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जम्मू-कश्मीर में परिवारवाद: मुफ्ती का किला ढहा... खानदानी सीट भी न बचा पाईं इल्तिजा, अब्दुल्ला परिवार बरकरार

Wed, 09 Oct 2024 10:55 AM IST
शाहरुख खान जगमोहन शर्मा, अमर उजाला, जम्मू
जगमोहन शर्मा, अमर उजाला, जम्मू Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 09 Oct 2024 10:55 AM IST
सार

जम्मू-कश्मीर में आए नतीजों से परिवारवाद पर प्रहार हुआ, मगर अब्दुल्ला परिवार बरकरार है। मुफ्ती परिवार को लोगों ने स्वीकार नहीं किया। इल्तिजा मुफ्ती खानदानी सीट नहीं बचा पाईं। 

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Jammu Kashmir Election Result 2024 Iltija Mufti Loses And Omar Abdullah Big Wins in Jammu
Jammu Kashmir Election - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कश्मीर घाटी में परिवारवाद का तिलिस्म बरकरार रहा। अब्दुल्ला परिवार के उमर अब्दुल्ला के गांदरबल और बडगाम दोनों सीटों से जीतने से परिवार की राजनीति में पैठ कायम रही। इससे पहले हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में उमर को तगड़ा झटका लगा था। 
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वह बारामुला सीट से इंजीनियर रशीद से हार गए थे। इसी चुनाव में सज्जाद गनी लोन, महबूबा मुफ्ती सरीके नेता भी हार गए थे। इसके बाद से कयास लगाए जा रहे थे कि घाटी में परिवारवाद के दिन अब लद गए हैं। 
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पीडीपी को विधानसभा चुनाव परिणाम ने जरूर झटका दिया है। महबूबा मुफ्ती का खुद को चुनाव और सीएम की दौड़ से किनारे रखने का पैंतरा काम नहीं आया। पार्टी के लिए प्रचार में उतरीं महबूबा परिवार की बिजबिहाड़ा सीट को ही नहीं बचा पाईं। 
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बेटी इल्तिजा के लिए महबूबा ने मजबूत किलेबंदी की, लेकिन मतदाताओं ने इसे आसानी से गिरा दिया। सुबह पहले रुझान से ही इल्तिजा मुफ्ती पीछे नजर आईं। एक बार भी नहीं लगा कि वह मुकाबले में हैं। नेकां के बशीर अहमद वीरी ने उन्हें 9770 वोट से हराया। 

इल्तिजा 23529 वोट ले पाईं, जबकि वीरी को 33299 वोट मिले। अपने तेज तर्रार भाषण और तीखे बयानों के कारण चर्चित रहने वाली इल्तिजा का यह पहला चुनाव था। माना जा रहा था कि चुनाव जीतने के बाद पार्टी की कमान उनके हाथ आएगी, लेकिन इस हार ने पार्टी को नई रणनीति पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। 

 

अल्ताफ बुखारी भी अपने परिवार की सीट से नेकां प्रत्याशी मुश्ताक गुरु से 5688 वोटों से हार गए। वह अपनी पार्टी के प्रमुख हैं। उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं निकाल पाई। सज्जाद गनी लोन अपनी पारिवारिक सीट बचाने में सफल रहे। हंदवाड़ा सीट को उन्होंने कांटे की टक्कर में जीता। मात्र 662 वोट के अंदर से उनको ये सीट मिल पाई।

इल्तिजा जीततीं तो तीसरी पीढ़ी विधानसभा में होती 
इल्तिजा मुफ्ती से पार्टी को बहुत उम्मीद थी। प्रचार में भी जोर-शोर से उतरीं। जोनू-जोनू के नारों के बीच भीड़ भी जुटाई, लेकिन ये भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो पाई। खैर इसकी वजह पार्टी जरूर तलाशेगी, लेकिन किंगमेकर की भूमिका के दावे करने वाली पार्टी का चुनाव में यह हाल होगा, किसी ने सोचा नहीं था। 
 

इल्तिजा जीततीं तो मुफ्ती परिवार की तीसरी पीढ़ी का विधानसभा में प्रवेश होता। इससे पहले मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफ्ती सत्ता का सुख भोग चुके हैं। मुफ्ती मोहम्मद सईद दो बार तो महबूबा एक बार सीएम रह चुकी हैं। मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 1996 में पीडीपी की स्थापना की थी। 

स्थापना के बाद पहली बार पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन रहा है। पीडीपी ने 2002 में 16 सीटें जीतीं, 2008 में 21 और 2014 में 28 सीटें जीतकर सबसे बड़ा क्षेत्रीय दल बनी। भाजपा के साथ सरकार बनाई, लेकिन तीन साल में ही दोनों की राहें अलग हो गईं। सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। अनुच्छेद 370 हटने के बाद भाजपा-पीडीपी के रिश्ते और खराब हो गए।

उमर की अगली पीढ़ी के रास्ते खुले
उमर अब्दुल्ला को दोनों सीटों से मिली जीत ने अगली पीढ़ी के लिए भी रास्ते खोल दिए हैं। जीत से उमर अब्दुल्ला के बेटों के भी हौसले बुलंद हुए हैं। इस चुनाव में उन्होंने जीत के लिए पिता के अपनाए पैंतरे भी देखे हैं। लोकसभा चुनाव से ही पिता के प्रचार अभियानों में दिखने वाले जमीर और जहीर अब्दुल्ला राजनीति के गुर सीख रहे हैं। 

विधानसभा चुनाव में भी दोनों सक्रिय दिखे। हालांकि उमर अब्दुल्ला इस बात से इन्कार करते हैं कि दोनों बेटे राजनीति में आना चाहते हैं। उमर कह चुके हैं कि दोनों बेटों की राजनीति में रुचि नहीं है, लेकिन पढ़ाई से फुर्सत के दौरान वे मदद के लिए आ जाते हैं।

इमोशनल कार्ड....टोपी खोलना कर गया काम
गांदरबल और बडगाम सीट पर निर्दलीयों से घिरा पाकर उमर अब्दुल्ला ने मतदाताओं के आगे इमोशनल कार्ड खोला, जिस पर नतीजों ने मुहर लगा दी। उमर ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान मतदाताओं के आगे अपनी टोपी उतारकर रख दी थी। उन्होंने भावुक अपील करते हुए कहा था कि मेरी यह टोपी ही मेरी इज्जत है। मैं इसके आपके सामने रखता हूं। मेरी इज्जत रख लेना। टोपी उतारने के चर्चे सोशल मीडिया के जरिये मतदाताओं को लुभाने के काम आए।

भाई को जिताने में कामयाब रहे इंजीनियर रशीद
चुनाव प्रचार के लिए तिहाड़ जेल से मैदान में आए इंजीनियर रशीद अपनी पारंपरिक लंगेट सीट को बचा पाने में कामयाब रहे। यहां से चुनाव मैदान में उतरे उनके भाई खुर्शीद अहमद शेख सुबह के रुझान में पीछे चल रहे थे, लेकिन बाद दोपहर तक उन्होंने बढ़त बना ली। हालांकि यह सीट मुश्किल हो गई थी और उन्हें 1602 वोट से जीत मिली। 

 

उनके मुकाबले में नेकां के प्रत्याशी इरफान सुल्तान रहे। रशीद के बाहर आने के बाद उनकी अवामी इत्तेहाद पार्टी को संजीवनी मिली। बारामुला सीट से उमर अब्दुल्ला को हराकर जेल में बैठकर देशभर में चर्चा में आए इंजीनियर रशीद को विपक्षी पार्टियों पीडीपी और नेकां ने भाजपा की बी टीम बताने की कोशिश की, लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाईं।


 
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