कश्मीर के पहाड़ी गांवों में चुनावी मौसम
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पहाड़ी इलाकों में लोगों ने भले ही मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया हो, लेकिन इन इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। पहाड़ों में बसे इन गाँवों में बिजली, टीवी, मोबाइल जैसी आधुनिक चीज़ें तो पहुँची हैं, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सफाई की स्थिति नहीं बदली है।
गाँवों की अनदेखी
देश की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है, जिस पर कोई ध्यान नहीं देता, जबकि वो सबसे ज्यादा शोषित, उपेक्षित और दयनीय हालात में रहे हैं। लेकिन इसका अपवाद है चुनावों का मौसम।
इन गाँवों में कोई नेता या अफसर यूं ही नहीं आ जाता। स्थानीय निकाय, राज्य या राष्ट्रीय चुनावों के समय इन गांव के लोगों का महत्व काफी बढ़ जाता है। इस दौरान नेता हेलिकॉप्टरों में बैठकर पूरे शानो-शौकत के साथ पहुँचते हैं और जनता को मुफ्त खाना और वादे देते हैं।
कहानी हिमालय की गोद में बसे एक छोटा गाँव की
समुद्र तल से 7,500 फीट ऊपर स्थित इस गांव में मेरे पिता खेती-बाड़ी करते रहे हैं। यहीं हमारे नाते-रिश्तेदार और जानवर रहते हैं। साल 2015 बस आने ही वाला है, लेकिन आज भी गाड़ी चलने लायक तारकोल की सड़क गाँव से आठ किलोमीटर नीचे है, जिस तक पहुँचने के लिए घोड़े या पैदल तीन घंटे का सफर करना पड़ता है।
मैं गाँव में एक स्कूल शुरू करने के लिए अपने परिवारवालों की मदद करने आई थी। यह स्कूल मेरे चाचा की आर्थिक मदद से खुल रहा था। बचपन में हर साल गर्मियों में दुबई से ब्रेसवाना आने पर हम मूलभूत सुविधाओं की कमी से बेहाल हो जाते थे। मैं बिजली, टीवी या आधुनिक सुविधाओं की बात नहीं कर रही। यहाँ पर स्वास्थ्य, शिक्षा और सफ़ाई की कमी खलती थी।
मोबाईल पहुंचा लेकिन शिक्षा नदारद
मेरी मूल चिंता हमेशा ही शिक्षा रही है, क्योंकि मैने अच्छी और बुरी शिक्षा का फर्क देखा है। मुझे बढ़िया स्कूली शिक्षा मिली और मेरे कई दोस्त, पड़ोसी और परिवारवाले इससे महरूम रहे।
यहाँ की कई पीढ़ियों के बच्चों ने हर गाँव में मौजूद गैर-ज़िम्मेदार सरकारी स्कूलों में मोटी पगार पाने वाले ऐसे मास्टरों से पढ़ाई हासिल की जिनसे शायद ही वो कुछ सीख पाए हों।
चुनाव आते ही बदल जाते हैं हालात
यहाँ चुनाव एक त्योहार जैसा है। हमसे पूछा जाता है कि गाँव वालों के लिए मुद्दा क्या है, यहाँ महिलाओं की आवाज कौन है। ऐसे सवालों पर केवल हँसा जा सकता है और कहा जा सकता है कि यहाँ असली फैसला इस बात से होगा कि कौन सबसे ज्यादा पैसे देगा।
यह तय है कि चुनाव के समय पैसों की बाढ़ आ जाएगी। दुकानदार खुश हो जाते हैं, उनकी बिक्री काफी बढ़ जाती है, घरों में नए टीवी और मोबाइल दिखने लगते हैं। यहाँ यही 'असली मुद्दा' है।
कोई ऐसी विचारधारा नहीं जिसका पूरे राज्य पर कोई प्रभाव हो, कश्मीर समस्या के रूमानी हल का कोई सपना नहीं, चुनावों में भागीदारी वैचारिक है या राज्य और सशस्त्र संघर्ष के इतिहास पर आधारित- इसकी कोई चिंता नहीं है। ये सब कुछ भी नहीं।
यहाँ चुनाव का मतलब है केवल पैसा और शायद इस बात की छद्म खुशी कि मेरा प्रत्याशी जीत गया। क्योंकि चुनाव के बाद इन सबको गुमनामी में खो जाना है। उनकी असल समस्याओं के बारे में न कोई सुनता है, न ही किसी को उनकी परवाह है।
पहाड़ी लोगों की आँखों पर पट्टी
अगर आप शहर से आए हों और आपकी आँखों पर पट्टी बंधी हो या आप इतने मासूम हों कि आपको दुनियावी हकीकतों का अहसास ही न हो तो आप 'चारों तरफ हो रहे बदलाव' को लेकर हमेशा उत्तेजित रह सकते हैं।
लेकिन मेरे लिए पिछले पाँच साल बेहद निराशा और कड़वाहट भरे रहे हैं। मैं और मेरा परिवार 'व्यवस्था' के अंदर की किसी भी चीज, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सरकारी अधिकारियों के कामकाज का तरीका बदलने में सक्षम नहीं है। इसलिए हमने उस काम पर ध्यान दिया जो हमारे वश में था।
और यह था हमारा स्कूल, वो बच्चे जो यहाँ पढ़ते हैं, उनके परिवार और उनकी मुश्किलें। हमने उनके जीवन, उनके व्यक्तित्व, उनके सपनों और क्षमताओं में आश्चर्यजनक बदलाव होते देखा।
सही कदम का परिणाम
ये सब इसलिए हो सका क्योंकि हमने उनको शिक्षित करने के लिए स्कूल खोला और हमने ऐसा किया भी। हमने उन्हें अच्छी शिक्षा दी, उन्होंने इसे खुले दिल से स्वीकार किया, उनके परिवारवालों ने हर तरह से हमारी मदद की और अब ये ये बच्चे बाहरी दुनिया में कदम रख चुके हैं। यह एक छोटी सी बात है, कि जो सही है उसे किया जाए तो उसका परिणाम तत्काल मिलता है।
(32 वर्षीय सब्बाह हाजी, हाजी पब्लिक स्कूल की निदेशक हैं। कश्मीर के सामाजिक-राजनीतिक मामलों में गहरी रुचि रखती हैं।)