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बदली जन्नत में जगी न्याय की उम्मीद, इस समाज के लोगों को अधिकार की आस

Fri, 01 Nov 2019 12:02 AM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Fri, 01 Nov 2019 12:02 AM IST
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Jammu Kashmir became union territory, Gorkha and Valmiki society said Now we will get our rights
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख - फोटो : अमर उजाला डॉट कॉम

जेएंडके के यूटी बनने के बाद गोरखा और वाल्मीकि समाज को न्याय की उम्मीद जगी है। कई सालों से जम्मू-कश्मीर में रहने के बावजूद ये समाज नागरिकता, सरकारी नौकरी, उच्च शिक्षा सहित कई अधिकारों से वंचित हैं। इन लोगों का कहना है कि आजादी के बाद पहली बार उन्हें उनके अधिकार मिलेंगे।

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गोरखा समाज के कृष्ण सिंह ने कहा, गोरखा समाज के लोग डोगरा शासकों की फौज का हिस्सा रहे हैं। देश की आजादी से पहले हमारे पूर्वज जम्मू आए थे। जम्मू- कश्मीर में रहने के बावजूद हमें नागरिकता के अधिकार नहीं मिले। अनुच्छेद 370 के कारण हमें सबसे अधिक परेशानी होती थी। बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना और नौकरी लेना सबसे बड़ी चुनौती थी क्योंकि जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरी के लिए स्टेट सब्जेक्ट अनिवार्य था।  

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स्टेट सब्जेक्ट नहीं होने से बच्चों को नौकरी नहीं मिली

गोरखा समाज के अर्जुन सिंह कहते हैं, जम्मू-कश्मीर में भाषा की सबसे अधिक समस्या थी। सरकारी कार्यालयों में उर्दू अधिकारिक भाषा होने सेे समझ नहीं पाते थे। अब केंद्र शासित प्रदेश में हिंदी में सरकारी कामकाज हाेंगे जो अच्छा है। महाराजा रणजीत सिंह के शासन काल में हमारे पूर्वज सेना में थे। हमने सेवा तो की लेकिन अधिकार नहीं मिले।

जनक बहादुर के मुताबिक शिक्षा का अधिकार तो था, लेकिन स्टेट सब्जेक्ट नहीं होने से बच्चों को नौकरी नहीं मिलती थी। मेरे पिता जी को पीएचई विभाग में इसलिए नौकरी नहीं मिली क्योंकि उनके पास स्टेट सब्जेक्ट नहीं था। पूर्व की सरकारों ने हमारे लिए कुछ नहीं किया, अब हमें उम्मीद जगी है।

 

नागरिकता का अधिकार तक नहीं

वाल्मीकि समाज के करतार सिंह के मुताबिक 1952 और 1993 में हमारे पूर्वज पंजाब से जम्मू-कश्मीर आए थे। उस समय तो हमें कहा गया था कि हमें सभी नागरिकता अधिकार मिलेंगे, लेकिन कुछ नहीं मिला। बलकार सिंह ने कहा, अभी तक तो हमें झाडू मारने वाले तक सीमित रखा गया है। हमारे बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिलती।

बुआ सिंह कहते हैं, बेटे को नौकरी मिली थी, लेकिन स्टेट सब्जेक्ट नहीं होने से नियुक्ति नहीं हो पाई। हमारे बच्चे हाई सेकेंडरी के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए उनके पास जरूरी सरकारी प्रमाणपत्र नहीं होते हैं। अब हमें हमारे अधिकार मिलेंगे। राजू अठवाल के मुताबिक  नगर निगम में सफाई कर्मचारी की नौकरी के अलावा हमारे बच्चों को किसी अन्य विभाग में नौकरी मिलना मुश्किल था। लेकिन अब हमें अपने अधिकार मिलेंगे।

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