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JK Elections : पाकिस्तानी शरणार्थी, गोरखा और वाल्मीकि समाज ने पहली बार डाले वोट, कहा- 75 वर्ष का कलंक मिटा
Wed, 02 Oct 2024 07:03 AM IST
दुष्यंत शर्मा
डॉ. बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
डॉ. बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 02 Oct 2024 07:03 AM IST
सार
उनका कहना है कि वोट डालने का अधिकार मिलने से आजादी के बाद से माथे पर लगा कलंक का टीका लगभग 75 वर्ष बाद मिटा है। अब वह भी सरकार का हिस्सा होंगे। मंत्री-विधायक और पार्षद बन सकेंगे।
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जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जम्मू-कश्मीर में पहली बार विधानसभा चुनाव में वोट डालने के बाद मंगलवार को पश्चिम पाकिस्तानी रिफ्यूजी, गोरखा और वाल्मीकि समाज के लोग गदगद दिखे। उनका कहना है कि वोट डालने का अधिकार मिलने से आजादी के बाद से माथे पर लगा कलंक का टीका लगभग 75 वर्ष बाद मिटा है। अब वह भी सरकार का हिस्सा होंगे। मंत्री-विधायक और पार्षद बन सकेंगे। स्थानीय जनप्रतिनिधि उनकी आवाज सुन सकेंगे। अब तक वोट बैंक न होने की वजह से राजनीतिक दलों की ओर से उनके साथ किया जाता रहा दोयम दर्जे का बर्ताव बंद हो जाएगा।
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अनुच्छेद 370 और 35ए की वजह से इन तीनों समुदाय के लोगों को नागरिकता नहीं मिली थी। यह लोकसभा चुनाव में मतदान तो कर सकते थे, लेकिन विधानसभा, पंचायत और निकाय चुनाव में नहीं। राज्य सरकार की नौकरी में भी अधिकार नहीं था। लेकिन पांच अगस्त 2019 के बाद 370 व 35ए की जंजीरें टूटने पर इन्हें आजादी मिली और नागरिकता के साथ अन्य सुविधाएं भी मिलने लगीं। जमीन का मालिकाना हक भी मिल गया। 370 हटने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव हुए तो इन समुदाय के लोगों ने खुलकर अपना मत डाला। पश्चिम पाकिस्तान रिफ्यूजी सबसे ज्यादा कठुआ, सांबा, जम्मू में रहते हैं। चूंकि कश्मीरी पंडितों की तरह इनकी अलग मतदाता सूची नहीं है। इस वजह से वास्तविक मतदाताओं की जानकारी नहीं है। एक अनुमान के अनुसार इनकी संख्या करीब डेढ़ लाख है। जम्मू के गांधीनगर व डोगरा हाल इलाके में 12 हजार वोटर हैं। ये तीन जिलों के 13 विधानसभा हलकों में फैले हुए हैं। ये कठुआ जिले के कठुआ व हीरानगर, सांबा जिले के सांबा, रामगढ़ व विजयपुर, जम्मू जिले के बिश्नाह, सुचेतगढ़, आरएस पुरा-जम्मू दक्षिण, बाहु, मढ़, जम्मू उत्तर, अखनूर व छंब विधानसभा हलके में वोटर के रूप में हैं। पश्चिम पाकिस्तान रिफ्यूजियों ने पहली बार मताधिकार का जश्न आरएस पुरा के वार्ड नंबर 13 में मनाया। ढोल-नगाड़े के साथ जमकर नाचे और मिठाइयां बांटकर खुशी का इजहार किया।
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पश्चिम पाकिस्तान रिफ्यूजी एक्शन कमेटी के अध्यक्ष लब्बा राम गांधी ने बताया कि पहली बार मतदान का लोगों में जबर्दस्त जश्न रहा। जम्मू, सांबा व कठुआ में रहने वाले समुदाय के लोगों ने वोट का इस्तेमाल किया। कई पीढ़ियां तो गुलामी का दंश झेलकर परेशान रहीं। उन्हें तो किसी प्रकार का लाभ नहीं मिला। अब जाकर नई पीढ़ी को यह लाभ मिल पाया है। खासकर नौजवानों में वोटिंग को लेकर जबर्दस्त उत्साह रहा। हमारे माथे पर एक बदनुमा धब्बा लगा था, जो अनुच्छेद 370 हटने के बाद मिट तो गया था, लेकिन पहली बार विधानसभा चुनाव में वोट डालकर यह और मुकम्मल हो गया। छंब के पश्चिम पाकिस्तान रिफ्यूजी राजीव कुमार, हीरानगर के अशोक कुमार और आरएस पुरा के मनमोहन ने बताया कि मतदान करने के बाद पहली बार लगा कि वे भी जम्मू-कश्मीर के बाशिंदे हैं। वह भी यहां के अन्य नागरिकों की तरह ही हैं, जिन्हें वोट डालने का अधिकार है।
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हमें तो सात दशक से था इंतजार
गोरखा समाज की अध्यक्ष करुणा छेत्री ने बताया कि गोरखा नगर तथा आसपास के इलाकों में मतदान को लेकर जश्न का माहौल रहा। लंबे समय से लोग वोटिंग का इंतजार कर रहे थे। मतदान करने के बाद समाज के लोगों ने अपनी तस्वीरों को यादों के रूप में सहेजा। उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को तो दस साल से विधानसभा चुनाव का इंतजार था, लेकिन हमें तो सात दशक से अधिक समय से अपने अधिकार न पाने का मलाल था। अब वोटिंग से यह मलाल दूर हो गया है। मतदान के लिए उत्साहित लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। हमारी आवाज केंद्र की भाजपा सरकार ने सुनी और 2019 में इन मुसीबतों से हमें छुटकारा दिलाया।
मतदान के अधिकार से लंबे समय तक वंचित रखा गया
वाल्मीकि समाज के लोगों को 1957 में पंजाब के गुरदासपुर से तत्कालीन सरकार की ओर से सफाई कार्य के लिए लाया गया था। समाज के लोगों का कहना है कि उन्हें यहां लाया तो गया लेकिन वे तबसे बदतर जिंदगी ही बिता रहे थे। उन्हें राज्य सरकार की सुविधाएं नहीं मिल पाती थीं। राज्य की नागरिकता नहीं थी। लोकसभा में वोट डाल सकते थे, लेकिन प्रदेश के किसी भी चुनाव में उनकी हिस्सेदारी नहीं थी। गांधीनगर मतदान केंद्र पर वोट डालने पहुंचे समुदाय के घारू भाटी ने बताया कि हमें लंबे वक्त तक मतदान के अधिकार से वंचित रखा गया। पहली बार वोट डालकर खुशी हुई है। ऐसा लगा कि अब इस समाज के लोग भी मंत्री, विधायक, पार्षद बन सकते हैं। यह सब केंद्र सरकार की ओर से 370 की बेड़ियां तोड़ने से ही संभव हो पाया है।