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लोकसभा चुनाव:  विस्थापन का दंश झेल रहे कश्मीरी पंडितों के लिए खुले नौकरी के द्वार, पर अभी नहीं हो सकी वापसी

Thu, 14 Mar 2024 01:39 PM IST
kumar गुलशन कुमार डॉ. बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
डॉ. बृजेश कुमार सिंह, जम्मू Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Thu, 14 Mar 2024 01:39 PM IST
सार

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा कारणों से 1990 में 44167 कश्मीरी पंडित परिवारों ने घाटी छोड़ी थी, जिसमें से 39782 हिंदू परिवार थे। पुनर्वास के तहत पीएम पैकेज के जरिये नौकरी के लिए पिछले कुछ सालों में लगभग छह हजार पंडित कश्मीर लौटे।

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Lok Sabha Elections: Doors of jobs open for Kashmiri Pandits facing displacement but not able to return yet
Kheer Bhawani Temple (File) - फोटो : बासित जरगर

विस्तार

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 व 35ए हटने के बाद पहली बार हो रहे लोकसभा चुनाव पर देश-दुनिया की निगाहें हैं। इससे यह चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण होगा। तीन दशक से अधिक समय से विस्थापन का दंश झेल रहे कश्मीरी पंडितों की घर वापसी सभी पार्टियों के एजेंडे में शामिल होगी। पंडितों को अपने घर कश्मीर लौटने की जहां आस और बढ़ गई हैं वहीं भाजपा के साथ ही कांग्रेस, नेकां, पीडीपी व क्षेत्रीय दल इनकी ससम्मान वापसी को मुद्दा बना सकते हैं। एक बार फिर सभी पार्टियां यह दोहरा सकती हैं कि कश्मीरी पंडितों के बिना घाटी अधूरी है।

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हालांकि, कश्मीरी पंडितों का मानना है कि सरकार उनकी घर वापसी को लेकर गंभीर नहीं है। सबसे अहम सवाल सुरक्षा मुहैया कराना है। अब भी सुरक्षा कारणों से कश्मीरी पंडित घाटी में लौटने से कतरा रहे हैं। हाल के वर्षों में कई कश्मीरी पंडित, सिख व प्रवासी मजदूर आतंकियों का निशाना बन चुके हैं। इस वजह से घाटी लौटने के लिए यह तबका शंकित नजर आ रहा है। 370 हटने के बाद उम्मीद जगी थी कि पंडितों के प्रति कोई नीति बनेगी, लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा। जवाहर टनल के पार धर्मनिरपेक्षता कहीं भी नहीं दिखती। उनके अधिकारों का संरक्षण करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
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सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा कारणों से 1990 में 44167 कश्मीरी पंडित परिवारों ने घाटी छोड़ी थी, जिसमें से 39782 हिंदू परिवार थे। पुनर्वास के तहत पीएम पैकेज के जरिये नौकरी के लिए पिछले कुछ सालों में लगभग छह हजार पंडित कश्मीर लौटे, जो कश्मीर के विभिन्न जिलों में नौकरी कर रहे हैं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद सरकारी पदों पर भर्ती करने में तेजी आई। अब छह हजार पदों में से 50 से भी कम पदों पर भर्ती बाकी है। ये कर्मचारी श्रीनगर, बडगाम, बारामुला, शोपियां, कुलगाम, कुपवाड़ा, पुलवामा, बांदीपोरा, अनंतनाग व गांदरबल में रह रहे हैं। सरकार की ओर से 2008 और 2015 में कश्मीरी विस्थापितों के घाटी लौटने और पुनर्वास की नीति तय की गई। पैतृक घरों में लौटने के लिए प्रोत्साहन की घोषणा की गई।
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सरकार की ओर से 1990 में प्रति परिवार मिलने वाली 500 रुपये की राहत राशि को बढ़ाकर 13 हजार रुपये प्रति महीने यानी 3250 प्रति सदस्य कर दी गई। हालांकि, कश्मीरी विस्थापित इस राहत राशि को कम बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। घाटी में 920 करोड़ की लागत से छह हजार ट्रांजिट आवास का निर्माण चल रहा है। पिछले 20 फरवरी को जम्मू में रैली के दौरान प्रधानमंत्री ने कई आवास का लोकार्पण किया है। श्रीनगर, बडगाम, कुपवाड़ा, अनंतनाग, कुलगाम व पुलवामा में निर्माण प्रस्तावित है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला, विस में दो सीटों पर होगा नामांकन

केंद्र सरकार ने कश्मीरी पंडितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मौका भी दिया है। हाल में विधानसभा में दो कश्मीरी पंडितों को नामित करने का अधिकार दिया गया। दरअसल लंबे समय से पंडित राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की मांग कर रहे थे। उनका कहना था कि 1990 से पहले की स्थिति बहाल करनी है तो तो इन्हें प्रतिनिधित्व देना होगा। 370 हटने के बाद घाटी का माहौल बदला जरूर है, लेकिन विस्थापितों के राजनीतिक रूप से सशक्त होने पर ही यह धरातल पर उतरेगा।

हालात बदले तो पंडितों ने निकाली झांकी

अनुच्छेद 370 हटने के बाद हालात में सुधार को देखते हुए स्थानीय मुस्लिमों की मदद से कश्मीरी पंडितों का हौसला फिर से मजबूत हुआ है। 35 साल बाद इस साल महाशिवरात्रि के मौके पर गांदरबल के नुनार इलाके में कश्मीरी पंडितों ने झांकी निकाली। स्थानीय मुस्लिमों की भी झांकी में भागीदारी रही। हरि कृष्ण मंदिर नुनार में पूजा की गई और कश्मीर में शांति के लिए प्रार्थना की गई। स्थानीय मुसलमान भी खुश नजर आए। उनका कहना था कि 1989 से पहले का दौर एक बार फिर शुरू हो गया है, जब कश्मीर में शांति और भाईचारे की मिसालें देखने को मिलती थीं।

अब भी घाटी में आठ हजार पंडित रह रहे

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति की ओर से किए गए सर्वे के अनुसार प्रधानमंत्री पैकेज कर्मी राहुल भट समेत नब्बे के दशक से लेकर अब तक 804 कश्मीरी पंडितों की आतंकियों ने हत्या कर दी है। समिति का कहना है कि दुर्भाग्य यह है कि जिन 804 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई उनमें से ज्यादा मामलों की प्राथमिकी में अज्ञात आतंकियों का जिक्र है। इनमें से लगभग 90 फीसदी हत्याएं जेकेएलएफ के आतंकियों ने की। समिति का कहना है कि अब भी घाटी में साढ़े आठ हजार कश्मीरी पंडित रहते हैं। आतंकवाद के चरम के दौर में भी श्रीनगर के साथ ही बारामुला, पुलवामा, शोपियां, अनंतनाग, बडगाम, गांदरबल, कुलगाम, गांदरबल, कुपवाड़ा और बांदीपोरा में कई परिवारों ने घाटी नहीं छोड़ी। वे अपनी मातृभूमि से जुड़े रहे और रोजी-रोटी का जुगाड़ करते रहे। लेकिन पिछले दिनों हुई टारगेट किलिंग की घटनाओं ने एक बार फिर भय का वातावरण पैदा किया है।

नीलकंठ गंजू की एसआईए ने शुरू की जांच

चार नवंबर 1989 में श्रीनगर में आतंकियों की गोली का शिकार बने रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या की वर्ष 2023 में एसआईए ने जांच शुरू की। 1968 में जेकेएलएफ के संस्थापक आतंकी मकबूल भट को फांसी की सजा नीलकंठ गंजू ने सुनाई थी। यह सजा पुलिस इंस्पेक्टर अमरचंद की हत्या में मामले में सुनाई गई थी। 1984 में दिल्ली के तिहाड़ जेल में भट की फांसी के बाद जस्टिस गंजू आतंकियों के निशाने पर आ गए थे। गंजू की हत्या में यासीन मलिक का हाथ बताया जाता है। एसआईए ने फोन नंबर व मेल आईडी जारी कर घटना के विषय में जानकारी रखने वालों से आगे आने की अपील की थी।

अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर के हालत में जबरदस्त बदलाव आया है। पंडितों की घर वापसी के लिए सरकार की ओर से नौकरी की व्यवस्था की गई है। रहने के लिए आवास के भी प्रबंध किए गए हैं। सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध भी किए गए हैं। हालात बदलने का ही नतीजा है कि पंडितों ने शिवरात्रि पर झांकी निकाली। मुस्लिम भी अब साथ आ रहे हैं। घाटी कश्मीरी पंडितों के बिना अधूरी है। कश्मीरी पंडितों की ससम्मानजनक वापसी के लिए प्रतिबद्धता है। - डॉ. जितेंद्र सिंह, केंद्रीय मंत्री।

तीन दशक बाद भी धरातल पर कुछ भी बदलाव नहीं आया है। ब्यूरोक्रेट नहीं चाहते हैं कि पंडित घाटी लौटें। प्रधानमंत्री और गृह मंत्रालय से संस्तुति के बाद भी राज्य सरकार ने विस्थापितों के पुनर्वास के लिए अलग से बजट का प्रावधान नहीं किया। 370 हटने के बाद भी स्थितियां जैसी की तैसी हैं। सरकार निवेशकों को जमीन दे रही है, लेकिन विस्थापितों को दो गज जमीन नहीं दे पाई। - सतीश महलदार, चेयरमैन-रिकन्सिलिएशन, रिटर्न एंड रिहैब्लिेशन आफ माइग्रेंट्स।

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