22 साल।
अखबार लिखता है कि आज तक न तो उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया जिन्होंने बाबरी मस्जिद को तबाह कर डाला और न ही उन मास्टरमाइंडों को जिन्होंने उग्र माहौल तैयार किया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पैरों तले रौंदने वाले अराजक तत्वों की पीठ थपथपाई।
वहीं पूर्व जनता दल परिवार की पार्टियों के साथ आने पर राष्ट्रीय सहारा लिखता है कि पहले भी जिस तरह तीसरा मोर्चा बार-बार बना और बिखरा है, उसे देखते हुए ताज़ा कोशिश पर कुछ न कहना ही मुनासिब है।
लेकिन अखबार की राय है कि इस समय देश के सामने जिस तरह की मुश्किल चुनौतियां हैं, उन्हें देखते हुए सेक्युलर वोटों का बंटवारा रोकना बहुत जरूरी है।