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Jammu: दुश्वारियां झेलीं... उत्पीड़न सहे, पर परंपराएं न छोड़ीं; कश्मीरी पंडित एक दिन पहले मनाते हैं शिवरात्रि

Thu, 26 Sep 2024 02:50 PM IST
शाहरुख खान राहुल दुबे, अमर उजाला, जम्मू
राहुल दुबे, अमर उजाला, जम्मू Published by: शाहरुख खान Updated Thu, 26 Sep 2024 02:50 PM IST
सार

कश्मीरी पंडित एक दिन पहले शिवरात्रि मनाते हैं। बटुक नाथ भैरव को मांसाहार अर्पित करते हैं। कश्मीरी पंडितों ने तमाम दुश्वारियां झेलीं, लेकिन परंपराएं नहीं छोड़ीं। 

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Jammu News Kashmiri Pandits Sanatan Tradition Offer Meat to Batuk Nath Bhairav
कश्मीरी पंडित एक दिन पहले मनाते हैं शिवरात्रि - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कश्मीर से विस्थापित होने के बाद कश्मीरी पंडितों ने तमाम दुश्वारियां झेलीं, उत्पीड़न सहे, टेंट में सड़कों पर रहना पड़ा लेकिन परंपराओं को नहीं छोड़ा। सड़कों पर त्योहार मनाने पड़े तो पत्थर उठाकर प्रतीकात्मक मंदिर बनाकर पूजा की। 
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कश्मीरी पंडितों की पूजा पद्धति में मांसाहार और प्रसाद में मांस अर्पण समेत तमाम सवालों पर लोकवार्ता कश्मीर के अध्यक्ष, रिसर्चर व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अग्निशेखर कहते हैं कि यह सब कुछ सनातन परंपरा का हिस्सा है। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है और नीलमद पुराण, तंत्रालोक में इसका जिक्र है।
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डॉ. अग्निशेखर कहते हैं कि कश्मीरी पंडितों की संस्कृति, उनके व्रत, त्योहार और परंपरा को समझना है तो यहां की शैव, वैष्णव, शाक्त परंपरा को समझना होगा। नीलमद पुराण को पढ़ना होगा और इसके साथ ही आचार्य अभिनव गुप्त का तंत्रालोक पढ़ना होगा। 
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कारण, कश्मीर तंत्र का गढ़ रहा है। शाक्त परंपरा और उसके साथ तंत्र जुड़ा है, तंत्र साधना में यह सब चीज आती हैं। कहते हैं कि वैष्णव परंपरा भी हम मानते हैं और उस हिसाब से भी पूजन करते हैं। उसमें शुद्ध शाकाहारी व्यंजन बनते हैं। 

नवरात्र में मां उमा की पूजा करते हैं। नीलमद पुराण सिर्फ पूजा ही नहीं बताता, इसमें कश्मीर की नदियों की कथाएं, देवी-देवता, महात्म, परंपराओं का भी वर्णन है। वह कहते हैं कश्मीरी पंडित शिवरात्रि एक दिन पहले ही मना लेते हैं। उसे हर रात्रि कहते हैं। कश्मीरी में हेरथ भी कहते हैं। बटुक नाथ भैरव शिव का ही एक रूप हैं। मांसाचार शिवलिंग पर अर्पित नहीं होता है।

डॉ. अग्निशेखर कहते हैं कि यह सब सनातन का हिस्सा उसी तरह है जिस तरह मैथिली ब्राह्मणों में, पश्चिम बंगाल और नेपाल के भी कई क्षेत्रों में यह सब पूजा-पाठ का हिस्सा है। काल भैरव को पूरे देश में मदिरा अर्पण की जाती है। कश्मीर में जब बर्फ गिरती थी तो उन्हें बर्फ चढ़ाई जाती थी।

 

वासुतोष पति की पूजा का भी महत्व
डॉ. अग्निशेखर बताते हैं कि कश्मीरी पंडित सर्दियों में घर देवता दिवस मनाते हैं। इसमें वासुतोष पति देवता की पूजा करते हैं। हम मानते हैं कि हर घर का एक देवता होता है। सनातन परंपरा में कहीं भी शादी हो, जब दूल्हा पहली बार लड़की के घर पहुंचता है तो चौखट पूजा कराई जाती है, वही घर का देवता है। 

 

हम घर देवता दिवस में भात-मछली से उनका पूजन करते हैं। एक थाली में चावल रखते हैं और उसी में पकी हुई मछली। उसी थाली में बिना पकी हुई मछली साफ करके रखते हैं। उस पर सिंदूर लगाकर पूजन कर उसे छत पर रखकर आते हैं। धर्म ही हमारी पहचान है और कश्मीरी पंडितों ने धर्म और परंपरा को बचाए रखने के लिए सीमित संसाधनों में ही बहुत संघर्ष किया है।
 
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