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स्थानीय आतंकियों के शव परिवार को नहीं सौंप रही पुलिस, जनाजों में भीड़ बनती है सिरदर्द

Tue, 05 May 2020 12:11 AM IST
Vikas Kumar अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला, जम्मू
अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला, जम्मू Published by: Vikas Kumar Updated Tue, 05 May 2020 12:11 AM IST
सार

-पुलिस और प्रशासन ने एसओपी में किए बदलाव ताकि जनाजों में उमड़ने वाली भीड़ से युवा प्रभावित न हो 
-जनाजों में उमड़ने वाली भीड़ सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ा सिरदर्द है

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Now jammu kashmir police not hand over the dead bodies of local terrorists to family
आतंकी के जनाजे में शामिल लोग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

घाटी में आतंकियों के शव लौटाने की रणनीति में पुलिस और प्रशासन ने बदलाव किया है। गृह मंत्रालय के निर्देश पर इसके लिए अलग एसओपी बनाए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक अब स्थानीय आतंकियों के शव भी परिवार वालों को नहीं सौंपे जा रहे। इनकी शिनाख्त भी बहुत कम की जी रही है। पहले ये नियम विदेशी आतंकियों के शवों को लेकर थे। हालांकि पुलिस इसे कोविड-19 महामारी से बचाव की रणनीति बता रही है ताकि जनाजों में भीड़ इकट्ठी न हो और संक्रमण का खतरा न बढ़े, लेकिन सूत्रों के अनुसार नए एसओपी गृह मंत्रालय द्वारा भेजे गए सुझावों के तहत बनाए गए हैं। इन एसओपी को सार्वजनिक भी नहीं किया गया है। इनमें ‘आतंकियों का महिमामंडन नहीं करना, सार्वजनिक जनाजों पर रोक और सोशल मीडिया पर कड़ी नजर रखना है’ शामिल हैं।    

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कश्मीर में आतंकवाद में शामिल होने के पीछे दो कारण रहे हैं। एक सोशल मीडिया पर आतंकी और अलगाववादी समर्थकों द्वारा चलाई जाने वाली युवाओं को प्रभावित करने वाली मुहिम और दूसरा मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों के जनाजे, लेकिन अब धीरे-धीरे पुलिस इन दोनों पर काफी हद तक नकेल कसती दिखाई दे रही है।  
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आतंकी संगठन की पब्लिसिटी रोकने को पहचान छिपाई जा रही
सूत्रों के अनुसार नई एसओपी के तहत सुरक्षा एजेंसियों ने तय किया है कि अब आतंकियों को वह पब्लिसिटी नहीं मिलेगी जो वे चाहते हैं। इसलिए सुरक्षा एजेंसियों ने मुठभेड़ के बाद आतंकियों के नाम और उनके संगठन से संबंधित जानकारी देना कम कर दिया है। इसका उदाहरण हाल ही में दक्षिणी कश्मीर के शोपियां में हुई मुठभेड़ के बाद पुलिस द्वारा जारी प्रेस रिलीज के तौर पर देखने को मिला। 
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सुरक्षाबलों ने इस मुठभेड़ में अंसार गजवा तुल हिन्द (एजीएच) के कमांडर बुरहान कोका समेत कुल तीन आतंकियों को मार गिराया था, लेकिन पुलिस द्वारा जारी बयान में केवल लिखा था कि मुठभेड़ में तीन आतंकी मारे गए हैं जिनकी शिनाख्त की जा रही है। 

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इसके पीछे कारण यह है कि हम युवाओं को इससे प्रभावित होने से बचाना चाहते हैं ताकि वह गलत रास्ते पर न निकलें। उन्होंने कहा कि किसी साधारण से आतंकी के लिए क्यों सेना या पुलिस का अधिकारी प्रैस कान्फ्रेंस करे, जिससे आतंकी और उसके संगठन को पब्लिसिटी मिले। 
 

डार के जनाजे में उमड़ी भीड़ के बाद लिया फैसला

गत आठ अप्रैल को जैश कमांडर सज्जाद डार के सोपोर में जनाजे में करीब 500 से अधिक लोग लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन कर जनाजे में शामिल हुए थे। इसमें पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर 40 से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया था। इसके बाद सार्वजनिक जनाजों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया गया।

इसके बाद से पुलिस की निगरानी में कुछ परिवार वालों की राय के साथ स्थानीय आतंकियों को भी शीरी बारामुला और गांदरबल जिले के सोनमार्ग में दफनाया गया जहां पहले केवल विदेशी आतंकियों को दफनाया जाता रहा है। सूत्रों के मुताबिक पिछले करीब 18 मुठभेड़ों के दौरान केवल 14 बार ही परिवार वालों को जनाजों में शामिल होने का मौका मिल पाया है।
  
हर जनाजे के बाद 4-5 युवा आतंक की राह थाम लेते हैं
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि 2015 में कुलगाम में मारे गए लश्कर कमांडर अबू कासिम के जनाजे में उमड़ी हजारों की भीड़ को देखते हुए यह फैसला लिया गया था कि किसी भी विदेशी आतंकी के शव को स्थानीय लोगों को नहीं सौंपा जाएगा। कासिम पर 20 लाख का इनाम था।

उसके बाद कई स्थानीय आतंकियों के जनाजों में भी भीड़ उमड़ना शुरू हुई थी। इसके बाद पुलिस ने आतंकियों के शव देर शाम सौंपने शुरू किए थे ताकि रात में ही जनाजा अंजाम दिया जाए और किसी तरह की कानून व्यवस्था की स्थिति न पैदा हो, लेकिन उसके बाद भी स्थानीय आतंकियों के जनाजों में भीड़ उमड़ती रही। यही नहीं बंदूकें लहराते हुए सलामी भी जाती रही। इससे प्रभावित होकर युवा आतंक की राह अपनाते थे। 
 

औसतन चार से पांच युवा हर जनाजे के बाद आतंक की राह में शामिल होते आए हैं

औसतन चार से पांच युवा तो हर जनाजे के बाद आतंक की राह में शामिल होते आए हैं। इनमें अधिकतर दक्षिणी कश्मीर के थे जोकि सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना रहा। अब इन प्रतिबंधों के चलते स्थानीय आतंकियों की भर्ती के ग्राफ में और कमी आने की उम्मीद है। इतना ही नहीं घाटी में साइबर सेल भी अब पूरी तरह से सतर्क हो चुका है। सोशल मीडिया पर हर जगह नजर रखी जा रही है। साइबर सेल के एक अधिकारी के अनुसार पहले हिज्ब कमांडर बुरहान वानी ने युवाओं को प्रभावित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया। इसके बाद अन्य आतंकी भी ऐसा कर रहे हैं।

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