अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस: डोगरी भाषा जिनके लिए रोजगार का साधन बनी, वही कर रहे इसकी अनदेखी
डोगरी में हर तरह का साहित्य लिखा जा रहा है। डोगरी नाटक लिखे जा रहे हैं, लेकिन मंचन नहीं हो रहा है, जिन सरकारी संस्थाओं के पास डोगरी भाषा के विकास की जिम्मेवारी है वह अपना दायित्व पूरा करने में विफल हो रहे हैं।
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12 वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद 2003 में डोगरी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल तो हुई, लेकिन 19 साल के सफर के बाद आज भी अपने अस्तित्व का जंग लड़ रही है। डोगरी भाषा लोगों के लिए रोजगार का साधन तो बनी, लेकिन रोजगार लेने वाले लोग ही इसकी अनदेखी कर रहे हैं। आज डोगरी के संरक्षण के लिए सरकार की पहल से ज्यादा इस भाषा को बोलने वाले लोगों के प्रयासों की जरूरत है। यह बात साहित्यकार पद्मश्री मोहन सिंह ने कही।
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य पर अमर उजाला से विशेष बातचीत करते हुए मोहन सिंह ने कहा कि संविधान की अनुसूची में शामिल होने के बाद डोगरी भाषा का विकास तो हुआ। डोगरी में हर तरह का साहित्य लिखा जा रहा है। डोगरी नाटक लिखे जा रहे हैं, लेकिन मंचन नहीं हो रहा है, जिन सरकारी संस्थाओं के पास डोगरी भाषा के विकास की जिम्मेवारी है वह अपना दायित्व पूरा करने में विफल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के तहत सरकार ने प्राइमरी तक स्थानीय भाषा में पढ़ाने का फैसला लिया है। सरकार के इस फैसले से डोगरी भाषा को बढ़ावा मिलेगा। छोटे बच्चों के बीच डोगरी भाषा पहुंचेगी।
मोहन सिंह ने कहा कि अगर सरकार मातृभाषा को बढ़ावा देने का काम कर रही है तो लोगों को इसमें आगे आना चाहिए। मातृभाषा के संरक्षण की जिम्मेवारी उसे बोलने वाले लोगों को उठानी होगी। सरकार ने डोगरी को राज्यकीय भाषा का दर्जा तो दिया है, लेकिन इसका लाभ नहीं मिला है। इसमें भाषा बोलने वाले लोग सबसे बड़े जिम्मेदार हैं। लोग विभागों में जो पत्र देते हैं, वह डोगरी भाषा में नहीं लिखे होते हैं। मातृभाषा के प्रति हमें खुद में सम्मान का भाव पैदा करना होगा तभी हम मातृभाषा का संरक्षण कर सकेंगे।