Election 2024: पांच साल में नारों के साथ बदले चुनावी मुद्दे, अब 370 की गरज संग गूंज रही विकास की बात
2019 में लोकसभा चुनाव से दो महीने पहले 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ की कानवाय पर आत्मघाती हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इसमें 40 जवान बलिदान हुए थे। इस घटना के 15 दिन के भीतर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकी कैंपों पर एयर स्ट्राइक किया गया।
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जम्मू-कश्मीर में पांच साल में चुनावी नारे और मुद्दे बदल गए हैं। 2019 के संसदीय चुनाव में पुलवामा हमला और पाकिस्तानी गोलाबारी भाजपा समेत अन्य दलों के लिए नारा और मुद्दा था तो पांच साल बाद बदली परिस्थितियों में हो रहे चुनाव में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने, पत्थरबाजी तथा अलगाववाद का जमाना लदना मुख्य मुद्दा और नारा भी है।
विकास की बयार बहने को भी मुद्दा बनाया जा रहा है। यह केवल जम्मू-कश्मीर में नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी मुद्दा है। बदले माहौल में जम्मू-कश्मीर पर देश-दुनिया की निगाहें हैं। यहां की पांच संसदीय सीटों पर सबकी नजरें हैं।
2019 में लोकसभा चुनाव से दो महीने पहले 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ की कानवाय पर आत्मघाती हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इसमें 40 जवान बलिदान हुए थे। इस घटना के 15 दिन के भीतर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकी कैंपों पर एयर स्ट्राइक किया गया।
यह चुनाव में प्रमुख मुद्दा रहा। भाजपा की ओर से इस मुद्दे पर पूरे देश में चुनाव लड़ा गया। हालांकि, विपक्ष की ओर से इस पर तंज भी कसा गया। सीमा पार से पाकिस्तानी गोलाबारी एलओसी तथा आईबी से सटे इलाकों में लगातार की जाती रही। इससे जान-माल की हानि भी होती रही। सीमापार की गोलाबारी को भी चुनाव में मुद्दा बनाया गया। इस चुनाव में यह दोनों मुद्दे गायब हैं।
युवाओं के हाथ में बंदूक नहीं लैपटॉप का नारा भी हो रहा प्रचलित
पुलवामा हमले के छह महीने के भीतर जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 व 35ए को केंद्र सरकार ने हटा दिया। अब यही मुद्दा इस चुनाव में पूरे देश में उठ रहा है। इसे जम्मू-कश्मीर के विकास में बाधा बताते हुए कहा जा रहा है कि यह अलगाववाद तथा आतंकवाद की जननी थी।
अब न तो अलगाववाद है और न ही पत्थरबाजी। अब यह भी नारा दिया जा रहा है कि युवाओं के हाथ में बंदूक नहीं लैपटॉप है। वह आतंक का दामन भी नहीं थाम रहे हैं। न तो पाकिस्तानी झंडे लहरा रहे हैं और न ही सीमा पार से गोलाबारी हो रही है। आतंकवाद भी कम हुआ है। आतंकी तंजीमों के पास कैडर तक नहीं रह गए हैं। हालांकि, पाकिस्तान की ओर से लगातार इलाके में अशांति की कोशिश की जा रही है।
जी-20, विकास और सिनेमा की वापसी की भी गूंज
मौजूुदा चुनाव 370 हटने के बाद घाटी में आए बदलाव पर केंद्रित हो गया है। मिसाल पेश की जा रही है कि बदली परिस्थितियों में जी20 का सम्मेलन भी कराया गया। विकास का पहिया तेजी से घूम रहा है। युवाओं के लिए रोजगार के द्वार खुले हैं। बॉलीवुड फिर घाटी की ओर आकर्षित होने लगा है। दशकों बाद सिनेमा हाल फिर से दर्शकों से गुलजार हो रहे हैं। शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
सात दशक बाद मिली नागरिकता को भी बनाया जा रहा मुद्दा
सात दशक से अधिक समय बाद पश्चिमी पाकिस्तान रिफ्यूजियों, वाल्मीकि समाज, गोरखा समाज तथा अन्य को नागरिकता दिए जाने को भी मुद्दा बनाया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि उनके साथ भेदभाव को समाप्त किया गया है जो उन्हें 370 की वजह से नहीं मिल पा रहा था। ज्ञात हो कि 370 हटने के बाद पहली बार इन समुदायों को नागरिकता मिली है तथा उन्हें डोमिसाइल मिल पाया है।
कश्मीरी पंडित भी एजेंडे में
कश्मीरी पंडित भी चुनावी एजेंडे में हैं। कश्मीरी पंडितों की भले ही घर वापसी नहीं हो सकी है लेकिन उनके लिए सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयासों को भी चुुनाव में उछाला जा रहा है। पीएम पैकेज के तहत छह हजार नौकरियां व आवास की व्यवस्था करने को उठाया जा रहा है।
पहली बार विस्थापन के दौरान औने-पौने दाम में अपनी संपत्ति बेचने और संपत्तियों पर नाजायज कब्जे को हटाने के लिए सरकार की ओर से किए गए प्रयास तथा पोर्टल स्थापित कर उनकी समस्याओं के समाधान की बात भी रखी जा रही है। स्थायी रूप से पंडितों को बसाने के लिए पीएम पैकेज के तहत कर्मियों को सस्ते दाम पर सरकारी जमीन उपलब्ध कराने की योजना को भी पेश किया जा रहा है। इसके जरिये यह बताने की कोशिश की जा रही है कि घाटी में उनके सम्मानजनक वापसी के प्रयास किए जा रहे हैं।