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जम्मू कश्मीर: न्यायिक संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर नोटिस जारी
Sat, 03 Sep 2022 01:28 PM IST
kumar गुलशन कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू/नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू/नई दिल्ली
Published by: kumar गुलशन कुमार
Updated Sat, 03 Sep 2022 01:28 PM IST
सार
जम्मू और कश्मीर पीपुल्स फोरम ने जनहित याचिका दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि न्यायिक संस्थानों में कई प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों के लिए उच्च न्यायालय ने कई योग्य युवाओं पर विचार नहीं किया गया।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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विस्तार
जम्मू-कश्मीर में न्यायिक संस्थानों और अदालतों में नियुक्तियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को राजी हो गया है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने नोटिस जारी कर जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय से उसके प्रशासनिक पक्ष पर जवाब तलब किया। साथ ही कहा कि इसका निरीक्षण उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किया जाए। पीठ ने कहा कि याचिका पर जवाब छह हफ्तों में दाखिल किए जाएं।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि जम्मू-कश्मीर में न्यायिक संस्थानों में नियुक्तियों में पूर्व न्यायाधीशों और कर्मचारियों के रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाया गया है। गैर सरकारी संगठन जम्मू और कश्मीर पीपुल्स फोरम ने जनहित याचिका दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि न्यायिक संस्थानों में कई प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों के लिए उच्च न्यायालय ने कई योग्य युवाओं पर विचार नहीं किया गया।
याचिका में दावा किया गया है कि नियमित भर्ती प्रक्रिया को अपनाने के बजाय अनुबंध और दैनिक वेतन पर रखे गए कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया। उसमें दावा किया गया है कि उच्च न्यायालय ने आरक्षण के नियमों की अनदेखी की और कई पद तो स्वीकृत तक नहीं थे।
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याचिका में आरोप लगाया गया है कि जम्मू-कश्मीर में न्यायिक संस्थानों में नियुक्तियों में पूर्व न्यायाधीशों और कर्मचारियों के रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाया गया है। गैर सरकारी संगठन जम्मू और कश्मीर पीपुल्स फोरम ने जनहित याचिका दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि न्यायिक संस्थानों में कई प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों के लिए उच्च न्यायालय ने कई योग्य युवाओं पर विचार नहीं किया गया।
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याचिका में दावा किया गया है कि नियमित भर्ती प्रक्रिया को अपनाने के बजाय अनुबंध और दैनिक वेतन पर रखे गए कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया। उसमें दावा किया गया है कि उच्च न्यायालय ने आरक्षण के नियमों की अनदेखी की और कई पद तो स्वीकृत तक नहीं थे।
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