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सीएमपी के जरिए इतिहास रचना चाहते हैं मोदी-मुफ्ती

Mon, 16 Feb 2015 11:02 PM IST
Updated Mon, 16 Feb 2015 11:02 PM IST
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modi-mufti Want to create history by common minimum programme

राज्यसभा के बाद विधान परिषद चुनाव के लिए भी भाजपा और पीडीपी में समझौता हो चुका है, लेकिन, न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) के लिए लिखित ड्राफ्ट पर अब भी कई पेंच फंसे हैं। पीडीपी गठबंधन के एलान से पहले सीएमपी को सार्वजनिक रूप से जारी करना चाहती है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पीडीपी संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सीएमपी ड्राफ्ट के जरिए इतिहास रचना चाहते हैं। पूर्व में जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला तथा बाद में राजीव गांधी और फारूक अब्दुल्ला के बीच हुए समझौते की तर्ज पर सीएमपी तैयार की जा रही है।
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लेकिन, भाजपा के लिए मूलभूत सिद्धांतों से समझौता उतना आसान भी नहीं है। खुद पीडीपी भी मानती है कि भाजपा के लिए यह पहाड़ से नीचे उतरने जैसा है। संघ परिवार को इस पर गहरी आपत्ति है। यही कारण है कि डेढ़ महीने की अनौपचारिक बातचीत के बीद भी सीएमपी अब तक फाइनल नहीं हो पाई है।
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इन मुद्दों पर फंसा पेंच

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पीडीपी सूत्रों के मुताबिक मुफ्ती मोहम्मद ने साफ कर दिया है कि उनके लिए सरकार बनाना प्राथमिकता नहीं है। वह मुद्दों पर आधारित समझौता चाहते हैं ताकि कश्मीर में अमन कायम हो सके। इसके लिए पाकिस्तान और हुर्रियत से बातचीत जरूरी है।

अफस्पा की वापसी पर पीडीपी का जोर है ताकि कश्मीरी अवाम के मन में सरकार के प्रति विश्वास पैदा किया जा सके। पीडीपी के मुख्य प्रवक्ता नईम अख्तर कहते हैं कि सीएमपी फाइनल हो जाए तो सरकार दो दिन में बन सकती है।

अनौपचारिक बातचीत लगातार लंबी होती जा रही है ताकि पहले गठबंधन का एजेंडा तय हो जाए और तब सरकार बनाई जाए। भाजपा अब तक अनुच्छेद 370 को हटाने की पक्षधर रही है। अफस्पा पर भी भाजपा की राय पीडीपी से भिन्न है।

इस तरह पीओके से खुला व्यापार और बेरोकटोक आवाजाही का मुद्दा भी है। जाहिर है भाजपा को भी अपने और अन्य सहयोगी संगठनों में मंथन करना पड़ रहा है। इसलिए देर हो रही है।

नेहरू-शेख और राजीव-फारूक की तर्ज पर होगा समझौता

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पीडीपी प्रवक्ता ने कहा कि उनकी पार्टी के लिए भी भाजपा से गठबंधन का फैसला लेना आसान नहीं था। कश्मीर में कुछ लोग इसके लिए पीडीपी की आलोचना भी कर रहे हैं। लेकिन, एक बार जब सीएमपी सार्वजनिक होगा और उस पर काम शुरू हो जाएगा तो विरोध के स्वर खामोश हो जाएंगे।

कश्मीर पर नेहरू और शेख अब्दुल्ला या राजीव गांधी-फारूक अब्दुल्ला के समझौते का कोई नतीजा नहीं निकला। एकाध प्रोजेक्ट स्थापित हो गए। समस्या  यथावत रही। पीडीपी की ओर से उसी नीति को आगे बढ़ाने की बात की जा रही है जिसे अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू किया था।

मुफ्ती के शासनकाल में वाजपेयी जब कश्मीर आए तो हुर्रियत ने भी विरोध में हड़ताल नहीं रखी थी। बाद में मनमोहन सिंह जितनी बार आए कश्मीर बंद रहा। अब तक मोदी के दौरे में भी विरोध हड़ताल होती रही है। लिहाजा अमन और विश्वास के माहौल के लिए सबको स्वीकार्य सीएमपी पर मंथन चल रहा है।

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