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जम्मू-कश्मीर: 40 साल बाद दुकान खाली करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने रखा बरकरार
Wed, 08 Dec 2021 01:56 PM IST
करिश्मा चिब
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
Published by: करिश्मा चिब
Updated Wed, 08 Dec 2021 01:56 PM IST
सार
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी एसएलपी। हाईकोर्ट ने की थी टिप्पणी, चार दशकों तक न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग कर संपत्ति को कब्जे में रखना दर्दनाक।
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jammu highcourt
- फोटो : फाइल
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विस्तार
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के दो किरायेदारों को 40 साल बाद दुकान खाली करने के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा है। श्रीनगर के जवाहर नगर इलाके के किरायेदारों द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका को न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति अभय एस ओका की शीर्ष अदालत की पीठ ने पक्षकारों के वकील को सुनने के बाद खारिज कर दिया।
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पिछले महीने उच्च न्यायालय ने एक अपील को खारिज करते हुए कहा कि यह दर्दनाक था कि लगभग चार दशकों तक किरायेदारों ने न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग करके संपत्ति पर अपना कब्जा जारी रखा था। किरायेदार 28 जुलाई 2014 और 8 जून 2019 को उप न्यायाधीश (स्मॉल कॉज) श्रीनगर ट्रायल कोर्ट और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश श्रीनगर की अदालतों द्वारा पारित निर्णयों और आदेशों को रद्द करने की मांग कर रहे थे।
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कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक जो लगभग चार दशक पहले अदालत में आया था वह ठीक वहीं है जहां वह उस समय था। लंबी मुकदमेबाजी के कारण अपनी निजी संपत्ति का उपयोग करने और कब्जा करने की उनकी आवश्यकता पर अभी भी बहस चल रही है। उच्च न्यायालय ने कहा था कि लंबे अंतराल के दौरान उनकी जरूरतों पर धूल जम गई होगी। हालांकि, इस तरह की धूल के नीचे पूरी तरह से दबने से बचाने के लिए धूल को हटाने की जरूरत है।
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दोनों पक्ष 1983 से सूट संपत्ति पर मुकदमेबाजी कर रहे थे जब मकान मालिक ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष बेदखली के लिए एक मुकदमा दायर किया। कई मुकदमों के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि किरायेदारों के कब्जे में लगभग आधे दशक तक संपत्ति रही है। इस वजह से अब वह किसी रियायत के हकदार नहीं हैं। इसलिए दो सप्ताह के भीतर दुकान खाली कर कब्जा सौंपा जाए।
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पीएमजीएसवाई में सड़क निर्माण के खिलाफ ग्रामीणों की याचिका खारिज
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के कंगन के ग्रामीणों द्वारा प्रधानमंत्री ग्राम निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश पंकज मित्थल और न्यायमूर्ति अकरम चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि 2010 में सड़क निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना हुई। 11 साल बाद टेंडर जारी हुए तो उसके खिलाफ मुकदमा दायर किया जाना कोर्ट को गुमराह करने के समान है। ज्ञात हो कि ग्रामीणों ने भूमि अधिग्रहण के आदेश को रद्द करने की मांग की थी।