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Jammu News: श्रीबूढ़ा अमरनाथ जहां पहली बार भगवान शंकर ने देवी पार्वती को सुनाई थी अमर कथा
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पुंछ। नियंत्रण रेखा पर स्थित जिला पुंछ की मंडी तहसील के मुख्यालय स्थित भगवान शिव का पावन धाम श्रीबूढ़ा अमरनाथ मंदिर वह स्थान है जहां भगवान शंकर ने देवी पार्वती को पहली बार अमर कथा सुनाई थी। मान्यता है कि कथा सुनते हुए देवी पार्वती के गहरी निद्रा में चले जाने के कारण वह कथा नहीं सुन पाई थी। इसके बाद भगवान शंकर ने देवी पार्वती को कश्मीर स्थित अमरनाथ गुफा में अमर कथा सुनाकर अमरता प्रदान की थी।
कहा जाता है कि जो कबूतर यहां श्रीबूढ़ा अमरनाथ में अमरता के पात्र बने थे वह आज भी अमर नाथ गुफा में श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं। कभी-कभी बूढ़ा अमरनाथ में भी श्रद्धालुओं को दिखते हैं। कहा जाता है कि श्री बूढ़ा अमरनाथ की यात्रा के बिना अमरनाथ यात्रा कभी सम्पूर्ण नहीं होती है।
श्रीबूढ़ा अमरनाथ के बारे में प्रचलित एक अन्य कथा के अनुसार देवी पार्वती को अमर कथा सुनाने के कई युगों के उपरान्त लंका नरेश रावण के दादा महाऋषि पुलस्त्य अपनी योग साधना के लिए विभिन्न वनों का भ्रमण करते हुए इस स्थल पर पहुंचे थे। उन्हें इस क्षेत्र में अद्भुत अध्यात्म की अनूभति हुई। इसके चलते उन्होंने वहां कलकल बहती निर्मल धारा के पास निर्जन वन में छोटी सी गुफा में आसन लगा कर भगवान भोलेनाथ की अराधना की। भगवान भोले नाथ महाऋषि पुलस्त्य के तप से प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए। भोलेनाथ ने महाऋषि पुलस्त्य से वरदान मांगने को कहा जिस पर महाऋषि पुलस्त्य ने भगवान से इसी स्थान पर विराजमान होने का आग्रह किया। कहते हैं कि भोले नाथ तथास्तू कह कर अदृष्य हो गए और जहां भगवान शंकर ने महाऋषि पुलस्त्य को दर्शन दिए थे वहां पर सफेद पत्थर चट्टान स्वरूप शिवलिंग प्रकट हो गया। इसकी वर्षों तक महाऋषि पुलस्त्य ने पूजा अर्चना की। इस क्षेत्र में महाऋषि पुलस्त्य के वर्षों तक घोर तक करने के कारण इस पूरे क्षेत्र का नाम पुलस्त्य नगरी और मंदिर के पास बहने वाली नदी का नाम पुलस्त्य नदी पड़ गया। इसका जिक्र आज भी पुंछ जिले के इतिहास में लिखित है।
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कहा जाता है कि जो कबूतर यहां श्रीबूढ़ा अमरनाथ में अमरता के पात्र बने थे वह आज भी अमर नाथ गुफा में श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं। कभी-कभी बूढ़ा अमरनाथ में भी श्रद्धालुओं को दिखते हैं। कहा जाता है कि श्री बूढ़ा अमरनाथ की यात्रा के बिना अमरनाथ यात्रा कभी सम्पूर्ण नहीं होती है।
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श्रीबूढ़ा अमरनाथ के बारे में प्रचलित एक अन्य कथा के अनुसार देवी पार्वती को अमर कथा सुनाने के कई युगों के उपरान्त लंका नरेश रावण के दादा महाऋषि पुलस्त्य अपनी योग साधना के लिए विभिन्न वनों का भ्रमण करते हुए इस स्थल पर पहुंचे थे। उन्हें इस क्षेत्र में अद्भुत अध्यात्म की अनूभति हुई। इसके चलते उन्होंने वहां कलकल बहती निर्मल धारा के पास निर्जन वन में छोटी सी गुफा में आसन लगा कर भगवान भोलेनाथ की अराधना की। भगवान भोले नाथ महाऋषि पुलस्त्य के तप से प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए। भोलेनाथ ने महाऋषि पुलस्त्य से वरदान मांगने को कहा जिस पर महाऋषि पुलस्त्य ने भगवान से इसी स्थान पर विराजमान होने का आग्रह किया। कहते हैं कि भोले नाथ तथास्तू कह कर अदृष्य हो गए और जहां भगवान शंकर ने महाऋषि पुलस्त्य को दर्शन दिए थे वहां पर सफेद पत्थर चट्टान स्वरूप शिवलिंग प्रकट हो गया। इसकी वर्षों तक महाऋषि पुलस्त्य ने पूजा अर्चना की। इस क्षेत्र में महाऋषि पुलस्त्य के वर्षों तक घोर तक करने के कारण इस पूरे क्षेत्र का नाम पुलस्त्य नगरी और मंदिर के पास बहने वाली नदी का नाम पुलस्त्य नदी पड़ गया। इसका जिक्र आज भी पुंछ जिले के इतिहास में लिखित है।
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