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Jammu Election: ...तो उठापटक का दौर रहेगा जारी, आजादी से अब तक तीन बार ही सरकारों ने कार्यकाल पूरा किया
Mon, 07 Oct 2024 11:44 AM IST
शाहरुख खान
राहुल दुबे, अमर उजाला, जम्मू
राहुल दुबे, अमर उजाला, जम्मू
Published by: शाहरुख खान
Updated Mon, 07 Oct 2024 11:44 AM IST
सार
कौन सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होगा और कौन इसके मुहाने तक पहुंचेगा या फिर कौन जरिया होगा यहां तक पहुंचाने का। यह सब कुछ अधिकृत रूप से आठ अक्तूबर को ही पता चलेगा। एग्जिट पोल के अनुमान को ही नतीजे मान लिया जाए तो एक बात तय है कि राज्य में फिर जोड़-तोड़ की सरकार बन सकती है।
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Jammu Election
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राज्य के सभी सूरमाओं का भविष्य ईवीएम से एक दिन बाद बाहर निकल आएगा। नतीजे अगर एग्जिट पोल के अनुरूप रहते हैं तो बड़ा सवाल यह रहेगा कि क्या प्रदेश की सियासत में उठापटक का दौर जारी रहेगा या नहीं। एग्जिट पोल के अनुसार, नतीजे मिले तो राजनीति में नए-नए समीकरण भी बनेंगे।
लोगों को अगले चुनाव में पूर्ण बहुमत के लिए फिर से सोचना पड़ेगा। ये भी सवाल कौंधता रहेगा कि गठबंधन की सरकार आई तो गठबंधन चलेगा या नहीं। धड़ेबंदी रहेगी या नहीं। ऐसे सवालों के घेरे में राजनीतिक अस्थिरता के साथ चुनौतियां भी बनी रहेंगी।
पार्टियों को भी अगले चुनाव के लिए नए सिरे से नई रणनीति पर विचार करना पड़ेगा। अभी तो कौन सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होगा और कौन इसके मुहाने तक पहुंचेगा या फिर कौन जरिया होगा यहां तक पहुंचाने का, ये सब कुछ अधिकृत रूप से आठ अक्तूबर को ही पता चलेगा।
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एग्जिट पोल के अनुमान को ही नतीजे मान लिया जाए तो एक बात तय है कि राज्य में फिर जोड़-तोड़ की सरकार बन सकती है। त्रिशंकु विधानसभा बनी तो प्रदेश एक बार फिर अस्थिर सरकार देखनी पड़ेगी, जिसकी डोर किंगमेकर के हाथों में होगी। इसमें किंगमेकर की भूमिका निभाने वाले दलों से कभी भी सत्ता उलट देने का डर बना रहेगा।
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लोगों को अगले चुनाव में पूर्ण बहुमत के लिए फिर से सोचना पड़ेगा। ये भी सवाल कौंधता रहेगा कि गठबंधन की सरकार आई तो गठबंधन चलेगा या नहीं। धड़ेबंदी रहेगी या नहीं। ऐसे सवालों के घेरे में राजनीतिक अस्थिरता के साथ चुनौतियां भी बनी रहेंगी।
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पार्टियों को भी अगले चुनाव के लिए नए सिरे से नई रणनीति पर विचार करना पड़ेगा। अभी तो कौन सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होगा और कौन इसके मुहाने तक पहुंचेगा या फिर कौन जरिया होगा यहां तक पहुंचाने का, ये सब कुछ अधिकृत रूप से आठ अक्तूबर को ही पता चलेगा।
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एग्जिट पोल के अनुमान को ही नतीजे मान लिया जाए तो एक बात तय है कि राज्य में फिर जोड़-तोड़ की सरकार बन सकती है। त्रिशंकु विधानसभा बनी तो प्रदेश एक बार फिर अस्थिर सरकार देखनी पड़ेगी, जिसकी डोर किंगमेकर के हाथों में होगी। इसमें किंगमेकर की भूमिका निभाने वाले दलों से कभी भी सत्ता उलट देने का डर बना रहेगा।
प्रदेश का राजनीतिक इतिहास देखें तो 2002 से राज्य में कभी पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बन पाई। इस बार भी सरकार त्रिशंकू बनी तो लोगों का मजबूत सरकार का सपना टूट जाएगा। 11 बार पहले ही जनता राज्यपाल और एक बार उप राज्यपाल शासन देख चुकी है।
1983 में फारूक वापस आए लेकिन लगा राज्यपाल शासन
वर्ष 1983 में हुए चुनावों में फारूक अब्दुल्ला ने पूर्ण बहुमत से वापसी की। एक साल बाद फारूक के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह के नेतृत्व में नेकां से एक धड़ा अलग हो गया और कांग्रेस के साथ सरकार बनाई। यह सरकार 1986 तक चली। कांग्रेस के समर्थन वापस ले लेने से 1986 से 7 नवंबर 1986 तक राज्यपाल शासन रहा।
वर्ष 1983 में हुए चुनावों में फारूक अब्दुल्ला ने पूर्ण बहुमत से वापसी की। एक साल बाद फारूक के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह के नेतृत्व में नेकां से एक धड़ा अलग हो गया और कांग्रेस के साथ सरकार बनाई। यह सरकार 1986 तक चली। कांग्रेस के समर्थन वापस ले लेने से 1986 से 7 नवंबर 1986 तक राज्यपाल शासन रहा।
1987 में एनसी-कांग्रेस गठबंधन की सरकार तीन साल ही चली
वर्ष 1987 के चुनाव में नेकां-कांग्रेस गठबंधन ने चुनाव लड़ा। नेकां को 40, कांग्रेस को 26 सीटें मिलीं। सत्ता में फारूक अब्दुल्ला आए। इसी चुनाव में नेकां पर धांधली करने के आरोप लगे। इसके बाद घाटी में चरमपंथ, अलगाववाद पनपा और 1990 में राज्यपाल शासन लगा दिया गया।
वर्ष 1987 के चुनाव में नेकां-कांग्रेस गठबंधन ने चुनाव लड़ा। नेकां को 40, कांग्रेस को 26 सीटें मिलीं। सत्ता में फारूक अब्दुल्ला आए। इसी चुनाव में नेकां पर धांधली करने के आरोप लगे। इसके बाद घाटी में चरमपंथ, अलगाववाद पनपा और 1990 में राज्यपाल शासन लगा दिया गया।
1996 में नेकां को बहुमत फिर भी राज्यपाल शासन
वर्ष 1996 में हुए चुनाव में नेकां 57 सीटों के साथ सत्ता में आई। फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने लेकिन छोटा ही सही राज्य में राज्यपाल शासन लागू हुआ जो 18 अक्तूबर 2002 से दो नवंबर 2002 तक रहा।
वर्ष 1996 में हुए चुनाव में नेकां 57 सीटों के साथ सत्ता में आई। फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने लेकिन छोटा ही सही राज्य में राज्यपाल शासन लागू हुआ जो 18 अक्तूबर 2002 से दो नवंबर 2002 तक रहा।
2002 के बाद से जारी है जोड़-तोड़ की सरकार
वर्ष 2002 के चुनाव में नेकां सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन सत्ता से दूर रही। नेकां को 28 सीटें मिलीं। कांग्रेस को 20 और पीडीपी को 16 सीटें मिलीं। पैंथर्स पार्टी को चार, मार्कसवादी कम्युनिस्ट पार्टी को दो, बसपा को एक और भाजपा को एक सीट मिली। पीडीपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई। मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने। तीन-तीन साल तक सीएम बनाने का समझौता हुआ लेकिन जब गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री बने तो पीडीपी ने समर्थन वापस ले लिया। राज्य में फिर 11 जुलाई 2008 को राज्यपाल शासन लगा दिया गया।
वर्ष 2002 के चुनाव में नेकां सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन सत्ता से दूर रही। नेकां को 28 सीटें मिलीं। कांग्रेस को 20 और पीडीपी को 16 सीटें मिलीं। पैंथर्स पार्टी को चार, मार्कसवादी कम्युनिस्ट पार्टी को दो, बसपा को एक और भाजपा को एक सीट मिली। पीडीपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई। मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने। तीन-तीन साल तक सीएम बनाने का समझौता हुआ लेकिन जब गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री बने तो पीडीपी ने समर्थन वापस ले लिया। राज्य में फिर 11 जुलाई 2008 को राज्यपाल शासन लगा दिया गया।
2008 में नेकां-कांग्रेस फिर साथ आई
वर्ष 2008 के चुनाव में कोई बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सका। नेकां ने 28 सीटें जीतीं। पीडीपी को 21 और कांग्रेस को 17 सीटें मिलीं। भाजपा को 11 सीट मिलीं। कांग्रेस ने नेकां को समर्थन दिया। उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने और लंबे समय बाद किसी दल ने यहां कार्यकाल पूरा किया।
वर्ष 2008 के चुनाव में कोई बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सका। नेकां ने 28 सीटें जीतीं। पीडीपी को 21 और कांग्रेस को 17 सीटें मिलीं। भाजपा को 11 सीट मिलीं। कांग्रेस ने नेकां को समर्थन दिया। उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने और लंबे समय बाद किसी दल ने यहां कार्यकाल पूरा किया।
2014 में पीडीपी-भाजपा सरकार, लेकिन चली नहीं
वर्ष 2014 में पीडीपी-भाजपा ने सरकार बनाई। महबूबा मुफ्ती सीएम बनी, लेकिन 2018 में गठबंधन टूट गया। उसके बाद 20 दिसंबर 2018 से 30 अक्तूबर 2019 तक राज्यपाल शासन रहा। अनुच्छेद 370 की समाप्ति से अब तक उप राज्यपाल शासन लगा है।
वर्ष 2014 में पीडीपी-भाजपा ने सरकार बनाई। महबूबा मुफ्ती सीएम बनी, लेकिन 2018 में गठबंधन टूट गया। उसके बाद 20 दिसंबर 2018 से 30 अक्तूबर 2019 तक राज्यपाल शासन रहा। अनुच्छेद 370 की समाप्ति से अब तक उप राज्यपाल शासन लगा है।
आजादी से अब तक तीन बार ही सरकारों ने कार्यकाल पूरा किया
जम्मू-कश्मीर में आजादी के बाद से अब तक महज तीन बार ही स्थिर सरकार रही है। मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद सादिक के अलावा नेकां के फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के नाम ही कार्यकाल पूरा करने का रिकॉर्ड दर्ज है। पहले सीएम गुलाम मोहम्मद सादिक ने छह वर्ष से ज्यादा समय तक कार्य किया। इसके बाद फारूक अब्दुल्ला और फिर 2008 में उमर अब्दुल्ला ने कार्यकाल पूरा किया।
जम्मू-कश्मीर में आजादी के बाद से अब तक महज तीन बार ही स्थिर सरकार रही है। मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद सादिक के अलावा नेकां के फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के नाम ही कार्यकाल पूरा करने का रिकॉर्ड दर्ज है। पहले सीएम गुलाम मोहम्मद सादिक ने छह वर्ष से ज्यादा समय तक कार्य किया। इसके बाद फारूक अब्दुल्ला और फिर 2008 में उमर अब्दुल्ला ने कार्यकाल पूरा किया।
1967 में सादिक फिर बने मुख्यमंत्री लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर सके
साल 1967 में जीएम सादिक के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार बनाई। 12 दिसंबर, 1971 को जीएम सादिक का निधन हो गया। उनकी जगह सैयद मीर कासिम मुख्यमंत्री बने। 1972 के चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और मीर कासिम ने कमान संभाली लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। सैयद मीर कासिम 25 फरवरी, 1975 तक सीएम रहे। इंदिरा-शेख अब्दुल्ला समझौते के बाद वह सत्ता से हटा दिए गए और 26 मार्च, 1977 से राज्यपाल शासन लग गया।
साल 1967 में जीएम सादिक के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार बनाई। 12 दिसंबर, 1971 को जीएम सादिक का निधन हो गया। उनकी जगह सैयद मीर कासिम मुख्यमंत्री बने। 1972 के चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और मीर कासिम ने कमान संभाली लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। सैयद मीर कासिम 25 फरवरी, 1975 तक सीएम रहे। इंदिरा-शेख अब्दुल्ला समझौते के बाद वह सत्ता से हटा दिए गए और 26 मार्च, 1977 से राज्यपाल शासन लग गया।
राजनीतिक अस्थिरता के चलते बार-बार लगता रहा राज्यपाल शासन
अगर यह कहें कि अस्थिरता इस राज्य का भाग्य, परंपरा बन गई है तो गलत नहीं होगा। वरिष्ठ पत्रकार जफर इकबाल कहते हैं कि आप आंकड़ों को देखें तो जो भी गठबंधन करके सत्ता में आया वही कुछ दिनों में छिटक गया। इसके बाद या तो किसी दूसरे के साथ सरकार बना ली या फिर केंद्र को हस्तक्षेप करना पड़ा और यहां राज्यपाल शासन लागू हो गया। कहीं न कहीं सत्ता से जुड़ने की लालसा हर किसी में रही और जोड़-तोड़ की सरकारें बनती रहीं। राजनीतिक अस्थिरता से यहां बार-बार राज्यपाल शासन लगता रहा।
अगर यह कहें कि अस्थिरता इस राज्य का भाग्य, परंपरा बन गई है तो गलत नहीं होगा। वरिष्ठ पत्रकार जफर इकबाल कहते हैं कि आप आंकड़ों को देखें तो जो भी गठबंधन करके सत्ता में आया वही कुछ दिनों में छिटक गया। इसके बाद या तो किसी दूसरे के साथ सरकार बना ली या फिर केंद्र को हस्तक्षेप करना पड़ा और यहां राज्यपाल शासन लागू हो गया। कहीं न कहीं सत्ता से जुड़ने की लालसा हर किसी में रही और जोड़-तोड़ की सरकारें बनती रहीं। राजनीतिक अस्थिरता से यहां बार-बार राज्यपाल शासन लगता रहा।
1957 से 1965 तक बदलते रहे सत्ताधीश
1957 के चुनाव में संविधान सभा विधानसभा में बदल गई। नेकां ने 75 में 68 सीटों पर जीत दर्ज की। प्रजा परिषद ने पांच सीटें जीतीं। बख्शी गुलाम मोहम्मद एक बार फिर राज्य के प्रधानमंत्री बने। 1962 में तीसरी बार चुनाव हुए। नेकां ने 75 में 70 सीटें जीती। गुलाम मोहम्मद सत्ता में आए लेकिन कुछ विवादों के चलते एक साल में पद छोड़ना पड़ा और 12 अक्तूबर 1963 को ख्वाजा शम्सुद्दीन को राज्य का नया प्रधानमंत्री बनाया गया लेकिन वह एक साल भी पूरा नहीं कर सके और 29 फरवरी, 1964 को उन्हें हटा दिया गया। उनकी जगह जीएम सादिक नए प्रधानमंत्री बनाए गए। मार्च 1965 को प्रधानमंत्री का पद बदलकर मुख्यमंत्री का कर दिया गया। ऐसे में जीएम सादिक जम्मू-कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री बने।
1957 के चुनाव में संविधान सभा विधानसभा में बदल गई। नेकां ने 75 में 68 सीटों पर जीत दर्ज की। प्रजा परिषद ने पांच सीटें जीतीं। बख्शी गुलाम मोहम्मद एक बार फिर राज्य के प्रधानमंत्री बने। 1962 में तीसरी बार चुनाव हुए। नेकां ने 75 में 70 सीटें जीती। गुलाम मोहम्मद सत्ता में आए लेकिन कुछ विवादों के चलते एक साल में पद छोड़ना पड़ा और 12 अक्तूबर 1963 को ख्वाजा शम्सुद्दीन को राज्य का नया प्रधानमंत्री बनाया गया लेकिन वह एक साल भी पूरा नहीं कर सके और 29 फरवरी, 1964 को उन्हें हटा दिया गया। उनकी जगह जीएम सादिक नए प्रधानमंत्री बनाए गए। मार्च 1965 को प्रधानमंत्री का पद बदलकर मुख्यमंत्री का कर दिया गया। ऐसे में जीएम सादिक जम्मू-कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री बने।
1977 में अब्दुल्ला की वापसी लेकिन अस्थिरता जारी
वर्ष 1977 में हुए चुनावों में शेख अब्दुल्ला ने पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापसी की और मुख्यमंत्री बने, लेकिन कार्यकाल वह भी पूरा नहीं कर सके। दरअसल इसी सरकार में शेख अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य के संविधान में संशोधन कर विधानसभा की अवधि पांच से बढ़ाकर छह साल कर दी। 1982 में शेख अब्दुल्ला का निधन हो गया। ऐसे में उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने।
वर्ष 1977 में हुए चुनावों में शेख अब्दुल्ला ने पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापसी की और मुख्यमंत्री बने, लेकिन कार्यकाल वह भी पूरा नहीं कर सके। दरअसल इसी सरकार में शेख अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य के संविधान में संशोधन कर विधानसभा की अवधि पांच से बढ़ाकर छह साल कर दी। 1982 में शेख अब्दुल्ला का निधन हो गया। ऐसे में उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने।
घाटी में नहीं दिख रहा फायदा, क्या फिर जम्मू तक सिमटेगी भाजपा
एग्जिट पोल ही सही रहे तो भाजपा के लिए यह बड़ा झटका होगा। एग्जिट पोल में मिल रही सीटों से तो अनुच्छेद 370 हटाने का फायदा घाटी से भाजपा को होता नहीं दिख रहा। जम्मू में भी उस तरह से परिणाम नहीं आ रहे हैं, जिसके भाजपा दावे करती आ रही है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि उनकी पार्टी जम्मू संभाग में 35 प्लस का लक्ष्य लेकर चल रही है। पहाड़ी समुदाय को 10 फीसदी आरक्षण के बाद वह राजोरी-पुंछ के इलाकों में पांच सीटें तलाश रहे हैं। बता दें कि 2014 के चुनाव में भाजपा के पास 25 सीटें थीं। इस बार पार्टी कश्मीर संभाग में भी 20 सीटों पर लड़ी है।
एग्जिट पोल ही सही रहे तो भाजपा के लिए यह बड़ा झटका होगा। एग्जिट पोल में मिल रही सीटों से तो अनुच्छेद 370 हटाने का फायदा घाटी से भाजपा को होता नहीं दिख रहा। जम्मू में भी उस तरह से परिणाम नहीं आ रहे हैं, जिसके भाजपा दावे करती आ रही है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि उनकी पार्टी जम्मू संभाग में 35 प्लस का लक्ष्य लेकर चल रही है। पहाड़ी समुदाय को 10 फीसदी आरक्षण के बाद वह राजोरी-पुंछ के इलाकों में पांच सीटें तलाश रहे हैं। बता दें कि 2014 के चुनाव में भाजपा के पास 25 सीटें थीं। इस बार पार्टी कश्मीर संभाग में भी 20 सीटों पर लड़ी है।
पहले चुनाव के बाद से ही शुरू हो गया सत्ता के लिए संघर्ष
जम्मू-कश्मीर रियासत के भारत में विलय के बाद 15 अक्तूबर 1947 से 5 मार्च, 1948 तक मेहरचंद महाजन राज्य के प्रधानमंत्री रहे। मेहरचंद महाजन के हटने के बाद शेख मोहम्मद अब्दुल्ला नए प्रधानमंत्री बने। जम्मू-कश्मीर में पहली बार अगस्त-सितंबर 1951 में संविधान सभा के लिए चुनाव हुए। शेखा अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सभी 75 सीटों पर जीत हासिल की। इसमें 73 सीटों पर विधायक निर्विरोध चुने गए। इस तरह शेख अब्दुल्ला राज्य के पहले चुने हुए प्रधानमंत्री बने। कुछ साल बाद शेख अब्दुल्ला जेल में डाल दिए गए और दस साल तक अंदर रहे। इस दौरान बख्शी गुलाम मोहम्मद सत्ता पर काबिज रहे।
जम्मू-कश्मीर रियासत के भारत में विलय के बाद 15 अक्तूबर 1947 से 5 मार्च, 1948 तक मेहरचंद महाजन राज्य के प्रधानमंत्री रहे। मेहरचंद महाजन के हटने के बाद शेख मोहम्मद अब्दुल्ला नए प्रधानमंत्री बने। जम्मू-कश्मीर में पहली बार अगस्त-सितंबर 1951 में संविधान सभा के लिए चुनाव हुए। शेखा अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सभी 75 सीटों पर जीत हासिल की। इसमें 73 सीटों पर विधायक निर्विरोध चुने गए। इस तरह शेख अब्दुल्ला राज्य के पहले चुने हुए प्रधानमंत्री बने। कुछ साल बाद शेख अब्दुल्ला जेल में डाल दिए गए और दस साल तक अंदर रहे। इस दौरान बख्शी गुलाम मोहम्मद सत्ता पर काबिज रहे।