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Jammu Kashmir: 370 के विवाद में फंसा जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र, सियासत और दबाव में दबी जन आकांक्षाएं

Sat, 09 Nov 2024 04:32 PM IST
निकिता गुप्ता रोली खन्ना, अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
रोली खन्ना, अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: निकिता गुप्ता Updated Sat, 09 Nov 2024 04:32 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर विधानसभा के पहले सत्र में अनुच्छेद 370 पर हंगामा हुआ। विपक्षी दलों ने वॉकआउट किया, जिससे उपराज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा एकपक्षीय होकर रह गई।

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Jammu Kashmir: Jammu and Kashmir Assembly session stuck in 370 dispute, public aspirations suppressed under po
जम्मू कश्मीर विधानसभा - फोटो : बासित जरगर

विस्तार

हुकूमत के लिए शोर-शराबा हमेशा फायदेमंद होता है, क्योंकि वह इस कारण जवाबदेही से बच जाती है। विधान सभा सत्र में पांच दिन तक चले संग्राम में हुआ भी ऐसा ही है। किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई और हंगामे के बीच जन आकांक्षाओं की आवाज नहीं निकल पाई।

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एक तरफ राजनीतिक दल सियासत-सियासत खेलते रहे और दूसरी तरफ उमर सरकार को दबाव में आकर प्रस्ताव पेश करना पड़ गया। नतीजा पहले दिन से लेकर अंतिम दिन तक सदन में मर्यादाएं टूटीं, विपक्षी दल के वाॅक आउट के कारण उपराज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा एक पक्षीय होकर रह गई। वहीं 370 इतना अधिक उछला की जम्मू-कश्मीर के सदन से निकलकर ये महाराष्ट्र चुनाव तक पहुंच गया। जहां पर खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को कहना पड़ा कि इसकी वापसी संभव नहीं।
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विधान सभा सत्र शुरू होने के साथ ही जिस तरह से पीडीपी विधायकों, सज्जाद लोन और राशिद इंजीनियर के भाई ने 370 को लेकर दबाव बनाना शुरू किया, उससे ये तय हो गया था कि सत्र की सार्थकता अब खत्म हो जाएगी। हुआ भी वही। विधान सभा के पूर्व स्पीकर निर्मल सिंह कहते हैं कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सत्र को ऐसे एजेंडे पर बर्बाद किया, जो उनके अधिकार क्षेत्र में था ही नहीं। संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जिस मुद्दे पर विराम लगा दिया था, उस पर इतना हंगामा क्यों किया गया। ये वही लोग हैं, जिन्होंने बीडीसी चुनाव तक नहीं होने दिए। वही लोकतंत्र का गला घोंटे जाने की दुहाई देते फिरते रहे।
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जिस तरह से सदन से विधायकों को बाहर फेंका गया, वो लोकतंत्र की हत्या है। यह सब सामंतवादी सोच का नतीजा है। इतना ही नहीं इन लोगों ने पाकिस्तान के हाथ में एक मौका दिया है। कांग्रेस की खामोशी को समझने की भी जरूरत है, वो भी इस संग्राम में बराबर की हिस्सेदार है। उमर कहते हैं कि वे बहस करना चाहते थे, बीजेपी बाहर चली गई, क्यों हमारे विधायक रुकते सदन में। यह सब अलगाववादी एजेंडे के तहत काम हो रहा है।ये तो होना ही था, कुछ भी अप्रत्याशित नहीं

दस साल बाद चुनाव और केंद्र शासित प्रदेश का पहला विधान सभा सत्र, वो भी छह साल बाद। जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ वादाखिलाफी का आरोप लगाने वाली पीडीपी ने भी सत्र से जनता के मुद्दों को दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। सदन का समय बर्बाद करने के लिए वो भी कम दोषी नहीं। जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग की प्रमुख रहीं प्रोफेसर रेखा चौधरी कहती हैं कि ये जो कुछ हुआ है वो अप्रत्याशित नहीं है। ये तो होना ही था। दरअसल जम्मू-कश्मीर विधान सभा में एक बहुत बड़े वर्ग की सहभागिता भी नहीं है।

हिन्दु बहुल प्रतिनिधियों की भागीदारी नहीं होने से एकतरफा स्थिति है। पीडीपी-बीजेपी की सरकार जब थी, तब भी पहले दिन ही संग्राम शुरू हो गया था। इस सत्र से कुछ हासिल नहीं हुआ। दरअसल, उमर अब्दुल्ला के पास समस्याएं कम नहीं हैं। रशीद इंजीनियर का भाई हो, पीडीपी के तीन सदस्य हों या फिर सज्जाद लोन ये उमर पर अलग तरीके का दबाव बना रहे हैं। दूसरी तरफ बैठे विपक्ष में भी एक-दो सदस्य नहीं बल्कि 28 सदस्य हैं। उमर अब्दुल्ला ने दबाव में आकर प्रस्ताव तो पेश कर दिया, पर वे हर स्थिति में साथ मिलकर आगे बढ़ना चाह रहे हैं।अभिभाषण से जगी थी उम्मीद अंत में टूटी

उपराज्यपाल के अभिभाषण के बाद थोड़ी सी उम्मीद जगी थी कि शायद सत्र जम्मू-कश्मीर के विकास के रोडमैप को लेकर किसी निष्कर्ष पर जाकर समाप्त होगा। पर यहां भी राजनीतिक दलों का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। विधान सभा के पूर्व स्पीकर कविन्दर गुप्ता कहते हैं कि माहौल खराब करने का मन बनाकर ही नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने सत्र की शुरुआत की थी। होना तो चाहिए था कि पक्ष व विपक्ष को सामने बैठाकर बात होती, पर ऐसा होने ही नहीं दिया गया। पहला सत्र था, इसे सौहाद्रपूर्ण तरीके से चलाना चाहिए था। इसकी कोशिश होती कहीं नहीं दिखी।

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