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अलगाववादियों के गढ़ श्रीनगर में मुकाबला रोचक, फारूक अब्दुल्ला को सीट बचाने की चुनौती

Tue, 16 Apr 2019 12:03 AM IST
Pranjal Dixit बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू Published by: Pranjal Dixit Updated Tue, 16 Apr 2019 12:03 AM IST
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lok sabha election 2019: farooq abdullah has a big competition in election with bjp,pdp
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : फाइल, अमर उजाला
जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में लोकसभा चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। यहां नेकां प्रमुख डॉ. फारूक अब्दुल्ला अपनी कुर्सी बचाने को जी जान से जुटे हैं। इन्हें पीडीपी के आगा सैयद मोहसिन, पीपुल्स कांफ्रेंस के इरफान अंसारी तथा भाजपा के खालिद जहांगीर से कड़ी चुनौती मिल रही है। 
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पीडीपी ने वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव यहां से जीता था। तब पार्टी प्रत्याशी तारिक हमीद कर्रा 42 हजार से अधिक मतों के अंतर से फारूक अब्दुल्ला से चुनाव जीते थे। पीडीपी अपनी इस सीट को दोबारा से पाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही है। कांग्रेस ने नेकां के समर्थन में यहां से प्रत्याशी नहीं उतारा है। भाजपा के सहयोगी रहे सज्जाद गनी लोन के नेतृत्व वाली पीपुल्स कांफ्रेंस यहां पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है। 
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पार्टी समर्थन से श्रीनगर नगर निगम का मेयर बनने से पीपुल्स कांफ्रेंस को अपने मजबूत होने का भरोसा है। इसके साथ ही कद्दावर शिया धर्मगुरु इमरान रजा अंसारी का भी साथ है। इस संसदीय सीट पर शिया मुस्लिमों की संख्या भी अच्छी खासी है। पार्टी प्रत्याशी इमरान के छोटे भाई हैं। 
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सभी प्रत्याशियों की ओर से डल झील में शिकारा रैली भी निकाली जा रही है। यह लोगों को अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए है। प्रचार के दौरान सभी दलों की ओर से आम नागरिकों के साथ ही अलगाववादियों तथा जमात के लोगों को भी साधने की कोशिश की जा रही है ताकि एकमुश्त वोट का लाभ उन्हें मिल सके।  

तीन जिलों श्रीनगर, गांदरबल व बडगाम के 15 विधानसभा क्षेत्र इस लोकसभा सीट के तहत आते हैं। नेकां प्रमुख डा. फारूक अब्दुल्ला वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव पीडीपी के तारिक हमीद कर्रा के हाथों हार गए थे। बाद में पार्टी प्रमुख से तालमेल न बैठने के कारण कर्रा ने संसद सदस्य के रूप में इस्तीफा दे दिया। 2017 में हुए उपचुनाव में दोबारा डा. फारूक अब्दुल्ला सांसद चुने गए। 

अनुच्छेद 35ए व 370 ही मुख्य मुद्दा
इस लोकसभा सीट पर बेरोजगारी, शिक्षा व अन्य नागरिक सुविधाएं कोई मुद्दा नहीं हैं। यहां बस एक ही मुद्दा हावी है वह है भाजपा व मोदी फैक्टर के साथ अनुच्छेद 35ए व 370। अलगाववादियों पर सख्ती तथा जमात पर प्रतिबंध को भी मुद्दा बनाया गया है।सुरक्षाबलों पर  ज्यादती के आरोप लगाकर इसे भी हवा देने की कोशिश की जा रही है। 

अलगाववादियों का है गढ़
श्रीनगर अलगाववादियों का गढ़ है। यहां हुर्रियत (जी) प्रमुख सैय्यद अली शाह गिलानी, हुर्रियत (एम) प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक, जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक का खासा प्रभाव है। महिला अलगाववादी संगठन दुख्तरान- ए-मिल्लत की सदस्य भी काफी सक्रिय हैं। इसके साथ ही प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी का भी अपना प्रभाव है। अलगाववादियों तथा जमात का असर चुनाव परिदृश्य पर दिखाई पड़ सकता है। 

विवादित बयानों की लग रही झड़ी
चुनाव प्रचार के दौरान विवादित बयानों की झड़ी लग रही है। नेकां प्रमुख डा. फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि यह चुनाव साबित करेगा कि देश धर्मनिरपेक्ष रहेगा या नहीं। मोदी व शाह दोनों जनता के सबसे बड़े दुश्मन हैं। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य में फिर से प्रधानमंत्री की व्यवस्था बहाल करने का जुमला उछाला है। इन सबसे अलग पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने तो यहां तक कह दिया कि अनुच्छेद 35ए हटाया गया तो राज्य का देश के साथ विलय समाप्त हो जाएगा। 2020 से राज्य स्वतंत्र हो जाएगा।

वोटिंग प्रतिशत है चुनौती
पिछले तीन लोकसभा चुनावों में यहां वोटिंग प्रतिशत बड़ी चुनौती रही है। अमूमन यहां पिछले तीन चुनावों में तो 25 प्रतिशत वोट ही पड़े। 2017 के तो उप चुनाव में भारी हिंसा के बीच मात्र सात फीसदी ही मतदान हुआ। अलगाववादियों के बहिष्कार की कॉल का भी यहां असर देखने को मिलता है। इस चुनाव में भी अलगाववादियों ने बहिष्कार का आह्वान किया है। साथ ही लोगों को मतदान से दूर रहने को कहा है। 

साल      वोटिंग प्रतिशत
2004       18.57
2009       25.55
2014       25.86
2017        7.10 (उपचुनाव)

1290318- कुल मतदाता 
  665285- पुरुष
  625033- महिला
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