Jammu Kashmir Elections : जीते-हारे कोई, धरती के स्वर्ग गुलमर्ग को चाहिए सुरक्षा और पर्यटक
स्थानीय लोग टंगमर्ग में रहते हैं और पर्यटकों को सैर कराकर आजीविका कमाते हैं। कहते हैं कि जीते-हारे कोई भी, मगर यहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हो। गुलमर्ग का प्रचार हो और पर्यटक बड़ी तादात में आएं, तो स्थानीय लोगों को रोजगार के लिए बाहर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
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धरती का स्वर्ग...टंगमर्ग से 15 किमी ऊपर नदियों और घने पेड़ों के बीच से गुजरते हुए यहां पहुंचने पर ऐसी ही अनुभूति होती है। महाराजा पैलेस, खिलनमर्ग, गुलमर्ग गंडोला, अलपाथर झील और मोहिनीश्वर शिव मंदिर के बाहर पर्यटकों की काफी भीड़ होती है। हालांकि सुरक्षा कारणों के चलते यहां कभी पर्यटक उतनी तादाद में नहीं पहुंच पाए, जितने देश के अन्य हिल स्टेशनों पर जाते हैं।
स्थानीय लोग टंगमर्ग में रहते हैं और पर्यटकों को सैर कराकर आजीविका कमाते हैं। कहते हैं कि जीते-हारे कोई भी, मगर यहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हो। गुलमर्ग का प्रचार हो और पर्यटक बड़ी तादात में आएं, तो स्थानीय लोगों को रोजगार के लिए बाहर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
पर्यटकों को सैर कराने वाले टंगमर्ग के रशीद कहते हैं, गुलमर्ग जैसी खूबसूरत जगह होने के बावजूद पर्यटक नहीं हैं। इसी कारण युवाओं को रोजगार के लिए भटकना पड़ता है। इंटरनेट पर देखता हूं तो पता चलता है कि मसूरी में कितने लोग पहुंच रहे हैं। अगर उसकी आधी संख्या भी गुलमर्ग में आ जाए, तो इस पूरे क्षेत्र को इतना रोजगार मिलेगा कि दूसरी जगह जाने की सोचेगा भी नहीं।
गुलमर्ग में गाइड का काम कर रहे सैफी बताते हैं कि कोविड के बाद दो-तीन साल से पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। गुलमर्ग बॉर्डर के आखिरी छोर पर है, इसलिए लोग डर की वजह से कम आते हैं। वह कहते हैं कि आर्मी से जुड़े परिवार आते रहते हैं। अब तो सुरक्षा भी खूब रहती है।
वह गर्व से बताते हैं कि पर्यटकों से बात करने के लिए उन्होंने हिंदी सीखी है। चुनावी माहौल पर कहते हैं, हम तो बैठे ही बॉर्डर के आखिरी छोर पर हैं। सियासत की बातें हम क्या जानें, कश्मीर की बातें हम तक नहीं पहुंचतीं। सरकार जो भी बने, गुलमर्ग का इतना प्रचार हो कि यह इलाका पर्यटकों से गुलजार हो जाए।
गुरेज : आतंक में झुलसने के बाद अमन की राह पर, कुछ गांव बिजली से अब हुए रोशन
कश्मीर की सबसे सुंदर और ठंडी घाटी गुरेज में चुनावी ताप का असर बहुत कम है। सबसे बड़ा कारण इसका बेहद ऊंचाई पर होना है। गुरेज का रास्ता देश की सबसे ऊंची चोटियों में शुमार राजदान पास, जो करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर है, से होकर जाता है। ऐसे में शहरी इलाकों के लोग इनसे अधिक घुलमिल नहीं पाते। ये सिर्फ पर्यटकों की राह तकते हैं, क्योंकि यही इनकी आय का प्रमुख साधन भी है।
श्रीनगर से लौटते समय राजदान में सेना कैंप पर एंट्री करा रहे गुलाम शब्बीर बताते हैं कि तीन दशक तक यह घाटी आतंकवाद की आग में झुलसी है। अब पहाड़ी पर जगह-जगह सेना ने कैंप बना लिए हैं। सेना के जवान गश्त करते रहते हैं। आती-जाती सभी गाड़ियों का नंबर और उनमें बैठे लोगों की जानकारी दर्ज की जाती है।
आने-जाने का कारण भी पूछा जाता है। इतनी मशक्कत के बाद अब इस घाटी में अमन-चैन कायम है। सुविधाओं पर बात करते हुए वह बताते हैं कि यहां कुछ रिफ्यूजी गांवों में तो पिछले साल ही बिजली पहुंची है। यहीं मिले फारूक बताते हैं कि चुनाव से उन लोगों को बहुत फर्क नहीं पड़ता। पहले सड़कें नहीं थीं।
कई साल तक तो श्रीनगर ही नहीं देखा था। घाटी में लोग भेड़ पालन करते हैं और किशन गंगा नदी में मछली पकड़ते हैं। उसी से रोजी-रोटी चल रही है। पिछले कुछ सालों से पर्यटक घूमने आने लगे हैं। उनके ठहरने और खाने की व्यवस्था कर पैसा कमा लेते हैं। इसके चलते लोगों ने घर भी ठीक बनवा लिए हैं।