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फारूक अब्दुल्ला के बयान पर कश्मीर हिंदू सांस्कृतिक कल्याण ट्रस्ट ने जताई कड़ी आपत्ति

Wed, 14 Oct 2020 07:57 PM IST
प्राची प्रियम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्राची प्रियम Updated Wed, 14 Oct 2020 07:57 PM IST
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Kashmir Hindu Cultural Welfare Trust Bengaluru strongly condemns the statement by Farooq Abdullah
फारूक अब्दुल्ला - फोटो : बासित जरगर

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला द्वारा अनुच्छेद 370 को लेकर दिए गए बयान को लेकर कश्मीर हिंदू सांस्कृतिक कल्याण ट्रस्ट, बंगलूरू ने कड़ी निंदा की है। ट्रस्ट का कहना है कि एक तरफ जहां भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ रहा है, वहीं ऐसे समय में इस तरह का बयान देने का साफ मतलब यही है कि देश की शांति को भंग करने का सोचा समझा प्रयास किया जा रहा है।

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ट्रस्ट का कहना है कि पहले ही हम कश्मीरी पंडित ऐसे अलगाववादी नेताओं के षड़यंत्र का शिकार हो चुके हैं। 1989 में हमें हमारी ही जमीन से बेदखल कर दिया गया था। हमें मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ा था।
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इसके बाद उमर अब्दुल्ला के शासन में भी हमपर बहुत अत्याचार हुए, लेकिन फारूक अब्दुल्ला को इसपर भी कोई पछतावा नहीं है। संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का इन लोगों ने दुरुपयोग किया है।
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फारूक अब्दुल्ला द्वारा दिया गया यह बयान पूरी तरह से अस्वीकार्य है और यह देशद्रोह के अलावा और कुछ नहीं। बता दें कि  जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम और नेशनल कांफ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला ने रविवार को कहा था कि पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव अनुच्छेद 370 हटाने का नतीजा है।
चीन शुरू से इसका विरोध करता रहा है और सीमा पर उसका आक्रामक रुख मोदी सरकार के इस गलत कदम के कारण है। 

अब्दुल्ला ने एक कार्यक्रम में कहा था कि  मैंने कभी चीनी राष्ट्रपति को निमंत्रण नहीं दिया, ऐसा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। उन्होंने सिर्फ न्योता ही नहीं भेजा, बल्कि यहां झूले पर भी बैठाया। उन्हें चेन्नई ले गए और उनके साथ खाना खाया। लेकिन जो 5 अगस्त 2019 को जो सरकार ने किया, वह किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। हम नहीं करते, चीन भी नहीं कर रहा।


अब्दुल्ला ने कहा था कि घाटी के लोगों की हालत के बारे में हमें संसद में बोलने तक नहीं दिया जाता। यहां के लोगों को क्या सुख है? देश जहां 4जी इस्तेमाल कर रहा, 5जी आने वाला है फिर भी वहां के लोग 2जी के इस्तेमाल को मजबूर हैं। यह कैसा बराबरी का दर्जा है? ऐसे कैसे युवा आगे बढ़ेंगे?

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